पुरा पाषाण काल-
- जलवायु – यह काल प्लीस्टोसिन युग से संबन्धित था जब वातावरण शुष्क था एवं ठंडक भी अधिक थी ।
- तकनीकी विशेषता – क्रोड़ उपकरणो की प्रधानता थी जब बड़े बड़े स्फटिक पत्थरों से चौपर – चौपिन्ग (काटने वाले औज़ार ), हस्तकुठार (हैंड एक्स ) तथा विदरिणी(cleverer) का उपयोग होता था। साथ ही शल्क उपकरणो का प्रचलन भी आरंभ हो चुका था । जलवायु संबंधी परिवर्तन तथा तकनीकी परिवर्तन के आधार पर पुरा पाषाण काल के भी तीन चरण है – निम्न पूरा पाषाण काल , मध्य पूरा पाषाण काल , एवं उच्च पूरा पाषाण काल । धीरे – धीरे क्रोड़ उपकरणो की तुलना मे शल्क उपकरणो की प्रधानता बढ्ने लगी ।
- जीविकोपार्जन संबंधी परिवर्तन – इस काल मे मानव शिकारी और खाद्य संग्राहक था । संभवत : इनके जीवन मे शिकार की तुलना मे खाद्य संग्रह को अधिक महत्व प्राप्त था क्योंकि खाद्य संग्रह से प्राप्त वस्तुओ को अधिक समय तक सुरक्षित रखना संभव था ये जंगली उत्पाद होते थे ।
- सामाजिक संरचना – मानवशास्त्रियों ने पूरा पाषाण काल के जीवन को बैंड सोसाइटी का नाम दिया है यह एक प्रकार का समता मूलक समाज होता था इसकी संख्या भी लगभग 40-50 के आसपास होती थी लोग समूह बनाकर शिकार या खाद्य संग्रह के लिए जाते थे । कार्यस्थल पर इनमे से कोई एक स्वाभाविक नेता बन जाता था परंतु कार्यसमाप्त होते ही फिर एक बार समानता की स्थिति स्थापित हो जाती थी । महिलाओ के विषय मे मानवशास्त्रियों का मानना है कि उत्पादन मे भूमिका महिलाओ कि स्थिति का निर्धारक कारक होती है तथा जैसा कि हम जानते है कि उस काल मे शिकार कि तुलना मे खाद्य संग्रह को अधिक महत्व प्राप्त था और चूंकि महिलाएं खाद्य सुरक्षा से जुड़ी थी अत : उनकी सामाजिक स्थिति अच्छी रही होगी
- सांस्कृतिक दृष्टिकोण – आदिमानव के संदर्भ मे सांस्कृतिक दृस्टिकोण से तात्पर्य है उनके द्वारा अपने परिवेश से साहचर्य स्थापित किया गया जो धर्म एवं कला के माध्यम से व्यक्त होने लगा । उदाहरण के लिए इस काल से जुड़े बेलन घाटी मे एक स्थल लोहन्दा नाला से हड्डी की एक मूर्ति मिली है जिसकी पहचान देवी के रूप मे कि जाती है उसी प्रकार कुछ विद्वानो का मानना है कि भीमबेटिका के कुछ क्षेत्र उत्तर पूरा पाषाण काल से जुड़े हुये है हालांकि यह विचार स्थापित नहीं है ।
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मध्य पाषाण काल :
पूरा पाषाण काल और नव पाषाण काल के बीच संक्रमण की अवस्था के रूप मे मध्य पाषाण काल कि परिकल्पना की गयी ।
- जलवायु संबंधी कारक – यह काल होलोसिन युग से संबद्ध था जब वातवरण थोड़ा गरम एवं नमी आई । अत : छोटे -छोटे पशुओ की संख्या बढ्ने लगी तथा कृषि के लिए वातवरण का निर्माण हुआ
- तकनीकी परिवर्तन – इस काल मे सूक्ष्म पाषाण उपकरणो का उपयोग शुरू हुआ तथा इन उपकरणो को लकड़ी एवं हड्डी से जोड़कर उपयोग किया जाने लगा इस प्रकार इस काल मे तीर एवं धनुष का भी विकास हुआ
- जिविकोपार्जन मे परिवर्तन – तीर और कमान का विकास होने के बाद बड़े के साथ छोटे – छोटे पशुओ का शिकार भी संभव हुआ । साथ ही उन्होने मछली पकड़ने की क्ला भी विकसित कर ली इस कारण से खाद्यान की उपलब्धता बाद गयी । इसने जनसंख्या वृद्धि को भी प्रोत्साहन दिया । यद्यपि इस काल मे कृषि का आरंभ नहीं हुआ था परंतु एक मध्य कालीन स्थल सराय नाहर राय से चक्की एव सीलबट्टे के माध्यम से अनाज के दाने निकले जाने का साक्ष्य मिलता है । यद्यपि यह जंगली किस्म का अनाज था । उसी प्रकार इस काल मे नियमित रूप मे पशुपालन की शुरुआत नहीं हुई परंतु मध्य पाषाण कालीन स्थल मध्य प्रदेश मे आदमगड , तथा राजस्थान के बागोर से पशुपालन का सबसे आरंभिक साक्ष्य मिलता है । उसी प्रकार मृद भांड़ो का प्रचलन नव पाषाण काल मे आरंभ हुआ परंतु इसका आरंभिक साक्ष्य मध्य कालीन स्थल गुजरात के लन्घनाज और यूपी के चौपनिमंडो से मिलता है ।
- सामाजिक संरचना – मध्य कालीन समाज भी बैंड सोसाइटी का प्रतिनिधित्व करता है । परंतु इस काल मे पहली बार परिवार की परिकलपना विकसित हुई क्योंकि अब बूढ़े व्यक्ति को बच्चो की देखभाल के लिये घर पर छोड़ा जाने लगा । उसी प्रकार पहली बार इस काल मे शवाधान की पद्धति विकसित हुई अर्थात मृतकों को दफनाया जाने लगा । यह केवल अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान अर्पित करने का माध्यम नहीं था बल्कि यह कहि न कही अपने पूर्वज की विरासत पर दावा करने का प्रयास भी था । फिर इस काल मे मृतक के साथ आवश्यकता की वस्तु भी दफनाई जाने लगी जो मृत्यु के बाद के जीवन की ओर संकेत करती है ।
- सांस्कृतिक दृष्टिकोण – लोगो ने अपने परिवेश के साथ साहचर्य स्थापित करना शुरू कर दिया था तथा चित्रों के माध्यम से अपने मनोभाव व्यक्त करने लगे थे । लिपि की अनुपस्थिति मे मध्य पाषाण कालीन मानव के चित्र बोलते है । मध्य पाषाण कालीन चित्रकला भारतीय उपमहाद्वीप मे लगभग 150 स्थलो से मिली है इनमे से कुछ इस प्रकार है – मिर्जापुर के पास सुहागीघाट, MP मे भिमबेटिका ,ओड़ीसा मे संभलपुर एवं सुंदरगढ़ , इनके अतिरिक्त दक्षिण मे कर्नाटक , केरल , व तमिनाडु से चित्र प्राप्त हुए है । ये चित्र दो रूपो मे प्राप्त हुये है –
- पैट्रोग्लिफ (petrogliph) – यह गुफा के चट्टान को खुरेचकर बनाए जाते थे ।
- दूसरे प्रकार के चित्र रंगों के माध्यम से बनाए जाते थे । कुल 16 रंगो का उपयोग हुआ हिय इनमे सबसे अधिक सफ़ेद एवं लाल रंग का प्रयोग देखने को मिलता है इन चित्रों मे पुरुष महिला पशु एवं अन्य प्रकार के जीव जन्तुओ का चित्रण हुआ है ।
Q. मध्य पाषाण कालीन चित्रकला के सौंदर्य बोध को दर्शाये यह आधुनिक चित्रकला से कहाँ तक तुल्य है ?
= मध्य पाषाण कालीन मानव के सौंदर्य बोध से तात्पर्य है उनका अपने परिवेश के साथ लगाव तथा मूलभूत मानवीय भावो यथा करुणा , उल्लास , जीवन के प्रति उमंग आदि का विकास तथा चित्रों के माध्यम से उनकी अभिव्यक्ति ।
मध्य पाषाण कालीन चित्रकला निम्नलिखित रूप मे मानव के सौंदर्य बोध को व्यक्त करती है –
- अगर हम शिकार वाले चित्र पर नजर डालते है तो पाते है कि समान्यत : शिकारी समूह मे शिकार करते थे तथ चित्रों मे उनकी अभिव्यक्ति वास्तविक रूप मे ना होकर प्रतिकात्मक रूप मे (माचिस कि तिल्ली के रूप मे ) व्यक्त हुआ है , इसका अर्थ है कि शिकार मे हिंसा होती थी उससे उनको पीड़ा होती थी और अगर ईएसए है तो उनके मन मे करुणा का भाव जग रहा रहा था ।
- मटा के द्वारा शिशु को पालने का दृश्य भी कहीं न कहीं मूलभूत मानवीय लगाव को द्राशता है ।
- इन चित्रों मे समूहिक गीत और संगीत के चित्र व्यक्त हुए है जो जीवन मे लय कि तलास करते प्रतीत होते है
- मध्य पाषाण कालीन चित्रकला मे उछलते बंदर , दोड़ते हुये खरगोश और चरते हुये पशुओ के भी चित्र है यहा भी गति कि तलाश है ।
उपर्युक्त सभी विशेषतए सौंदर्य बोध की अभिव्यक्ति है
अब जहां तक आधुनिक चित्रकला से तुलना की बात है तो दोनों मे हमे एकसमानता दिखती है कि मध्य पाषाण कालीन चित्रकला और आधुनिक चित्रकला दोनों मे सांकेतिकता और प्रतिकात्म्क्ता है और दोनों मे एक असमानता भी है और वह यह कि जहां मध्य पाषाण कालीन चित्रकला आरंभिक मानव के आदिम मनोभावो कि अभिव्यक्ति है वहीं आधुनिक चित्रकला आधुनिक मानव की जटिल मनोभावों की।
नव – पाषाण काल –
मानव पहली बार शिकारी और खाद्य संग्राहक से खाद्य उत्पादक बना इस प्रकार मानव पशु एवं भूमि के बीच संबंध बादल गए इसलिए कुछ विद्वान इसे नव पाषाण क्रांति का नाम देते है । मानव इतिहास मे इसे बड़ा परिवर्तन माना गया ।
जलवायु संबंधी कारक: होलोसिन युग के आगमन के साथ जलवायु संबंधी देखा गया और फिर कृषि के लिए उचित माहौल का निर्माण हुआ ।
तकनीकी परिवर्तन – नव पाषाण काल मे अधिक बेहतर औजारों का निर्माण आरंभ हुआ पहले पत्थर से पत्थर को तोड़कर औज़ार बनाए जाते थे परंतु अब पत्थर से पत्थर को घिसकर औज़ार बनाए जाने लगे इसे पोलिशदार उपकरण का नाम दिया गया । ये उपकरण कृषि के लिए अधिक उपयोगी थे क्योंकि ये चिकने होते थे ।
जीविकोपार्जन्य परिवर्तन – इस काल मे पहली बार स्थायी गाव बसे और लोगो ने खेती कि शुरुआत कि खेती के आरंभ होने के एक से अधिक कारण हो सकते है एक कारण जलवायु संबंधी परिवर्तन था इसके अतिरिक्त एक दूसरा कारण था जनसंख्या के बढ्ने के कारण जंगली उत्पादो कम पड़ जाना और फिर नए प्रकार के उत्पादन कि जरूरत खेती आरंभ होने के साथ पशुपालन को भी प्रोत्साहन मिला । साथ ही अनाजों को रखने के लिए मृद भांड़ो कि जरूरत हुई । फिर आगे चलकर कुछ क्षेत्रों मे धान्य कोठारों का विकास देखा गया ।
परंतु नव पाषाण काल का अध्ययन करते हुये ये ध्यान रखना आवश्यक है कि नव पाषाण कालीन स्थलों का सम्पूर्ण भारत मे एक ही काल मे विकास नहीं हुआ बल्कि पृथक-पृथक काल मे हुआ अर्थात भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न क्षेत्र कभी भी विकास के एक स्तर पर नहीं रहे । उदाहरण के लिए सबसे आरंभिक नव पाषाण कालीन स्थल उत्तर पश्चिम मे बलूचिस्तान , उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत सिंध तथा पंजाब मे विकसित हुये । सबसे पहला नव पाषाण कालीन स्थल बलूचिस्तान के मेहरगड़ को माना गया था । { परंतु हाल मे उत्तरप्रदेश के संत कबीरनगर मे लाहरदेव को सबसे प्राचीन नव पाषाण कालीन स्थल का दर्जा मिला है }
इसके कुछ समय बाद उत्तरप्रदेश मे बेलन घाटी मे कुछ स्थल अस्तित्व मे आए । पहली बार यहाँ से चावल का साक्ष्य मिलने लगा इसके बाद कश्मीर मे बुर्जहोम एवं कुछ अन्य स्थल अस्तित्व मे आए । बुर्जहोम से गर्तनिवास (pit dwelling ) का साक्ष्य मिलता है । इसके बाद मध्य गंगा घाटी , बंगाल तथा असम मे नव पाषाण कालीन स्थल स्थापित हुये । परंतु सबसे अंत मे प्रायद्वीपीय भारत मे स्थल विकसित हुये इसका कारण था दक्षिण भारत कि मिट्टी कि कठोरता जिस कारण से उन्हे पत्थर के औजारो से तोड़ना कठिन था । इसलिए नव पाषाण काल मे दक्षिण भारत मे कृषि कि तुलना मे पशुपालन ही महत्वपूर्ण बना रहा ।
सामाजिक संरचना – सामाजिक संरचना मे परिवर्तन देखा गया अब समाज मे विभाजन आरंभ हो गया बैंड सोसाइटी कि जगह मुखिया तंत्र लेने लगा अब घरो कि बनावट मे भी अंतर देखने को मिलता है कुछ मकान आयताकार निर्मित थे तो गोलाकार, जो सामाजिक विभाजन को संकेत करता है ।
स्थायी गाँव बसे और सामुदायिक जीवन की शुरुआत हुई। बूढ़े लोगो और महिलाओ पर दबाव कम हुआ, रात्री भोज एवं समारोह होने लगा । अब लोग एक दूसरे को उपहार मे अनाज लेने और देने लगे ।
सांस्कृतिक दृष्टिकोण – कृषक जीवन मे अनाजों का एक अंश अगले वर्ष बीज के लिए बचाकर रख लिया जाता था । इससे लोगो मे संचय की प्र्वृती आई । चूंकि लोगो के जीवन मे उत्पादन का महत्व बाद गया इसीलिए उत्पादन का प्रभाव धर्म के क्षेत्र मे भी देखा गया उदाहरण के लिए उत्तर पश्चिम के स्थलो मे पकाई गयी मिट्टी से निर्मित देवी कि मूर्ति मिली है । उसी प्रकार विभिन्न स्थलो से सांड कि भी मूर्ति प्राप्त हुई है इंका संबंध भी उत्पादन से था।
ताम्र पाषाण काल –
भारतीय उपमहाद्वीप मे तांबे का आगमन तथ ताम्र पाषाण कालीन बस्तियों का विस्तार :-
भारत मे तांबे का प्रचलन लगभग 3500 ईशा पूर्व मे माना जाता है और आरंभिक ताम्र पाषाण कालीन बस्तियाँ उत्तर पश्चिम मे विकसित हुई थी। जैसा कि हम देखते है कि उत्तर पश्चिम मे नव पाषाण कालीन स्थलों का विकास सबसे पहले हुआ था। फिर तांबे के प्रचालन के साथ लगभग 3200 ईशा पूर्व मे ये स्थल आरंभिक हड्डपाई चरण मे पहुँच गए। फिर आगे 2600 ईशा पूर्व मे तांबे के साथ टिन को मिलकर काँसे का विकास किया गया और ये सभ्यता कांस्य युग मे पहुँच गयी इसे हड्ड्पा सभ्यता का नाम दिया। तथा यह नगरीय चरण की अवस्था को दर्शाती है उसके बाद मध्य गंगा घाटी, बंगाल, असम तथा आगे प्रायद्वीपीय भारत मे तांबे का प्रचालन आरंभ हुआ इस प्रकार ताम्र पाषाण काल की शुरुआत हुई परंतु इन क्षेत्रो मे नव पाषाण कालीन स्थल ही ताम्र पाषाण काल मे ढलते चले गए अत : इन्हे नव पाषाण काल – ताम्र पाषाण काल का नाम दिया गया।
जहां तक ताम्र पाषाण काल एवं हड्ड्पा सभ्यता के बीच संबंधो का सवाल है तो हम कह सकते है कि चूंकि तांबा , काँसे से पहले आया इसलिए तकनीकी दृष्टि से ताम्र पाषाण काल , कांस्य युग से पहले है परंतु काल क्रम कि दृष्टि से कुछ ताम्र कालीन स्थल हड्ड्पा सभ्यता से पहले है कुछ स्थल हड्ड्पा सभ्यता के समकालीन है परंतु अनेक स्थल एवं संस्कृतियाँ हड्ड्पा सभ्यता के बाद की है । अर्थात जब तक भारतीय उप महाद्वीप मे लोह युग आरंभ नहीं हुआ तब तक ताम्र पाषाण काल ही चलता रहा था ।
तकनीकी परिवर्तन – पहली बार इसी काल मे धातु का प्रचालन आरंभ हुआ ओर तांबे के उपकरण बनाए जाने लगे क्योंकि तांबे के साथ पत्थर के उपकरण के प्रयोग भी चलते रहे इसीलिए इसका नाम ताम्र पाषाण काल दिया गया ।
जीविकोपार्जन मे परिवर्तन – इस काल मे पशुपालन एवं कृषि उत्पादन दोनों को प्रोत्साहन मिला । कृषि अधिशेष ने शिल्प एवं कारीगरी तथा व्यापार के विकास को प्रोत्साहन दिया । इस काल मे अन्नागारों की संख्या बढ़ी क्तोंकी लोग आवश्यकता से अधिक अनाज उपजाने लगे ।
सामाजिक संरचना मे परिवर्तन – इस काल मे सामाजिक विभाजन को और भी प्रोत्साहन मिला तथा मुखिया तंत्र मजबूत हुआ । एक ताम्र पाषाण कालीन स्थल इनामगांव से यह प्रमाण मिलता है कि कारीगरों को पश्चिमी भाग मे बसाया जाता था जबकि मुखिया का मकान केंद्र मे होता था ।
सांस्कृतिक दृष्टिकोण – इस काल मे भी धर्म के क्षेत्र मे उत्पादन शक्ति कि पूजा को महत्व दिया गया इसीलिए देवी एवं सांड कि मूर्तियाँ विभिन्न स्थलो से प्राप्त हुई , गुफा चित्रकला का विकास हुआ ।









