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Click Here to Readराजस्थान के उद्योग
– स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व राजस्थान में केवल सात सूती वस्त्र मिलें, दो सीमेंट फैक्ट्रियाँ व दो चीनी की मिलें थीं।
– राजस्थान के गठन के समय राजस्थान में 11 वृहद् उद्योग, 7 सूती वस्त्र इकाइयाँ, 2 सीमेंट इकाइयाँ तथा 2 चीनी मिलें और 207 पंजीकृत फैक्ट्रियाँ थीं।
– राजस्थान औद्योगिक विकास के मामले में पिछड़ा राज्य है।
– वर्ष 1978 में केन्द्र प्रवर्तित योजना के तहत जिला उद्योग केन्द्रों की स्थापना की गई।
– वर्तमान में 36 जिला उद्योग केन्द्र तथा 8 उप-जिला उद्योग केन्द्र हैं।
– 33 जिलों के अतिरिक्त 3 जिला उद्योग केन्द्र- जयपुर ग्रामीण, भिवाड़ी (अलवर) तथा फलोदी (जोधपुर) में है।
– 8 उप-जिला केंद्र – नीमराणा, मकराना, किशनगढ़, ब्यावर, फालना, बालोतरा, आबू रोड़ तथा सुजानगढ़ (चूरू) हैं।
– 12वीं पंचवर्षीय योजना में राज्य में औद्योगिक विकास दर का लक्ष्य
8% था।
– नीति आयोग द्वारा जारी औद्योगिक नवाचार सूचकांक-2020 में राजस्थान का स्थान 12वाँ रहा था। (प्रथम स्थान-कर्नाटक)
राजस्थान में उद्योग क्षेत्र
– उद्योग क्षेत्र के अन्तर्गत खनन एवं उत्खनन, विनिर्माण, विद्युत, गैस, जलापूर्ति एवं अन्य उपयोगी सेवाएँ तथा निर्माण क्षेत्र शामिल हैं।
– उद्योग क्षेत्र का स्थिर (2011-12) मूल्यों पर सकल राज्य मूल्यवर्द्धन (जी.एस.वी.ए.) वर्ष 2011-12 में ₹1.36 लाख करोड़ से बढ़कर 2021-22 में ₹1.78 लाख करोड़ हो गया है, जो कि इस अवधि में वार्षिक 2.69 प्रतिशत (सी.ए.जी.आर.) की वृद्धि को दर्शाता है।
– प्रचलित मूल्यों पर जी.एस.वी.ए. वर्ष 2011-12 में ₹1.36 लाख करोड़ से बढ़कर 2021-22 में ₹2.75 लाख करोड़ हो गया है, जो कि इस अवधि में वार्षिक 7.28 प्रतिशत (सी.ए.जी.आर.) की वृद्धि दर्शाता है।
– वर्ष 2021-22 राज्य के कुल सकल राज्य मूल्यवर्द्धन (जी.एस.वी. ए) में प्रचलित कीमतों पर उद्योग क्षेत्र का योगदान 24.67% व स्थिर (2011-12) मूल्यों पर उद्योग क्षेत्र का योगदान 26.37% है।
राजस्थान की अर्थव्यवस्था में औद्योगिक क्षेत्र
उप-क्षेत्र | प्रचलित मूल्य पर योगदान | स्थिर (2011-12) मूल्यों पर वृद्धि दर |
खनन | 2.78 % | 8.15% |
विनिर्माण क्षेत्र | 10.06% | 23.75% |
विद्युत, गैस, जल एवं अन्य उपचारात्मक सेवाएँ | 3.15% | 6.81% |
निर्माण क्षेत्र | 8.68% | 7.87% |
औद्योगिक क्षेत्र | 24.67% | 15.37% (वृद्धि ) |
– औद्योगिक क्षेत्र के उपक्षेत्रों का प्रचलित मूल्यों पर योगदान-2021-22
उद्योग क्षेत्र के उप-क्षेत्रों की संरचना | प्रतिशत |
खनन | 11.26% |
विनिर्माण, | 40.77% |
विद्युत, गैस, जलापूर्ति एवं अन्य उपयोगी सेवाएँ | 12.78% |
निर्माण | 35.19% |
कुल | 100% |
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आई.आई.पी.)
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) एक समग्र संकेतक है, जो कि दी गई एक निश्चित अवधि के दौरान चयनित आधार वर्ष पर औद्योगिक उत्पादों के उत्पादन मात्रा में अल्पकालिक परिवर्तनों को मापता है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक राज्य में औद्योगिक निष्पादन का प्रमुख संकेतक है, जिसका मासिक आधार पर संकलन किया जाता है।
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक शृंखला (आधार वर्ष 2011-12) तीन वृहद् समूहों यथा-विनिर्माण, खनन एवं विद्युत पर आधारित है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के अनुसार वित्तीय वर्ष 2017-18 से 2021-22 के लिए समग्र रूप से औद्योगिक निष्पादन को नीचे दी गई तालिका में दर्शाया गया है।
क्षेत्र | 2017-18 | 2018-19 | 2019-20 | 2020-21 | 2021-22* |
विनिर्माण | 134.71 | 143.39 | 125.93 | 122.95 | 133.91 |
खनन | 132.85 | 134.76 | 125.60 | 119.43 | 123.71 |
विद्युत | 124.96 | 137.70 | 135.15 | 126.10 | 135.77 |
सामान्य सूचकांक | 133.08 | 140.37 | 126.90 | 122.34 | 131.33 |
– राज्य में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) हेतु आधार वर्ष 2004-05 से बदलकर 2011-12 कर दिया गया है।
राजस्थान में मूल्य सांख्यिकी
– कीमतों में विभिन्न आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक कारणों से समय के साथ-साथ भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर परिवर्तन होता है। चूँकि कीमतें विभिन्न आर्थिक निर्णयों को प्रभावित करती हैं, इसलिए मूल्य परिवर्तन की वित्तीय निगरानी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इनका सीधा असर आर्थिक नीति एवं नियोजन पर पड़ता है।
– इनमें होने वाले परिवर्तनों पर्यवेक्षण के लिए प्राथमिक उपकरण मूल्य सूचकांक हैं।
– किसी निश्चित समयावधि के दौरान किसी क्षेत्र में वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य स्तरों में होने वाले सापेक्ष परिवर्तन मूल्य सूचकांक के द्वारा मापे जाते हैं।
– उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और थोक मूल्य सूचकांक दो महत्त्वपूर्ण संकेतक हैं, जो क्रमशः खुदरा एवं थोक स्तर के मूल्यों को मापते हैं।
– आर्थिक एवं सांख्यिकी निदेशालय द्वारा साप्ताहिक आधार पर वस्तुओं के थोक एवं खुदरा भावों का सन् 1957 से राज्य के चयनित केन्द्रों से नियमित संग्रहण किया जा रहा है।
– इसके साथ ही पशुधन उत्पाद, उप उत्पाद, भवन निर्माण हेतु भवन सामग्री एवं मजदूरी दरों के भाव राज्य के सभी जिलों से प्राप्त कर संकलित किये जा रहे हैं।
– थोक मूल्यों के आधार पर राज्य के मासिक थोक मूल्य सूचकांक तैयार किए जाते हैं। औद्योगिक श्रमिकों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक श्रम ब्यूरो शिमला द्वारा तैयार और जारी किए जाते हैं।
– राज्य में थोक मूल्य सूचकांक (WIP) हेतु आधार वर्ष 1999-2000 को माना जाता है।
– सरकार के द्वारा व्यापार, राजकोषीय, मौद्रिक और अन्य आर्थिक नीतियों के निर्माण में थोक मूल्य सूचकांक की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका हैं तथा वित्तीय संस्थानों, उद्योगों तथा व्यापार मण्डलों के द्वारा भी उपयोग में लिया जाता है।
– राजस्थान सरकार द्वारा थोक मूल्य सूचकांक को मासिक आधार पर जारी किया जाता है।
वस्तुएँ | वस्तुओं की संख्या | वस्तुओं का भारांकन |
प्राथमिक वस्तु | 75 | 33.894 |
विनिर्मित उत्पाद | 69 | 49.853 |
ईंधन, शक्ति, प्रकाश एवं उपस्नेहक | 10 | 16.253 |
कुल | 154 | 100% |
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सी.पी.आई.)
– उपभोक्ता मूल्य सूचकांक एक समयावधि के अन्तर्गत उन चुनिंदा वस्तुओं एवं सेवाओं के खुदरा मूल्यों के सामान्य स्तर में परिवर्तनों के मापन हेतु तैयार किया गया है, जिसमें उपभोक्ता द्वारा उपभोग हेतु क्रय किया जाता है।
विभिन्न प्रकार के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक–
| आधार वर्ष | तैयार एवं जारीकर्ता संस्थान |
औद्योगिक श्रमिकों हेतु (CPI-IW) | 2016 | श्रम ब्यूरो, शिमला |
कृषि श्रमिकों हेतु (CPI-AL) | 1986-87 | श्रम ब्यूरो, शिमला |
ग्रामीण श्रमिकों हेतु (CPI-RL) | 2012 | श्रम ब्यूरो, शिमला |
ग्रामीण एवं शहरी हेतु (CPI-R&U) | 2012 | राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय (एन.एस.ओ.), नई दिल्ली |
– औद्योगिक श्रमिकों हेतु उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के लिए आधार वर्ष 2016 है जो श्रम ब्यूरो शिमला द्वारा तैयार और जारी किया जाता है।
– अजमेर, भीलवाड़ा और जयपुर को औद्योगिक श्रमिकों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की पुरानी शृंखला (आधार वर्ष 2001) में शामिल किया गया था परंतु वर्तमान में अजमेर केंद्र के स्थान पर अलवर को सम्मिलित किया गया है (अलवर, भीलवाड़ा, जयपुर)।
राजस्थान उद्योग का वर्गीकरण
(A) कच्चे माल की उपलब्धता के आधार पर-
1. कृषि आधारित
2. खनिज आधारित
3. रसायन आधारित
4. अन्य उद्योग
कृषि आधारित उद्योग-
सूती वस्त्र उद्योग
– यह कृषि आधारित परम्परागत उद्योग है जो अधिक मात्रा में रोजगार उपलब्ध करवाता है।
– देश में सूती वस्त्र का प्रथम कारखाना – 1854 ई. में बम्बई में स्थापित किया गया। इसी कारण से देश की वस्त्र नगरी मुम्बई को कहा जाता है।
– पूर्व का बोस्टन तथा भारत का मेनचेस्टर – अहमदाबाद
– उत्तर भारत का मेनचेस्टर – कानपुर
– दक्षिण भारत का मेनचेस्टर – कोयम्बटूर
– देश में सर्वाधिक सूती वस्त्र इकाइयाँ महाराष्ट्र तथा गुजरात में हैं।
– राजस्थान की प्रथम सूती वस्त्र मिल – 1889 ई. में ब्यावर (अजमेर) में ‘दि कृष्णा मिल्स लिमिटेड’ के नाम से सेठ दामोदर दास द्वारा स्थापित की गई ।
– राज्य में 23 सूती वस्त्र इकाइयाँ हैं। जिनमें 17 निजी क्षेत्र ,3 सरकारी क्षेत्र तथा 3 सहकारी क्षेत्र में हैं।
– निजी क्षेत्र की प्रमुख सूती वस्त्र मिलें-
1. दि कृष्णा मिल्स लिमिटेड’-1889
2. मेवाड़ टैक्सटाइल्स मिल्स, भीलवाड़ा-1938
3. महाराजा उम्मेद मिल्स, पाली-1942
4. शार्दूल टैक्सटाइल्स मिल्स, श्रीगंगानगर- 1946
– सरकारी क्षेत्र की सूती वस्त्र मिलें –
1. एडवर्ड कॉटन मिल्स
– स्थापना – 1906, ब्यावर (अजमेर)
– यह राज्य की दूसरी तथा सरकारी क्षेत्र की प्रथम सूती वस्त्र मिल है।
2.महालक्ष्मी कॉटन मिल्स लिमिटेड
– स्थापना – 1925, ब्यावर (अजमेर)
3.विजय नगर कॉटन मिल्स लिमिटेड
– स्थापना – 1932, विजय नगर (भीलवाड़ा)
नोट:- तीनों वर्तमान में बन्द हैं।
1973 -74 में इनका विलय राष्ट्रीय वस्त्र निगम में कर दिया गया है।
– सहकारी क्षेत्र – राजस्थान राज्य सहकारी स्पिनिंग व जिनिंग मिल्स संघ लिमिटेड SPINFED
सहकारी क्षेत्र की कताई मिलें–
1.1965 – गुलाबपुरा सहकारी कताई मिल्स लि. भीलवाड़ा (सहकारी क्षेत्र की प्रथम मिल )
2.1978 – गंगानगर सहकारी कताई मिल्स लि. श्रीगंगानगर
3.1981– गंगापुर सहकारी कताई मिल्स लि., भीलवाड़ा
नोट:- 1 अप्रैल, 1993 को तीनों कताई मिलों एवं गुलाबपुरा की सहकारी जिनिंग मिल को मिलाकर राजस्थान राज्य सहकारी स्पिनिंग व जिनिंग मिल्स संघ लिमिटेड SPINFED की स्थापना की गई।
कार्य:-
– कपास उत्पादन को प्रोत्साहन देना।
– कताई तथा बुनाई उद्योग को बढ़ावा देना।
– सूती-वस्त्र विपणन को बढ़ाना।
राज्य की उपलब्धि
– राजस्थान में सूती वस्त्र नगरी – भीलवाड़ा
– राजस्थान का मेनचेस्टर – भीलवाड़ा
– राज्य का वस्त्र अभियांत्रिकी महाविद्यालय “माणिक्य लाल वर्मा टेक्सटाइल अंभियांत्रिकी कॉलेज, भीलवाड़ा” है।
– राज्य में सर्वाधिक वस्त्र उत्पादन करने वाली इकाई 1939 में स्थापित उम्मेद मिल (पाली) है।
– भीलवाड़ा को वस्त्र निर्यातक का दर्जा केंद्र सरकार द्वारा फरवरी 2009 में दिया गया
– भीलवाड़ा को टाउन ऑफ एक्सीलेंस फॉर टैक्स टाइल्स का दर्जा प्राप्त है।
चीनी उद्योग
– चीनी उद्योग परम्परागत कृषि आधारित उद्योग है। चीनी उद्योग हेतु कच्चा माल जैसे कि गन्ना, चुकन्दर आदि चाहिए होता है।
– भारत चीनी का सबसे बड़ा उपभोक्ता तथा दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है।
– ब्राजील चीनी का सबसे बड़ा उत्पादक देश है।
– क्यूबा को ‘चीनी का कटोरा’ कहा जाता है।
– भारत में चीनी की मिलें सर्वाधिक उत्तर प्रदेश तथा महाराष्ट्र में है।
– राजस्थान में चीनी का उत्पादन बहुत कम मात्रा में होता है यहाँ तीन चीनी उत्पादक मिलें हैं-
1. वर्ष 1932 में भोपाल सागर चित्तौड़ में ‘द मेवाड़ शुगर मिल्स लि.’ राजस्थान की प्रथम तथा निजी क्षेत्र की चीनी मिल है।
– इसकी एक शाखा के रूप में उदयपुर शुगर मिल की स्थापना 1976 में की गई है।
2. वर्ष 1945 में राजस्थान स्टेट गंगानगर शुगर मिल्स लि. स्थापित की गई।
– वर्ष 1956 में राज्य सरकार द्वारा अधिग्रहण करने पर यह सार्वजनिक क्षेत्र में आ गई।
– वर्ष 1968 में इस मिल में चुकन्दर से चीनी बनाने का संयंत्र भी स्थापित किया गया।
3. वर्ष 1965 में बूँदी के केशोरायपाटन में सहकारी क्षेत्र की शुगर मिल्स स्थापित की गई। वर्तमान में यह इकाई बंद है।
अन्य चार इकाइयाँ-
1.राजस्थान के श्रीगंगानगर के श्रीकरणपुर विधानसभा इलाके के गाँव व कमीनपुरा में “दि गंगानगर शुगर मिल” द्वारा चीनी उत्पादित हो रही है।
2.श्री गंगानगर तथा अटरू बाराँ में डिस्टलरीज इकाई स्थापित की गई है।
3.हाइटेक प्रिसिजन ग्लास फैक्ट्री – धौलपुर, यहाँ शराब की बोतलें बनाई जाती हैं।
4.शराब विपणन केन्द्र – उदयपुर, कोटा
– श्रीगंगानगर शुगर मील के सीरे से शराब उत्पादन के 4 सयंत्र स्थापित किए गए हैं-
1. श्रीगंगानगर शुगर मील, जोधपुर
2. श्रीगंगानगर शुगर मील, अजमेर
3. श्रीगंगानगर शुगर मील, प्रतापगढ़
4. श्रीगंगानगर शुगर मील, अटरू(बाराँ)
वनस्पति घी उद्योग-
– इस उद्योग का प्रथम कारखाना वर्ष 1964 में भीलवाड़ा में स्थापित किया गया।
– वर्तमान राजस्थान में 9 कारखानें स्थापित हैं।
जयपुर,टोंक, भीलवाड़ा,चित्तौड़गढ़, अलवर ,भरतपुर, कोटा, उदयपुर, श्रीगंगानगर आदि।
– राज्य में वनस्पति घी के प्रमुख ब्रांड- अशोका, पारस, केसरी, सुदामा इत्यादि।
– प्रदेश में फिलहाल दो सौ बड़ी और करीब सात हजार छोटी तेल मिलें हैं। जिनसे सरकार को प्रतिवर्ष करीब 450 करोड़ रुपये की आमदनी बतौर टैक्स होती है। रतनजोत, जेट्रोफा आदि वनस्पति से राज्य में बायोडीजल के कारखाने स्थापित किए जा रहे हैं।
ऊनी वस्त्र उद्योग
– राजस्थान देश में सबसे अधिक ऊन पैदा करने वाला प्रांत है। देश की कुल भेड़वंश में से 10.64% भेंड़ें राजस्थान में ही पाई जाती हैं, जिनसे प्रतिवर्ष औसतन 1.45 करोड़ कि.ग्रा. ऊन प्राप्त होती है।
– प्रदेश में बीकानेर, ब्यावर और जोधपुर ऊनी उद्योग के प्रमुख केंद्र हैं। जयपुर, अलवर, टोंक, जोधपुर, जैसलमेर और बीकानेर में ऊनी गलीचा उद्योग का विकास हुआ है।
– भीलवाड़ा में ही ‘सिन्थेटिक वूल’ गलीचा उद्योग का कारखाना है ।
– स्टेट वूलन मिल्स-बीकानेर (सरकारी), वर्स्टेड स्पिनिंग मिल्स-चूरू, विदेशी आयात-निर्यात संस्थान-कोटा, वर्स्टेड स्पिनिंग मिल्स-लाडनूं, जोधपुर ऊन फैक्ट्री-जोधपुर आदि ऊन उद्योग की प्रमुख ईकाइयाँ हैं।
– इनके अतिरिक्त कोटा, बीकानेर में ऊनी धागे और वस्त्र तैयार होते हैं। भीलवाड़ा में ऊनी कम्बल व शॉल का कारखाना है।
– मालपुरा एवं टोंक में भी नमदे, आसन, घूधियाँ, चका आदि बनायें जाते हैं। यहाँ के नमदे देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं।
– ऊन उद्योग को बढ़ावा देने के लिए ‘ऊन प्रोसेसिंग हाउस भीलवाड़ा’ ‘ऊन विश्लेषण प्रयोगशाला बीकानेर’, केन्द्रीय ऊन विकास बोर्ड, जोधपुर’, भेड़-ऊन शिक्षण संस्थान, जयपुर का निर्माण हुआ है।
– राजस्थान में ऊन की प्रचुर मात्रा को देखते हुए केन्द्र सरकार ने मालपुरा (टोंक) में एक केन्द्रीय भेड़ व ऊन अनुसंधान केन्द्र’ स्थापित किया है जो ऊन विकास के लिए एशिया का सबसे बड़ा अनुसंधान केन्द्र है।
– इस संस्थान का मरु क्षेत्रीय परिसर उपकेन्द्र, बीछवाल (बीकानेर) में है। बीकानेर में राजस्थान ऊन मिल की स्थापना की गई है।
– ‘कम्प्यूटर चलित गलीचा डिजाइन केन्द्र-जयपुर’,
– देश का पहला एकीकृत टेक्सटाइल पार्क, शाहगढ़ (जैसलमेर),
– ‘टेक्सटाइल पार्क एण्ड टाउन ऑफ एक्सपोर्ट एक्सीलेंस-भीलवाड़ा,
– नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन (NID) जयपुर’ आदि की स्थापना की गई है।
– एशिया की सबसे बड़ी ऊन की मंडी, बीकानेर में है।
चर्म उद्योग
– भारत के कुल कच्चे चमड़े का लगभग 13 प्रतिशत उत्पादन राजस्थान राज्य में होता है।
– राज्य में 568.01 लाख पशुधन एवं 146.23 लाख कुक्कुट है जबकि तमिलनाडु , कर्नाटक एवं आंध्रप्रदेश में यह संख्या आधी से भी कम है, जबकि लेदर प्रोडक्ट की अधिकांश फैक्ट्रियाँ इन्हीं राज्यों में है।
– राज्य में 20 लाख से अधिक चरम दस्तकार है जो कि पैतृक रूप से चर्म फुटवियर (मोजरी/जूती), लैदर गुड्स (बैल्ट, कैप, पर्स) का कार्य कर रहे है परन्तु उनको आधुनिक उपकरणों/मशीनों की जानकारी नहीं होने के कारण उनको अपने उत्पाद का उचित मूल्य प्राप्त नहीं होता है।
– वर्तमान में मुख्यतः भीनमाल (जालोर), बाड़मेर, जोधपुर, जैसलमेर, जयपुर, अलवर, चित्तौड़गढ़ आदि जिलों में बहुतायत मात्रा में चर्म हस्तशिल्पी कार्यरत है।
– राज्य सरकार द्वारा चर्म उद्योग के विकास के लिए ‘मानपुरा माचेडी’ (जयपुर) में चर्म औद्योगिक क्षेत्र विकसित किया गया है। इस क्षेत्र में 8 लेदर की इकाइयाँ स्थापित हुई है।
– चर्म प्रशिक्षण उद्योग : चर्म उद्योगों को प्रोत्साहन दिए जाने के क्रम में वित्तीय वर्ष 2021-22 (दिसम्बर, 2021 तक) के दौरान 300 व्यक्तियों को प्रशिक्षण देने के वार्षिक लक्ष्य की तुलना में 110 व्यक्तियों को प्रशिक्षण प्रदान किया गया। यह प्रशिक्षण चमड़े की रंगाई/चर्म उत्पाद आधारित तकनीकी सुधार पर दिया गया है।
खनिज आधारित
सीमेंट उद्योग
– सीमेंट खनिज आधारित आधारभूत उद्योग है। सीमेंट उद्योग के लिए आवश्यक कच्चा माल चूना पत्थर, जिप्सम, कोयला आदि।
– राजस्थान में सीमेंट ग्रेड लाइम स्टोन के विपुल भंडार होने के कारण राज्य सीमेंट उत्पादन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
– 1824 ई. में ब्रिटेन के पोर्टलैण्ड शहर में सर्वप्रथम सीमेंट का उत्पादन प्रारंभ किया गया।
– वर्ष 1904 में भारत में मद्रास में सर्वप्रथम सीमेंट का कारखाना स्थापित किया गया।
– भारत में आंध्र प्रदेश के बाद राजस्थान दूसरा सबसे बड़ा सीमेंट उत्पादक राज्य है।
– राजस्थान में सर्वप्रथम सीमेंट इकाई (एसोसिएट सीमेंट कंपनी-A.C.C) – स्थापना 1915 व उत्पादन 1917 में लाखेरी (बूँदी) में स्थापित की गई।इसकी स्थापना क्लिक निक्सन कम्पनी द्वारा की गई।
– राजस्थान में सर्वाधिक सीमेंट उत्पादन चित्तौड़गढ़ जिले में होता है।
– सवाई माधोपुर में एशिया के सबसे बड़े सीमेंट कारखाने की स्थापना वर्ष 1953 में ‘जयपुर उद्योग लिमिटेड’ के नाम से की गई पर वर्तमान में यह बंद है।
राज्य में सफेद सीमेन्ट के कारखाने:-
– देश में व्हाइट सीमेंट का सबसे बड़ा उत्पादक अल्ट्राटेक सीमेंट (बिरला व्हाइट)
1.वर्ष 1984 – गोटन (नागौर) में जे.के. व्हाइट सीमेंट का कारखाना स्थापित।
2.वर्ष 1988 – खारिया खंगार (जोधपुर) में बिड़ला व्हाइट सीमेंट का कारखाना स्थापित किया गया।
3. अम्बुजा व्हाइट सीमेन्ट, मुण्डवा (नागौर) में स्थापित है।
अल्ट्राटेक सीमेंट
– अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड – भारत की सबसे बड़ी सीमेन्ट निर्माता कम्पनी है।
– अल्ट्राटेक सीमेन्ट कोटपुतली (जयपुर) में स्थापित है जो वर्तमान में सर्वाधिक सीमेन्ट उत्पादन वाला कारखाना है।
– अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड की दो इकाइयाँ प्रस्तावित हैं-
1. नवलगढ़ (झुंझुनूँ) 2. जैतारण (पाली)
लाफार्ज सीमेंट (फ्रांस)
– विश्व की सबसे बड़ी सीमेंट उत्पादक कम्पनी फ्रांस की लाफार्ज सीमेन्ट कम्पनी द्वारा चित्तौड़गढ़ के भावलिया ग्राम में सीमेंट
प्लांट लगाया गया है।
– राजस्थान में सीमेंट उत्पादन में चित्तौड़गढ़ प्रथम स्थान पर है।
– जे.के. सीमेन्ट (1974) का सर्वाधिक उत्पादन निम्बाहेड़ा (चित्तौड़गढ़) में होता है।
अन्य कारखाने-
– बिड़ला मंगलम सीमेंट(1982)- मोडक (कोटा)
– राज श्री सीमेंट- ब्यावर (अजमेर)
– जे.के लक्ष्मी सीमेंट (1982) व बिनानी सीमेंट(1997)-पिंडवाड़ा- (सिरोही)
– श्रीराम सीमेंट- रामनगर (कोटा)
– श्री सीमेंट उद्योग- ब्यावर (अजमेर)
अभ्रक ईंट उद्योग-
– यह उद्योग भीलवाड़ा में स्थापित है।
– भारत में इसका उद्योग धनबाद (झारखण्ड) में स्थित है।
– माइकासाइट – अभ्रक के चूर्ण से चद्दर या ईंट बनाना जिसका
उपयोग विद्युतरोधी उपकरणों में किया जाता है।
रत्न आभूषण उद्योग-
– रत्न आभूषण उद्योग और पन्ना मण्डी जयपुर में स्थित है।
– जेम्स एण्ड ज्वैलरी (SEZ – विशेष आर्थिक क्षेत्र) की स्थापना सीतापुर (जयपुर) में दो इकाइयों के रूप में की गई।
संगमरमर उद्योग-
– संगमरमर प्रोसेसिंग इकाइयाँ, राजसमंद जिले में स्थित हैं।
– संगमरमर मूर्ति उद्योग, जयपुर में स्थित है।
– संगमरमर मूर्ति उद्योग को बढ़ावा देने के लिए रीको द्वारा C-DOS (सेन्टर फॉर डवलपमेंट ऑफ स्टोन) की स्थापना की गई।
– राजस्थान में संगमरमर मण्डी, किशनगढ़ (अजमेर) में स्थित है।
काँच उद्योग
– काँच निर्माण में बालू मिट्टी, सिलिका, शीशा तथा सोडियम सल्फेट आदि कच्चा माल प्रयुक्त होता है।
– राजस्थान में काँच का सामान बनाने के लिए पर्याप्त कच्चा . कोयला, सोडा मिट्टी, चूने का पत्थर तथा शोरा जैसे खनिज पदार्थों की आवश्यकता पड़ती है। सिलिका सैण्ड राजस्थान में बीकानेर, बूँदी और धौलपुर में उत्तम श्रेणी का उपलब्ध है।
– राजस्थान में काँच उद्योग का विकास मुख्य रूप से धौलपुर में हुआ है। यहाँ श्रेष्ठ किस्म की बालू पाई जाती है तथा परिवहन की दृष्टि से भी यह स्थान सभी केन्द्रों से जुड़ा हुआ है।
– काँच उद्योग संबंधी इकाइयाँ
1. दी हाइटेक प्रिसिजन ग्लास फैक्ट्री- धौलपुर (1964)
– यह गंगानगर शुगर मिल्स की सहायक कम्पनी है। इसमें शराब की बोतलों का निर्माण किया जाता है।
2. धौलपुर ग्लास वर्क्स – धौलपुर (1945)
3. सेमकोर ग्लास इंडस्ट्रीज– कोटा (1983- यह टेलीविजन (सेमसंग tv) की पिक्चर ट्यूब बनाने का कार्य करती है वर्तमान में बंद है।
4. सेन्ट गोबेन ग्लास फैक्ट्री (2010) – कहरानी (भिवाड़ी)-
– यह एशिया की सबसे बड़ी फ्लोर ग्लास की फ्रांस की कम्पनी है।
– सेंट गोबेन कम्पनी ने रीको की सहायता से घिलोट-अलवर में काँच व सिरेमिक जोन की स्थापना की है।
– राज्य में सवाईमाधोपुर, बूँदी, बीकानेर, जयपुर एवं उदयपुर में काँच उद्योग के विकास की विपुल संभावनाएँ हैं। बीकानेर में सिरेमिक पार्क स्थापित किया जा रहा है।
नमक उद्योग
– राजस्थान नमक उत्पादन में देश में तीसरे स्थान पर है – प्रथम गुजरात तथा दूसरे स्थान पर तमिलनाडु है।
– देश का 9-12 % नमक का उत्पादन राजस्थान में होता है।
– आंतरिक जल स्रोतों से नमक उत्पादन में राजस्थान प्रथम स्थान पर है।
– राजस्थान में खारे पानी की झीलों के विद्यमान होने के कारण नमक उत्पादन हेतु प्राकृतिक स्थितियाँ काफी अनुकूल हैं।
– नमक उत्पादन की दो प्रमुख विधियाँ हैं-
1. वाष्पीकरण विधि –
– राजस्थान में तापमान ज्यादा होने के वाष्पीकरण ज्यादा होने से नमक सतह पर जम जाता है खारे पानी की झीलों से मार्च अप्रैल में वाष्पीकरण विधि द्वारा नमक तैयार किया जाता है। जिसे क्यार पद्दति कहते हैं।
2. निधार विधि –
– सांभर झील में नमक बनाने की विधि को रेस्ता पद्धति कहते हैं।
नोट – डीडवाना नमक क्षेत्र में ‘देवल’ नामक संस्था परम्परागत रूप से नमक बनाने का कार्य करती है। यहाँ के नमक में सोडियम सल्फेट की मात्रा अधिक होने के कारण यह नमक खाने योग्य नहीं होता है।
– पचपदरा झील में खारवाल जाति के लोगों द्वारा मोरली झाड़ी की सहायता से नमक तैयार किया जाता है।
सहकारी क्षेत्र में नमक उद्योग की इकाइयाँ
1. सांभर साल्ट लिमिटेड, जयपुर –
– स्थापना – 1964
– देश का 8.7% नमक सांभर झील से उत्पादित किया जाता है।
2. राज स्थान स्टेट केमिकल वर्क्स-डीडवाना (नागौर)
– स्थापना – 1964
– डीडवाना झील से केमिकल ग्रेड का नमक उत्पादन किया जाता है
3. पचपदरा साल्ट लिमिटेड – बाड़मेर
– स्थापना – 1960
– पचपदरा झील के नमक उत्पादन में आयोडीन की मात्रा सर्वाधिक पाई जाती है। खाने में सर्वोत्तम।
4. मॉडल साल्ट फार्म, नावां (नागौर)
– स्थापना – जनवरी, 2002
निजी क्षेत्र में नमक उद्योग इकाइयाँ
लूणकरणसर – बीकानेर
फलोदी – जोधपुर
पोकरण – जैसलमेर
जाब्दी नगर – नागौर
रेवासा – सीकर
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धातु उद्योग
– राजस्थान में अनेक धात्विक खनिज उपलब्ध हैं – ताँबा, जस्ता, सीसा, चाँदी, लोहा, मैंगनीज, टंगस्टन आदि।
– धातुओं पर आधारित उद्योगों की दृष्टि से राजस्थान में ताँबा और जस्ता उद्योग महत्त्वपूर्ण हैं।
(i) ताँबा उद्योग
– हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड भारत सरकार का उपक्रम है, जो झुंझुनूँ जिले के खेतड़ी गाँव के निकट स्थापित है – 09 नवंबर, 1967
– इसकी स्थापना संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की वेस्टर्न नेप इंजीनियरिंग कंपनी की सहायता से की गई।
– इसका प्रधान कार्यालय कोलकाता में है।
– इसके अंतर्गत राज्य में अन्य परियोजनाएँ कार्यरत हैं-
1. खेतड़ी कॉपर कॉम्प्लेक्स, खेतड़ी नगर, झुंझुनूँ – देश की सबसे बड़ी ताम्र खनन एवं शोधक इकाई है।
2. चाँदमारी ताम्र परियोजना, झुंझुनूँ
3. दरीबा ताम्र परियोजना , अलवर
(ii) जस्ता उद्योग (Zinc Industry)
– हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड, उदयपुर के निकट देबारी में स्थित है।
– जस्ता परिद्रावक संयंत्र से न केवल जस्ता अपितु कैडमियम, चाँदी, सिंगल सुपर फॉस्फेट और गंधक तेजाब भी तैयार किया जाता है।
– हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड की एक नई परियोजना भीलवाड़ा जिले में ‘’रामपुरा – आगुचा’’ में स्थापित की गई।
– चित्तौड़गढ़ जिले में चन्देरिया सीसा – जस्ता प्रदावक स्थापित किया गया।
तेल एवं प्राकृतिक गैस-
– संयुक्त राज्य अमेरिका एवं चीन के बाद भारत विश्व में कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। देश में विश्व का लगभग 5 प्रतिशत कच्चा तेल खपत होता है।
– भारत कुल घरेलू उपभोग का लगभग 16 प्रतिशत कच्चा तेल उत्पादित करता है, जबकि शेष 84 प्रतिशत खपत की आवश्यकताएँ आयात से पूर्ण होती हैं।
– राजस्थान भारत में कच्चे तेल का महत्त्वपूर्ण उत्पादक है। भारत के कच्चे तेल के कुल उत्पादन (30 एम.एम.टी.पी.ए.) में राज्य का योगदान लगभग 20 प्रतिशत (6 मिलियन मीट्रिक टन प्रतिवर्ष) है और यह बॉम्बे हाई, जो कि लगभग 40 प्रतिशत का योगदान देता है, के बाद दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।
– राज्य में पेट्रोलियम उत्पादक क्षेत्र निम्नलिखित 4 पेट्रोलीफेरस बेसिन के अन्तर्गत लगभग 1,50,000 वर्ग किमी. (14 जिले) क्षेत्र में विस्तृत है।
i. बाड़मेर-सांचौर बेसिन – (बाड़मेर एवं जालोर जिले)
ii. जैसलमेर बेसिन- (जैसलमेर जिला)
iii. बीकानेर – नागौर बेसिन – (बीकानेर, नागौर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ एवं चूरू जिले)
iv. विंध्यन बेसिन – (कोटा, बाराँ, बूँदी, झालावाड़ जिले तथा भीलवाड़ा एवं चित्तौड़गढ़ जिलों का कुछ हिस्सा)
अन्य तथ्य
– बाड़मेर से प्राकृतिक गैस का उत्पादन वर्ष 2012 से प्रारम्भ हुआ।
– जैसलमेर से प्राकृतिक गैस का उत्पादन वर्ष 1994 से प्रारम्भ हुआ।
– जैसलमेर जिले के बाघेवाला क्षेत्र से लगभग 43624 बैरल भारी तेल का दोहन किया गया है। वर्तमान में 150 बैरल प्रतिदिन भारी तेल का उत्पादन किया जा रहा है।
– मैसर्स फोकस एनर्जी द्वारा 8 जुलाई, 2010 को प्राकृतिक गैस का उत्पादन आरम्भ किया गया, और वर्तमान में रामगढ़ विद्युत संयंत्र (110 मेगावॉट एवं 160 मेगावॉट) को आपूर्ति करने के लिए 3 लाख घनमीटर प्रतिदिन उत्पादन किया जा रहा है।
मंगला तेल क्षेत्र, बाड़मेर
– मंगला तेल क्षेत्र से खनिज तेल का व्यावसायिक उत्पादन 29 अगस्त, 2009 को प्रारम्भ हुआ और वर्तमान में 14 क्षेत्रों यथा- मंगला, भाग्यम, ऐश्वर्या, सरस्वती, रागेश्वरी, कामेश्वरी एवं अन्य सेटेलाइट क्षेत्र से लगभग 1,60,000 बैरल्स खनिज तेल का प्रतिदिन उत्पादन किया जा रहा है।
राजस्थान रिफाइनरी परियोजना-
– 9 मिलियन टन वार्षिक क्षमता की राजस्थान रिफाइनरी सह-पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स परियोजना के कार्य का शुभारम्भ 16 जनवरी, 2018 को पचपदरा, जिला बाड़मेर में किया गया।
– इस परियोजना में हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (एच.पी.सी.एल.) एवं राजस्थान सरकार का संयुक्त उद्यम परियोजना में क्रमश: 74 प्रतिशत और 26 प्रतिशत की इक्विटी भागीदारी है।
– देश की प्रथम ऐसी परियोजना है, जिसमें रिफाइनरी पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स का सम्मिश्रण है।
– परियोजना में लागत 43,129 करोड़ रुपये है।
– रिफाइनरी से निकलने वाले उत्पाद- बी.एस.-VI के उत्पादों का उत्पादन करेगी।
रासायनिक उद्योग
– ‘’राजस्थान स्टेट केमिकल्स वर्क्स लिमिटेड’’ डीडवाना (नागौर) में कार्यरत है।
– राजस्थान का प्रथम जैव उवर्रक खाद कारखाना, भरतपुर है।
– RSMML एवं राष्ट्रीय केमिकल्स एण्ड फर्टिलाइजर लिमिटेड (RCPL) ने मिलकर कपासन, चित्तौड़गढ़ में 425 करोड़ रुपये की लागत से राजस्थान राष्ट्र केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर नाम से डीएपी खाद का कारखाना स्थापित किया।
प्रमुख रसायन एवं उवर्रक कारखानें :-
– श्रीराम फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल लिमिटेड – कोटा
– रासायनिक खाद का उत्पादन, जिंक स्मेल्टर देबारी (उदयपुर)
– ज्योति – ट्रिपल खाद्य कारखाना – खेतड़ी, झुंझुनूँ
– सल्फ्यूरिक एसिड प्लांट – अलवर
– चम्बल फर्टिलाइजर एंड केमिकल इंडस्ट्रीज, गढ़ेपान (कोटा)
– देश का सबसे बड़ा निजी रासायनिक खाद कारखाना
– मोदी एल्केलाइन एंड केमिकल लिमिटेड – अलवर
– शुष्क अमोनिया सल्फेट उर्वरक संयंत्र – चित्तौड़गढ़
उर्वरक उद्योग
– यह राज्य का आधारभूत उद्योग है।
– राज्य में सर्वाधिक उर्वरक कारखाने, उदयपुर में है।
1. फॉस्फेट उर्वरक
– उदयपुर
– कोटा
– श्रीगंगानगर
– खेतड़ी
2. कैल्सियम कार्बाइड
– उदयपुर
– धौलपुर
3. पाइराइट्स एवं फॉस्फेट लिमिटेड
– नीम का थाना – सीकर
कोटा में उर्वरक कारखानें
1. श्री राम फर्टिलाइजर्स – कोटा
2. चम्बल फर्टिलाइजर्स – गढे़पान, कोटा
3. जीवन फर्टिलाइजर्स – कोटा
अन्य उद्योग
तकनीकी उद्योग
1. जयपुर मेटल्स – जयपुर
– यह विद्युत मीटर बनाने का कार्य करती है।
2. कैप्सन मीटर – जयपुर, पाली
– पानी के मीटर बनाने का काम।
3. नेशनल इंजीनियरिंग, जयपुर
– बॉल बियरिंग बनाने में एशिया की सबसे बड़ी कम्पनी है।
4. राजस्थान इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड़ – जयपुर
– यह टेलीविजन बनाने का कार्य करती है।
5. सिमको वैगन फैक्ट्री – भरतपुर
– रेल के9 डिब्बे बनाने का कार्य।
6. फ्लोर्सपार संयंत्र – डूँगरपुर – फ्लोराइड बनाना
7. इंस्ट्रूमेंटेशन लिमिटेड – कोटा –
विद्युत उपकरण बनाने का कार्य।
हस्तशिल्प उद्योग
– राजस्थान के आर्थिक विकास में हस्तशिल्प अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, यहाँ का हस्तशिल्प विश्व प्रसिद्ध है।
– हस्तकला – हाथों से बनाई गई वस्तुएँ, कलाकारी
– हस्तशिल्प उद्योग कुटीर व टाईनी उद्योगों की श्रेणी में आता है।
– क्षेत्र स्थानीय लोगों को रोजगार के साथ-साथ राज्य को सर्वाधिक विदेशी मुद्रा हस्तकला उद्योग से ही प्राप्त होती है।
– एक मोटे अनुमान के अनुसार राज्य में 407700 हस्तशिल्प – ग्रामीण – 202212 एवं शहरी – 205488 इकाइयाँ कार्यरत हैं।
– राजस्थान में हस्तकला को बढ़ावा देने तथा प्रोत्साहित करने के लिए उदयपुर में शिल्प ग्राम, जोधपुर में पाल शिल्प ग्राम तथा जयपुर में जवाहर कला केन्द्र की स्थापना की गई।
– राजस्थान में हस्तकला का सबसे बड़ा केन्द्र ‘बोरानाडा’ (जोधपुर) है।
हस्तशिल्प के निर्यात
– हैंडीक्राफ्ट मेगा क्लस्टर जोधपुर: ये करीब 108 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट है।
– भारत सरकार ने जोधपुर और बाड़मेर के आसपास के क्षेत्रों को कपड़ा मंत्रालय की “व्यापक हस्तशिल्प क्लस्टर विकास योजना” (“Comprehensive Handicrafts Cluster Development Scheme” (CHCDS)) के तहत लागू किए जाने वाले मेगा क्लस्टर में से एक के रूप में पहचाना है।
– इस योजना का उद्देश्य बुनियादी ढाँचे को बढ़ाकर, मूल्य श्रृंखला को मजबूत करके और विभिन्न क्लस्टर हितधारकों की क्षमताओं का निर्माण करके विकास का एक समावेशी मॉडल प्रदान करना है।
– कपड़ा मंत्रालय के विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) के कार्यालय ने Export Promotion Council for Handicrafts (ईपीसीएच) को निम्नलिखित कार्यक्रम स्वीकृत किए हैं :
1. कौशल विकास कार्यक्रम-
2. बाजार संवर्द्धन- घरेलू बाजारों और उभरते अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर विशेष ध्यान देने के साथ समेकित रणनीतियों के विकास के माध्यम से क्लस्टर के साथ बाजार संबंधों को मजबूत करना है।
3. बोरानाडा, जोधपुर में व्यापार सुविधा केंद्र की स्थापना- व्यापार मेलों, खुदरा प्रदर्शनियों, क्रेता-विक्रेता बैठकों, विशेष प्रचार कार्यक्रमों, कार्यशालाओं, सम्मेलनों और फैशन कार्यक्रमों के आयोजन के लिए एक मंच प्रदान करना।
क्लस्टर उद्योग
(1) कोटा डोरिया निर्माण क्लस्टर उद्योग-कैथून (कोटा)
(2) टेरी कोटा खादी निर्मित क्लस्टर उद्योग – मांगरोल (बाराँ)
(3) राइस क्लस्टर – बूँदी
(4) शहद क्लस्टर – भरतपुर
(5) गोटा निर्माण क्लस्टर उद्योग – सीकर और ब्यावर (अजमेर)
(6) छपाई निर्माण क्लस्टर उद्योग – (अजमेर)
(7) आरातारी निर्माण क्लस्टर उद्योग- नायला (अजमेर)
(8) तालछापर हस्त शिल्प परियोजना – चूरू
(9) टेराकोटा निर्माण क्लस्टर-मोलेला गाँव (राजसमंद)
(10) टेराकोटा मूर्ति निर्माण क्लस्टर- गोला का बास (अलवर)
(11) पत्थर की मूर्ति निर्माण- तलवाड़ा (बाँसवाड़ा)
(12) स्टोन क्लस्टर – जैसलमेर
(13) काँच पर कसीदाकारी क्लस्टर. – धनाऊ (बाड़मेर)
(14) चर्म जूती क्लस्टर- भीनमाल (जालौर)
(15) चर्म रंगाई छपाई क्लस्टर-बानसूर (अलवर)
(16) डाई- टाई क्लस्टर (जोधपुर)
– राजस्थान में हस्तशिल्प के निर्यात में वृद्धि हेतु राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदम
– स्पेशल इकोनॉमिक जोन पर हैण्डीक्राफ्ट, बोरानाडा जोधपुर
– निर्यात संवर्द्धन औद्योगिक पार्क, बोरानाडा (जोधपुर)
– एयर कार्गो कॉम्प्लेक्स, जयपुर
– इन्लैण्ड कंटेनर, डिपो – सूखा बंदरगाह
– हस्तशिल्पियों को निर्यात पुरस्कार – निर्यातकों को प्रोत्साहन देना।
हस्तशिल्प के लिए निर्यात संवर्द्धन परिषद् (EPCH)
– EPCH की स्थापना कंपनी अधिनियम के तहत वर्ष 1986-87 में की गई थी और यह एक गैर-लाभकारी संगठन है, जिसका उद्देश्य हस्तशिल्प के निर्यात को बढ़ावा देना, समर्थन करना, सुरक्षा करना, बनाए रखना और बढ़ाना है।
– यह देश से हस्तशिल्प के निर्यात को बढ़ावा देने और हस्तशिल्प वस्तुओं और सेवाओं की उच्च गुणवत्ता के विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता के रूप में विदेशों में भारत की छवि पेश करने के लिए हस्तशिल्प निर्यातकों का एक शीर्ष निकाय है और अंतरराष्ट्रीय मानकों और विनिर्देशों के पालन को ध्यान में रखते हुए विभिन्न उपायों को सुनिश्चित करता है।
– परिषद् ने आवश्यक बुनियादी ढाँचे के साथ-साथ विपणन और सूचना सुविधाओं का निर्माण किया है, जिसका लाभ सदस्य निर्यातक और आयातक दोनों लेते हैं।
– दस्तकार परिचय पत्र: जिला उद्योग एवं वाणिज्य केन्द्रों के द्वारा हस्तकला से जुड़े 18 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के कारीगरों को ऑनलाइन दस्तकार पहचान पत्र सिंगल साइन ऑन (एस.एस.ओ.) पोर्टल के माध्यम से जारी किया जाता है। कार्यालय विकास आयुक्त, हस्तशिल्प, भारत सरकार द्वारा भी हस्तशिल्पियों के लिए “पहचान पत्र जारी किए जाते हैं। वित्तीय वर्ष 2021-22 (दिसम्बर, 2021 तक) के दौरान विकास आयुक्त, हस्तशिल्प राजस्थान द्वारा कुल 1,485 दस्तकारों के परिचय पत्र जारी किए गए हैं।
हस्तशिल्प व खादी से संबंधित तथ्य-
1. अखिल भारतीय खादी बोर्ड की स्थापना- 1923
2. राजस्थान चरखा संघ का कार्य 1925 में अजमेर में हुआ।
3. राजस्थान में 1926 में अमरसर (जयपुर) में चरखा संघ का प्रथम
उत्पत्ति केन्द्र बनाया गया तथा बाद में सन् 1935 में इसको गोविंदगढ़ (जयपुर) में स्थानान्तरित कर दिया गया।
4. राजस्थान में चरखा संघ का कार्यालय 1927 में जयपुर में स्थापित किया गया।
5. “अखिल भारतीय चरखा संघ” की स्थापना 1952 में की गई।
6. राजस्थान खादी एवं बोर्ड की स्थापना 1955 में की गई है।
7. एम. राधाकृष्णराय समिति का गठन (1984-85) खादी एवं ग्रामोद्योग की समीक्षा करने के लिए गठित की गई है।
8. राजस्थान में 1957 में खादी ग्रामोद्योग संस्था संघ की शुरुआत की गई।
9. राज्य में सिरेमिक इलेक्ट्रिकल रिसर्च एण्ड डवलपमेंट सेंटर बीकानेर की स्थापना 2010 में की गई है।
10. भारतीय ऊन बोर्ड का मुख्यालय जयपुर में है।
11. “ऑपरेशन मोजड़ी कार्यक्रम” राज्य में नागौर, जयपुर एवं जोधपुर में संचालित है।
12. राज्य में “हस्तशिल्प डिजाइन विकास एवं शोध केन्द्र” जयपुर में जबकि “फुटवियर डिजाइन एवं डवलपमेंट इन्स्टीट्यूट” जोधपुर में स्थापित किया गया है।
13. ‘मीनाकारी’ कार्य के लिए कुदरतसिंह जबकि ‘ब्लू पॉटरी’ के लिए कृपाल सिंह शेखावत प्रसिद्ध हैं।
14. बीकानेर, मथैरण एवं कैमल हाइड कला के लिए प्रसिद्ध है।
15. राजस्थान में ‘फुटवियर डिजाइन एवं डवलपमेंट इंस्टीट्यूट’ की स्थापना जोधपुर में की गई है।
राजस्थान में हथकरघा से जुड़ी हुई संस्थाएँ-
1. राजस्थान राज्य हथकरघा विकास निगम लिमिटेड
– इसकी स्थापना कंपनी अधिनियम -1956 के अंर्तगत अप्रैल 1984 में जयपुर में की गई।
– इस निगम में 6 क्षेत्रीय कार्यालय – जयपुर, बीकानेर, जोधपुर, अजमेर, कोटा एवं उदयपुर।
– इसके अतिरिक्त निगम की 16 विपणन इकाइयाँ स्थापित हैं।
2. राजस्थान राज्य सहकारी बुनकर संघ
– इसकी स्थापना 26 अगस्त 1957 को जयपुर में की गई।
– बुनकर संघ द्वारा राज्य में 16 एवं राज्य के बाहर नई दिल्ली में एक डिपो संचालित है।
3. बुनकर सेवा केंद्र– भारत सरकार द्वारा जुलाई 1978 में बुनकर सेवा केंद्र की स्थापना जयपुर में की गई है।
4. भारतीय हाथकरघा प्रौद्योगिकी संस्थान- राज्य में हाथकरघा का प्रशिक्षण (3 वर्षीय डिप्लोमा कोर्स) दिए जाने हेतु जोधपुर में भारतीय हाथकरघा प्रौद्योगिकी संस्थान कार्यरत है।
निवेश के आधार पर
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एम.एस.एम.ई.)
उद्यम वर्गीकरण के मानदण्डों में दिनांक 1 जुलाई, 2020 से परिवर्तन के परिणामस्वरूप एक उद्यम को निम्नलिखित मानदण्डों के आधार पर सूक्ष्म, लघु या मध्यम उद्यमों के रूप में वर्गीकृत किया जा रहा है, अर्थात:
उद्योग | निवेश के आधार पर | टर्नओवर के आधार पर |
सूक्ष्म | 1 करोड़ रुपये तक | 0 – 5 करोड़ रुपये तक |
लघु | 1 करोड़ से 10 करोड़ रुपये तक | 5 से 50 करोड़ रुपये
|
मध्यम | 10 करोड़ से 50 करोड़ रुपये तक | 50 – 250 करोड़ रुपये तक |
– सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम रजिस्ट्रीकरणः
संशोधित एम.एस.एम.ई. परिभाषा के अनुसार एम.एस.एम.ई. पंजीकरण की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए एम.एस.एम.ई., मंत्रालय द्वारा 1 जुलाई, 2020 को एक नया पोर्टल उद्यम पंजीकरण पोर्टल (https://udyamregistration.gov.in) लॉन्च किया गया है। वित्तीय वर्ष 2021-22 (दिसम्बर, 2021 तक) के दौरान कुल 2,02,947 औद्योगिक इकाइयों के उद्यम का पंजीकरण पोर्टल पर पंजीयन किया गया। इन इकाइयों में 17,699.46 करोड़ के निवेश से 11,28,082 व्यक्तियों के लिए प्रत्यक्ष रोजगार के अवसर उत्पन्न किये गये हैं।
– राजस्थान सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यम (फैसिलिटेशन ऑफ इस्टोब्लिशमेंट एण्ड ऑपरेशन) अधिनियम, 2019: राज्य में सूक्ष्म, लघु (फैसिलिटेशन ऑफ एस्टेबलिशमेंट एण्ड ऑपरेशन) अधिनियम-2019″ लागू किया गया।
– राजस्थान सरकार ने इस अधिनियम के निष्पादन हेतु, 12 जून, 2019 को एक वेब पोर्टल (https://rajudyogmitra.rajasthan.gov.in/) लॉन्च किया, जिस पर आवेदन दर्ज किए जाते हैं।
– इसमें एमएसएमई इकाई को, इलेक्ट्रॉनिक या भौतिक रूप से ‘डिक्लेरेशन ऑफ इंटेंट’ नोडल एजेंसी को प्रस्तुत करने की आवश्यकता होती है, जिस पर एक ‘पावती प्रमाण पत्र’ (Acknowledgement Certificate) जारी किया जाता है, पावती प्रमाण पत्र जारी होने से लेकर 3 साल तक आवेदक को राज्य के सभी कानूनों के तहत अनुमोदन और निरीक्षण से छूट दी जाएगी।
– इस पोर्टल के माध्यम से वित्तीय वर्ष 2021-22 (दिसंबर, 2021 तक) में 2,766 डिक्लेरेशन ऑफ इंटेंट प्राप्त हुए एवं उनको तुरंत प्रभाव से पावती प्रमाणपत्र जारी किए जा चुके हैं। इनमें से 1,393 सूक्ष्म (माइक्रो) श्रेणी, 811 लघु श्रेणी और 562 मध्यम श्रेणी के प्रमाण-पत्र जारी किए गए हैं।
– विनिर्माण में कुल 30 थ्रस्ट सेक्टर व 14 थ्रस्ट सेक्टर सेवा क्षेत्र में है।
– राजस्थान उद्योग रत्न पुरस्कार योजना (2016) के अंतर्गत वर्ष 2020-21 में 4 उद्यमियों को उद्योग रत्न, 1 हस्त शिल्पी रत्न पुरस्कार एवं 1 बुनकर को बुनकर पुरस्कार हेतु चयन किया गया।
राज्य के प्रमुख लघु, कुटीर, खादी ग्रामोद्योग-
वृहद उद्योग-
– वे उद्योग जिसमें अत्यधिक मात्रा में पूँजी निवेश, मशीनीकरण तथा तकनीक की सहायता से उच्च उत्पादन किया जाता है: जैसे – लोहा इस्पात तथा रिफाइनरी।
कुटीर उद्योग-
– कुटीर उद्योग से आशय एक ही परिवार के सदस्यों द्वारा किए जाने वाले उत्पादन कार्य अर्थात् कुटीर उद्योग लगभग पूरी तरह घरेलू उद्योग होते हैं।
– इसमें उत्पादन कार्य मशीनों के बजाय हाथों से किए जाते हैं इसमें बाहरी श्रम का उपयोग नहीं होता।
– कुटीर उद्योगों को दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है – ग्रामीण कुटीर उद्योग तथा शहरी कुटीर उद्योग।
ग्रामोद्योग –
– दस हजार तक की आबादी वाले क्षेत्रों में कम पूँजी निवेश करके किए जाने वाले उत्पादन कार्य ग्रामोद्योग कहलाते हैं।
– खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड की स्थापना असंगठित क्षेत्र के कारीगरों को रोजगार प्रदान करने, उच्च गुणवत्तायुक्त उत्पादों के उत्पादन में सहायता प्रदान करने, दस्तकारों को प्रशिक्षण प्रदान करने और आत्मनिर्भरता की भावना जाग्रत करने के लिए की गई।
– राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में खादी तथा ग्रामोद्योग के माध्यम से स्वरोजगार उपलब्ध करवाने में राजस्थान खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। वर्तमान में, राज्य में खादी एवं ग्रामोद्योग द्वारा निम्नलिखित योजनाएँ क्रियान्वित की जा रही है-
राज्य के प्रमुख लघु, कुटीर, खादी ग्रामोद्योग | ||
क्र.सं. | लघु, कुटीर, खादी ग्रामोद्योग | स्थान |
1 | लकड़ी के खिलौनें | उदयपुर, सवाई माधोपुर |
2 | रसील/वुडन फर्नीचर | बीकानेर/चित्तौड़गढ़ |
3 | पापड़ भुजिया | बीकानेर |
4 | लकड़ी का नक्काशीदार फर्नीचर | बाड़मेर |
5 | मटके, सुराही | रामसर (बीकानेर) |
6 | वुडन/पेटेंड फर्नीचर | किशनगढ़ (अजमेर) |
7 | सरसों का इंजन छाप तेल | भरतपुर |
8 | आम पापड़ | बाँसवाड़ा |
9 | सरसों का वीर बालक छाप तेल | जयपुर |
10 | मेहंदी | सोजत |
11 | बादला एवं मोठड़े | जोधपुर |
12 | कुप्पों पर मोमबत्ती का काम | बीकानेर |
13 | तार कशी के जेवर | नाथद्वारा |
14 | नमदे की दरियाँ | टोंक |
15 | गोटा किनारी | खण्डेला (सीकर) |
16 | नांदणे (घाघरे की छपी फड़द) | भीलवाड़ा |
17 | ब्लू पॉटरी | जयपुर, नेवटा(सांगानेर) |
18 | शीशम की फर्नीचर | हनुमानगढ़/श्रीगंगानगर |
19 | चमड़े की मोजड़ियाँ | जोधपुर, जयपुर, नागौर |
20 | कागजी टेराकोटा | अलवर |
21 | सुनहरी टेराकोटा | बीकानेर |
22 | कठपुतलियाँ | उदयपुर |
23 | थेवा कला | प्रतापगढ़ |
24 | फड़ चित्रण | शाहपुरा (भीलवाड़ा) |
25 | रामदेवजी के घोड़े | पोकरण (जैसलमेर) |
26 | कृषिगत औजार | गजसिंहपुर(श्रीगंगानगर) |
27 | मिनिएचर पेंटिंग्स | जोधपुर, जयपुर,किशनगढ़ |
28 | आजम प्रिण्ट | आकोला (चित्तौड़गढ़) |
29 | अजरक व मलीर प्रिण्ट | बाड़मेर |
30 | लाख की पॉटरी, मोण्डे | बीकानेर |
31 | चुनरी | जोधपुर |
32 | पीतल पर मुरादाबादीनक्काशी का काम | जयपुर |
33 | मसूरिया व कोटा डोरिया | कैथून (कोटा)/मांगरोल(बाराँ) |
34 | मिट्टी के खिलौने | मोलेला (नाथद्वारा),बस्सी (चित्तौड़गढ़) |
35 | पत्थर की मूर्तियाँ (संगमरमर) | जयपुर |
36 | पत्थर की मूर्तियाँ (लाल पत्थर) | थानागाजी (अलवर) |
37 | गरासियों की फाग (आंठनी) | सोजत |
38 | ऊनी बरडी, पट्टू एवं लोई | जैसलमेर |
39 | पेचवर्क व चटापटी का कार्य | शेखावाटी |
40 | पाव रजाई | जयपुर |
41 | जस्ते की मूर्तियाँ व वस्तुएँ | जोधपुर |
42 | खेंसले | लेटा (जालोर) |
43 | दरियाँ | टाकला (नागौर) |
44 | ऊनी कंबल | बीकानेर/जैसलमेर |
45 | खेस | चौमू (जयपुर) |
46 | लाख का काम | जयपुर |
47 | मीनाकारी एवं कुंदन कार्य | जयपुर |
48 | कोफ्तागिरी व तहनिशा कार्य | जयपुर |
49 | पेपरमेशी (कुट्टी) का नाम | जयपुर, उदयपुर |
50 | सूंघनी नसवार | ब्यावर |
51 | लकड़ी की कावड़ | बस्सी (चित्तौड़गढ़) |
52 | लहरिया एवं पोमचा | जयपुर |
53 | लकड़ी के झूले | जोधपुर |
54 | हाथीदाँत एवं चंदन पर खुदाई एवं पेंटिंग्स | जयपुर |
55 | रमकड़ा (सोप स्टोन के तराशे हुए खिलौने) | गलियाकोट (डूँगरपुर) |
56 | गलीचे | जयपुर, बीकानेर |
– वनोपज पर आधारित उद्योगों में बीड़ी उद्योग – टोंक, भीलवाड़ा, ब्यावर, अजमेर
– राज्य में ऊनी धागा – बीकानेर, चूरू, लाडनूं व कोटा में संचालित। ऊनी खादी – जैसलमेर व बरड़ी, बीकानेर के ऊनी कम्बल।
अन्य उद्योग
राजस्थान के अन्य उद्योग
राजस्थान के अन्य उद्योग
1. सेन्ट्रल इण्डिया मशीनरी मेन्यूफेक्चरिंग कम्पनी
[CIMCO- सिमको] – भरतपुर (रेलवे डिब्बे)
2. इन्स्ट्रमेन्टेशन लिमिटेड – कोटा
(थर्मल पॉवर एवं रासायनिक उद्योगों की मशीनरी)
3. नेशनल इंजीनियरिंग इण्डस्ट्रीज – जयपुर (बॉल बियरिंग)
4. राजस्थान इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन – जयपुर (टेलीविजन)
5. राजस्थान टेलीफोन इण्डस्ट्रीज – भिवाड़ी (अलवर) (टेलीफोन)
6. केपस्टन मीटर कम्पनी – जयपुर/अलवर (पानी के मीटर)
8. अशोका लिलैण्ड – अलवर
9. अवन्ती स्कूटर – अलवर
10. आयशर ट्रैक्टर – अलवर
11. पानी के पम्प बनाने का कारखाना- लूणकरणसर (बीकानेर)
12. खेलकूद सामग्री बनाने का कारखाना – हनुमानगढ़
13. कृषि औजार बनाने का कारखाना – गजसिंहपुरा (श्रीगंगानगर)
14. कृषि मशीनरी बनाने का कारखाना – नागौर
15. बिजली के मीटर बनाने का कारखाना – जयपुर
सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम
– केन्द्र सरकार के उपक्रम।
1. हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड – उदयपुर
– स्थापना – 1966 – उदयपुर
– कार्य – जिंक शोधन
– एशिया का सबसे बड़ा जिंक शोधन कारखाना।
– वर्तमान में वेदान्ता रिसोर्सेज द्वारा उत्पादन।
– जिंक स्मेल्टर प्लांट – देबारी (उदयपुर) चंदेरिया (चित्तौड़गढ़)
2. हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड – खेतड़ी
– स्थापना – 1967 (संयुक्त राज्य अमेरिका की सहायता से)
यह खेतड़ी (झुंझुनूँ) के आस-पास ताम्र अयस्क के खनन एवं परिशोधन का कार्य करता है।
3. हिंदुस्तान मशीन टूल्स – (HMT) – अजमेर
– स्थापना – 1967 में अजमेर इकाई को प्रारंभ।
– HMT की स्थापना चेकोस्लोवाकिया की सहायता से की गई ।
– HMT द्वारा मशीनी उपकरण तैयार करने का कार्य किया जाता है।
4. इंस्ट्रूमेंटेशन लिमिटेड – कोटा
– स्थापना – 1964 (रूस की सहायता से स्थापित)
– वर्तमान में यह इकाई बन्द है पर इसकी अन्य सहायक इकाई राजस्थान इलेक्ट्रॉनिक्स व इंस्ट्रूमेंटेशन लिमिटेड – (REIL) है।
– REIL की स्थापना जयपुर में 1981 में की गई यह विद्युत उपकरण बनाने का कार्य करती है।
– इसे मिनी रत्न कम्पनी का दर्जा प्राप्त है।
5. हिंदुस्तान सांभर सॉल्ट लिमिटेड – जयपुर
– स्थापना – 1964 – जयपुर
– हिंदुस्तान सॉल्ट लिमिटेड की सहायक इकाई के रूप में जयपुर में स्थापित जो सांभर झील से नमक उत्पादन का कार्य करती है।
– देश के कुल नमक का 8.7% उत्पादन सांभर झील से होता है।
6. मॉडर्न बेकरीज- जयपुर
– स्थापना – 1965 (वर्तमान में इकाई बंद।)
7. राजस्थान फार्मास्यूटिकल लिमिटेड
– स्थापना – 1978, जयपुर (वर्तमान में इकाई बंद)
8. राजस्थान पेट्रो केमिकल रिफाइनरी
– पचपदरा, बाड़मेर में 16 जनवरी, 2018 को HPCL और राजस्थान सरकार की 74:26 की भागीदारी से रिफाइनरी का उदˎघाटन किया गया।
– 2022 तक रिफाइनरी प्रारंभ करने की घोषणा की गई है।
– BS VI गुणवत्ता मानक द्वारा ईंधन उत्पादन करने वाली देश की प्रथम रिफाइनरी है।
9. राजस्थान इलेक्ट्रॉनिक्स एवं इंजीनियरिंग लिमिटेड – जयपुर – वर्ष 1982 – जर्मनी के सहयोग से
Note – राजस्थान इलेक्ट्रॉनिक्स एवं इंजीनियरिंग लिमिटेड (जयपुर) राजस्थान की एकमात्र मिनरल दर्जा प्राप्त कम्पनी जिसका सन् 2016 में केन्द्र सरकार ने अधिग्रहण कर लिया।
राजस्थान में बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ
1. होण्डा स्कूटर – जापान – टपूकड़ा (अलवर)
2. होण्डा कार – जापान – खुशखेड़ा (अलवर)
3. पिर्टो – ब्राजील – मनोहरपुरा (जयपुर) – ATM मशीन
4. केर्टो – दक्षिण कोरिया – घिलोट (अलवर)
5. नेशनल टायर-ट्यूब – थाइलैण्ड – भिवाड़ी (अलवर)
6. लाफार्ज – फ्रांस – निम्बाहेड़ा (चित्तौड़गढ़) – सीमेंट
7. सेन्ट गोबेन – फ्रांस – भिवाड़ी (अलवर) – काँच
8. एमटेक ऐरी – अमेरिका – महुआ खुर्द – रेल वैगन
9. निप्पन – थाइलैण्ड – अलवर – स्टील पाइप (पाइप मोबाइल्स)
10. जिलेट इण्डिया लिमिटेड – अमेरिका – भिवाड़ी (अलवर) – स्टेनलेस स्टील
राजस्थान में औद्योगिक नीतियाँ
– राजस्थान में अब तक पाँच बार औद्योगिक नीति बन चुकी है। जिसमें से चार नीतियाँ मुख्यमंत्री भैंरोसिंह शेखावत के कार्यकाल में और नई नीति मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कार्यकाल में 19 दिसम्बर, 2019 को जारी हुई।
प्रथम औद्योगिक नीति-
– प्रथम औद्योगिक नीति 24 जून, 1978 को घोषित की गई ।
– इस नीति के अंतर्गत रोजगारोन्मुख उद्योग यथा- खादी, ग्रामोद्योग, हथकरघा व हस्तशिल्प के विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई व असंतुलनों को दूर करने के प्रयास किए गए।
द्वितीय औद्योगिक नीति-
– द्वितीय औद्योगिक नीति दिसम्बर, 1990 को घोषित व अप्रैल, 1991 से लागू की गई ।
– इस नीति के अंतर्गत द्वितीय नीति में खनन, कृषिगत व अन्य साधनों के अधिकतम उपयोग, रोजगार संवर्द्धन तथा औद्योगिकीकरण के माध्यम से राज्य के वित्तीय साधन बढ़ाने पर जोर दिया गया।
तृतीय औद्योगिक नीति-
– तृतीय औद्योगिक नीति 15 जून, 1994 को घोषित की गई ।
– इस नीति के अंतर्गत राज्य का तीव्र गति से औद्योगिकीकरण का लक्ष्य रखा गया जिसमें मुख्य क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित करते हुए निजी क्षेत्र में औद्योगिक क्षेत्रों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया गया।
चतुर्थ औद्योगिक नीति-
– चतुर्थ औद्योगिक नीति 4 जून, 1998 को घोषित की गई ।
– इस नीति का उद्देश्य राज्य को कुछ चुने हुए क्षेत्रों में विनियोग की दृष्टि से सर्वोच्च प्राथमिकता वाला राज्य बनाना था। इस हेतु समूहों के विकास की रणनीति अपनाई गई।
– राज्य सरकार द्वारा प्रदेश के लिए ‘नई औद्योगिक नीति’ तैयार करने के लिए डॉ. के.के. पाठक की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय समिति बनाने की घोषणा 17 जनवरी, 2019 को की गई।
राजस्थान औद्योगिक विकास नीति – 2019
– राजस्थान को भारत में सर्वाधिक पसंदीदा निवेश स्थल के रूप में एक मजबूत इको-सिस्टम के साथ उभारने हेतु सतत्, संतुलित, समावेशी एवं पर्यावरण अनुकूल औद्योगिक विकास करने, आधारभूत सरंचना एवं रोजगार के अवसर सृजित करने तथा संतुलित क्षेत्रीय औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के दृष्टिकोण से 1 जुलाई, 2019 को राजस्थान औद्योगिक विकास नीति-2019 लागू की गई है।
उद्देश्य:-
1. औद्योगिक आधारभूत अवसंरचना का विकास करना।
2. राज्य को विनिर्माण हब के रूप में विकसित करना।
3. रोजगार प्रोत्साहन प्रदान करना।
4. मानव संसाधन का विकास करना।
5. औद्योगिक क्रांति 4.0 का विकास करना।
प्रावधान:-
1. पिछड़े क्षेत्रों में कम दरों पर भूमि का आवंटन करना।
2. MSME की गुणवत्ता में सुधार तथा शोध के माध्यम से प्रोत्साहन देना।
3. स्टार्टअप हेतु नई स्टार्ट नीति का निर्माण करना।
4. SC, ST महिला कुटीर उद्योग, फुटकर व्यापारी व SHG उद्योगों को प्रोत्साहन प्रदान करना।
5. पैट्रोकेमिकल रिफाइनरी के आस-पास औद्योगिक टाउनशिप का विकास करना।
6. भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को लचीला बनाना।
7. रीको तथा निजी क्षेत्र की सहायता से PPP मॉडल पर औद्योगिक पार्क का विकास करना।
कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सी.एस.आर.)
– कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा-135 के अनुसार शर्तें- ऐसी कंपनियाँ जिनकी
1. वार्षिक कुल सम्पत्ति ₹500 करोड़ या अधिक हो
2. टर्न ओवर ₹1,000 करोड़ या अधिक हो
3. किसी भी वित्तीय वर्ष के दौरान शुद्ध लाभ ₹5 करोड़ या अधिक हो
– तो ऐसी कम्पनियों को सी.एस.आर. के तहत उनके विगत 3 वर्षों में शुद्ध लाभ के औसत के 2 प्रतिशत को अनुसूची-VII में वर्णित गतिविधियों पर व्यय किए जाने का प्रावधान है।
– राज्य सरकार द्वारा कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (सी.एस. आर.) के प्रावधानों को उचित प्रकार से क्रियान्वयन करने के लिए कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व प्राधिकरण का गठन 6 नवम्बर, 2019 को किया गया है। यह नए प्रावधानों के बारे में उचित मार्गदर्शन प्रदान करता है और इस हेतु प्राप्त राशि से समुचित बुनियादी सुविधाओं का सृजन करता है।
राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना (RIPS)
1. प्रथम राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना – 28 जुलाई, 2003
2. राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना – 25 अगस्त, 2010
3. राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना – 8 अक्टूबर, 2014
4. राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना – 19 दिसम्बर, 2019
राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना (RIPS) – 2019
राजस्थान में निवेश को प्रोत्साहन देने हेतु राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना 19 दिसम्बर, 2019 को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा लॉन्च की गई।
यह योजना 17 दिसम्बर, 2019 से प्रभावी की गई।
इस योजना के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं-
1. SGST में 7 वर्ष के लिए 100% तक निवेश अनुदान/ पुनर्भरण का प्रावधान।
2. रोजगार सृजन अनुदान के रूप में 7 वर्षों तक कर्मचारी भविष्य निधि और कर्मचारी बीमा हेतु दिए जाने वाले अंशदान की 50% राशि का पुन: भुगतान सरकार की ओर से किया जाएगा।
3. 7 वर्षों के लिए विद्युत शुल्क, भूमि शुल्क, मंडी शुल्क स्टाम्प शुल्क में 100% की छूट दी जाएगी।
4. भूमि रूपान्तरण शुल्क में 100% की छूट दी जाएगी।
5. थ्रस्ट सेक्टर के उद्यमों को विद्युत कर में अधिकतम 10 वर्षों के लिए 100% छूट होगी।
6. सेवा उद्यमों को 20% या 25% पूँजी अनुदान और 5% ब्याज अनुदान देय होगा।
– इस योजना के तहत अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के उद्यमियों को प्रोत्साहन देने के लिए डॉ बी.आर. अम्बेडकर विशेष पैकेज का प्रावधान किया गया है। इस योजना को राज्य की फ्लेगशिप स्कीम में शामिल किया गया है।
औद्योगिक क्षेत्र
विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ)
– देश की सीमा में स्थित वे औद्योगिक क्षेत्र जिन पर सामान्य कानून लागू नहीं होते हैं। जो निर्यात प्रोत्साहन हेतु स्थापित किए जाते हैं।
राज्य की विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) नीति – 2003
– राज्य में निर्यातों को बढ़ावा देने हेतु 13 मार्च, 2003 को राज्य सरकार द्वारा विशेष आर्थिक क्षेत्र नीति लाई गई। जिसके तहत राज्य में 5 विशेष आर्थिक क्षेत्र स्थापित किए गए –
रीको और सरकार द्वारा संयुक्त रूप से –
– SEZ – 1 सीतापुरा जयपुर, जेम्स एण्ड ज्वैलरी
– SEZ – 2 सीतापुरा जयपुर, जेम्स एण्ड ज्वैलरी निजी क्षेत्र में।
– SEZ – महिन्द्रा वर्ल्ड सिटी, जयपुर – I.T.
– SEZ – महिन्द्रा वर्ल्ड सिटी, जयपुर – इंजीनियरिंग उत्पाद।
– SEZ – 3 महिन्द्रा वर्ल्ड सिटी, जयपुर – हैण्डी क्राफ्ट
सेज अधिनियम 2015
– 6 अप्रैल, 2015 को विशेष आर्थिक क्षेत्र से संबंधित अधिनियम लाया गया, जिसके तहत SEZ से संबंधित सभी अधिकार अलग-अलग एजेन्सियों के बजाय विकास आयुक्त के क्षेत्राधिकार में रखे गए।
प्रस्तावित SEZ
– सोमानी वर्स्टेड लिमिटेड खुशखेड़ा, भिवाड़ी अलवर SEZ
– वाटिका SEZ – जयपुर
– महिन्द्रा SEZ – जयपुर
– जेनपेक्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड SEZ – जयपुर
– RNB इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रा. लि. SEZ – बीकानेर
– बोरानाडा जोधपुर से SEZ की मान्यता समाप्त करके इसे बोरानाडा इंडस्ट्रियल पार्क कर दिया गया है।
– धौलपुर में सैनिक समूह द्वारा मल्टी सेज प्रोडक्ट स्थापित किया जाएगा।
शुष्क बंदरगाह
– देश का प्रथम शुष्क बंदरगाह सांचौर-जालोर।
दिल्ली-मुम्बई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (DMIC)
– भारत सरकार द्वारा जापान के सहयोग से यह कॉरिडोर बनाने हेतु वर्ष 2006 में समझौता हुआ। इस कॉरिडोर के अंतर्गत सात राज्य सम्मिलित होंगे। यह कॉरिडोर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र तक जाएगा।
– दादरी (उत्तर प्रदेश) और जवाहर लाल नेहरू पोर्ट (मुम्बई) के बीच एक डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का निर्माण किया जा रहा है, जिसकी कुल लम्बाई लगभग 1,504 किमी. है। जिसका लगभग 38 प्रतिशत भाग राजस्थान से होकर गुजरता है।
दिल्ली मुम्बई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर का राजस्थान में भूमिका या महत्त्व
– DMIC के कुल 1504 किलोमीटर लम्बाई का 38 प्रतिशत भाग राजस्थान से गुजरेगा। इससे राज्य के लगभग 22 जिले लाभांवित होंगे।
– DMIC के 22 नोड में से 5 नोड (7 से 11) राजस्थान से गुजरेंगे जिसमें से (2) निवेश जोन और (3) औद्योगिक जोन शामिल होंगे-
(1) निवेश जोन –
1. नीमराणा भिवाड़ी खुशखेड़ा
2. अजमेर – किशनगढ़
(2) औद्योगिक जोन
1. जयपुर – दौसा
2. भीलवाड़ा – राजसमंद
3. जोधपुर, पाली – मारवाड़
DMIC के प्रथम चरण में खुशखेड़ा – भिवाड़ी-नीमराणा क्षेत्र तथा जोधपुर-पाली-मारवाड़ औद्योगिक क्षेत्र का विकास किया जाएगा।
(1) खुशखेड़ा – भिवाड़ी – नीमराणा निवेश क्षेत्र
– इस क्षेत्र के 165 वर्ग किमी क्षेत्र में अलवर जिले के 42 गाँव सम्मिलित हैं जिनका विकास करने हेतु ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा परियोजना भिवाड़ी में तथा कुछ भाग में नॉलेज सिटी स्थापित की जाएगी।
( 2) जोधपुर – पाली – मारवाड़ औद्योगिक क्षेत्र
– जोधपुर-पाली-मारवाड़ औद्योगिक क्षेत्र को पाली जिले के 9 गाँव सम्मिलित करते हुए लगभग 154 वर्ग किमी. क्षेत्र में विकसित किया जा रहा है।
– जोधपुर-पाली-मारवाड़ औद्योगिक क्षेत्र को 12 अक्टूबर, 2020 को विशेष निवेश क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया गया है। रीको को जोधपुर-पाली-मारवाड़ औद्योगिक क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपी गई है तथा जोधपुर-पाली-मारवाड़ औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण के रूप में 12 अक्टूबर, 2020 को अधिसूचना जारी कर नामित किया गया।
(3) मल्टी मॉडल लॉजिस्टिक हब
– पाली में टेक्सटाइल पार्क – निर्माण
– पाली औद्योगिक क्षेत्र में एग्रोफूड प्रोसेसिंग जोन का निर्माण
– पाली सोजत बाईपास का निर्माण
– पाली मारवाड़ हेतु जल आपूर्ति व वेस्ट वॉटर प्रबंधन
औद्योगिक पार्क
1. जापानी पार्क – 1
नीमराणा औद्योगिक क्षेत्र (अलवर) में जापानी कम्पनी जेट्रो के साथ मिलकर रीको द्वारा 2006 में जापानी जोन विकसित किया गया।
जापानी पार्क – 2
घिलोट – अलवर में दूसरा जापानी पार्क जेट्रो की सहायता से ही स्थापित किया गया है।
इस औद्योगिक क्षेत्र में अनेक बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ जैसे निसीन, मित्सुई, डाइकिन एवं डाइनिची कलर आदि संचालित हैं। वर्तमान में इस पार्क में 45 इकाइयाँ कार्यरत हैं।
2. कोरियन पार्क –
रीको तथा कोरियन कम्पनी (कोत्रा ) के साथ मिलकर घिलोट (अलवर) में ही कोरियन पार्क विकसित किया गया।
निर्यात संवर्द्धन औद्योगिक पार्क (EPIP)
1. सीतापुरा – जयपुर
2. बोरानाडा – जोधपुर
3. नीमराणा – अलवर
सूचना प्रौद्योगिकी पार्क
1. जयपुर
2. जोधपुर
3. उदयपुर
4. कोटा
स्टोन पार्क
1. मंडोर – जोधपुर
2. मंडाना – कोटा
3. सिकन्दरा – दौसा
4. विशनौदा – धौलपुर
5. मासलपुर – करौली
वस्त्र पार्क
1. भीलवाड़ा – इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल पार्क
2. अलवर – इंटीग्रेटेड अपेरल सिटी
3. दौसा – कारपेट पार्क
4. बाड़मेर – हिम्माड़ा टेक्सटाइल पार्क
5. बगरू – जयपुर
6. सिलोरा – किशनगढ़
7. पाली
चर्म पार्क
1. मानपुरा माचेड़ी – (जयपुर)
2. सीतापुरा – जयपुर
3. भिवाड़ी – अलवर
वुलन पार्क
1. गोहना – ब्यावर
2. नर्बद खेड़ा – बीकानेर
सिरेमि क पार्क
1. खारा – बीकानेर
2. घिलोट – अलवर
पुष्प पार्क
1. खुशखेड़ा – अलवर
ऑटोमोबाइल पार्क
1. खुशखेड़ा – अलवर
2. टपूकड़ा – अलवर
एग्रो फूड पार्क
1. श्रीगंगानगर
2. जोधपुर
3. कोटा
4. अलवर
– रीको द्वारा औद्योगिक क्षेत्र तिंवरी, जोधपुर में लगभग 33 हैक्टेयर भूमि पर “कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र” भी विकसित किया गया है।
– सिरेमिक पार्क – घिलोट (अलवर)
– इलेक्ट्रॉनिक मेन्यूफैक्चरिंग क्लस्टर – अलवर
मेगा फूड पार्क
– रूपनगढ, किशनगढ़ (अजमेर)
जूट पार्क
– अजमेर
सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क
– सीतापुरा – जयपुर
साइबर पार्क
– जोधपुर
इन्फ्रास्ट्रक्चर पार्क
– अलवर
बायोटेक्नोलॉजी पार्क
– जयपुर
– अलवर
औद्योगिक निर्यात
– राज्य सरकार ने निर्यात की पहचान आर्थिक विकास के लिए एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में की है। राज्य से निर्यात का महत्त्व न केवल देश के राजस्व के लिए विदेशी मुद्रा अर्जित करने में निहित है, बल्कि राज्य को अप्रत्यक्ष लाभ जैसे – बाजार के अवसरों का विस्तार, उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार और संयंत्र, मशीनरी व विनिर्माण प्रक्रिया के संचालन तकनीकी में उन्नयन तथा अधिक रोजगार के अवसर आदि के संदर्भ में भी है।
– नीति आयोग द्वारा निर्यात तैयारी सूचकांक (ईपीआई)-2020 जारी किया गया है, जिसमें ‘लैंडलॉक्ड स्टेट्स’ की श्रेणी में राजस्थान 62.55 सूचकांक के साथ एक शीर्षस्थ प्रदर्शनकर्ता राज्य के रूप में उभरा है।
– निर्यात में वृद्धि दर एवं अभिविन्यास के अतिरिक्त, राज्य ने सभी स्तम्भों एवं उप-स्तम्भों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है।
– राजस्थान से निर्यात होने वाली शीर्ष पाँच वस्तुओं में इंजीनियरिंग वस्तुएँ, कपड़ा, हस्तशिल्प,धातुएँ और रासायनिक सम्बद्ध हैं, जिनका राज्य से होने वाले निर्यात में 50 प्रतिशत से अधिक योगदान है।
– राज्य से सर्वाधिक निर्यातित 5 वस्तुएँ एवं प्रतिशत अंश (2020-21)
* अभियांत्रिकी वस्तुएँ (14.75%)
* हस्तकला (11.76%)
* कपड़ा (10.86%)
* धातु (11.01%)
* रासायनिक एवं सम्बद्ध (9.51%)
– वित्तीय वर्ष 2020-21 में कुल निर्यात ₹52,764.31 करोड़ हुआ है।

राजस्थान से निर्यात (राशि करोड़ में)
क्र.सं | उत्पाद | 2018-19 | 2019-20 | 2020-21 |
1 | कपड़ा | 6750.11 | 6165.79 | 5729.29 |
2. | कृषि एवं खाद्य उत्पाद | 4525.87 | 3708.96 | 3740.65 |
3. | जवाहरात एवं आभूषण | 5735.55 | 5109.60 | 4067.36 |
4. | अभियांत्रिकी | 7632.99 | 7674.76 | 7781.81 |
5. | धातु |
|
|
|
| 1. लौह | 970.59 | 1216.60 | 1102.94 |
| 2. अलौह | 3343.21 | 3182.29 | 4180.75 |
6. | आयामी संगमरमर पत्थर, ग्रेनाइट तथा अभ्रक पत्थर की वस्तुएँ आदि | 3354.58 | 3208.81 | 4080.22 |
7. | खनिज ईंधन, खनिज तेल और उत्पाद बिटुमिनस पदार्थ, खनिज वैक्स, अयस्क, स्लैग एवं ऐश | 168.96 | 871.39 | 842.34 |
8. | इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर | 2833.24 | 2729.70 | 3016.01 |
9. | ऊन एवं ऊनी कपड़े | 139.11 | 130.74 | 62.30 |
10. | रासायनिक एवं सम्बद्ध | 5901.94 | 4260.30 | 5016.53 |
11. | ड्रग्स और फार्मास्यूटिकल्स | 1027.35 | 1899.69 | 2268.39 |
12. | प्लास्टिक एवं लिनोलियम | 896.85 | 1178.65 | 1337.58 |
13. | हस्तशिल्प | 4825.42 | 5219.48 | 6205.32 |
14. | चमड़ा एवं चर्म उत्पाद | 356.85 | 226.25 | 193.43 |
15. | तैयार वस्त्र | 2078.28 | 2073.20 | 1764.40 |
16. | कालीन (ड्यूरीज) | 625.67 | 563.08 | 464.70 |
17. | अन्य | 9.84 | 526.81 | 910.28 |
योग | 51178.41 | 49946.09 | 52764.31 | |
– मिशन निर्यातक बनो :
राज्य के निर्यात क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के
लिए दिनांक 29 जुलाई, 2021 को एक अनूठी पहल “मिशन
निर्यातक बनों” प्रारम्भ की गई है।
– उक्त मिशन के अन्तर्गत राज्य के विभिन्न जिलों में स्थित औद्योगिक इकाइयों के आधार पर नवीन निर्यातक बनाने हेतु लक्ष्य आवंटित किये गये हैं।
– कुल 22,731 नवीन निर्यातक बनाने का लक्ष्य जिलों को आवंटित किया गया है। दिसम्बर, 2021 तक राज्य में 5,433 उद्यमियों को आयात-निर्यात कोड (आई.ई.सी.) जारी किये गये हैं और निर्यात संबंधी प्रक्रियाओं एवं दस्तावेजीकरण के संबंध में उनके लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है।
– इसी क्रम में सभी संभागीय मुख्यालयों पर दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।
– कार्यक्रम के अन्तर्गत राज्य से नवीन निर्यातकों को प्रथम निर्यात निगम तक की पूर्ण सहायता प्रदान की जाएगी।
राजस्थान निर्यात संवर्द्धन समन्वय परिषद् (REPCC)-
– इसका गठन 25 अक्टूबर, 2019 को किया गया।
– उद्देश्य :- राज्य में निर्यात के संवर्द्धन हेतु व्यवस्थित प्रयास करने, विभिन्न उद्यमों के निर्यात के संबंध में आवश्यक व्यवस्था अपनाने, निर्यात के क्षेत्र में आ रही बाधाओं को दूर करने, विभिन्न औद्योगिक संगठनों एवं उनके प्रतिनिधियों से समन्वय स्थापित करने, निर्यात संवर्द्धन हेतु आवश्यक सुझाव प्रदान करने व समुचित आधारभूत सुविधाओं का सृजन एवं विकास करने के लिए।
राजस्थान निर्यात संवर्द्धन परिषद् (REPC)-
– इसका गठन 8 नवम्बर, 2019 को किया गया।
– उद्देश्य :- राज्य में निर्यात प्रोत्साहन हेतु कम्पनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत राज्य में निर्यात सम्बन्धी नियमन, संरक्षण एवं प्रोत्साहन के लिए राजस्थान निर्यात संवर्द्धन परिषद् का गठन किया गया।
एक जिला एक उत्पाद योजना (ODOP SCHEME)
– उद्देश्य :- केन्द्र सरकार द्वारा घोषित एक जिला एक उत्पाद (One
District One Product) योजना का राज्य में सफलतापूर्वकं क्रियान्वयन किया जा रहा है।
– निर्यात योग्य उत्पादों के चयन के उपरांत उनके निर्यात में आ रही समस्याओं का निराकरण करने के लिये जिला निर्यात संवर्द्धन समितियों का गठन एवं जिला निर्यात कार्य योजना का निर्माण किया गया है।
– केन्द्र सरकार द्वारा योजना के प्रथम चरण के लिए राज्य से जयपुर की ब्लू पॉटरी एवं नागौर जिले के मकराना के मार्बल का चुनाव किया गया है।
राज्य स्तरीय निर्यात पुरस्कार योजना :
– निर्यात को प्रोत्साहित करने हेतु राज्य के उत्कृष्ट निर्यातकों को पुरस्कृत करने हेतु राज्य निर्यात पुरस्कार योजना-2019 लागू की गई है।
– योजनान्तर्गत 15 श्रेणियों में 32 पुरस्कार एवं एक लाइफटाइम एक्सपोर्ट रत्न अवार्ड सहित अधिकतम 33 पुरस्कार प्रदान किये जाने का प्रावधान है।
– वर्ष 2019-20 के लिए राज्य से 28 उत्कृष्ट निर्यातकों एवं एक लाइफटाइम एक्सपोर्ट रत्न अवार्ड पुरस्कार सहित कुल 29 निर्यातक इकाइयों का चयन पुरस्कार निर्धारण समिति द्वारा किया गया है।
निर्यात संवर्द्धन, प्रक्रिया एवं प्रलेखन /दस्तावेजीकरण पर प्रशिक्षण कार्यक्रम
– राज्य के ऐसे उद्यमी, जो निर्यात प्रक्रिया, दस्तावेजों एवं बाजार की जानकारी के अभाव में अपनी वस्तुओं का निर्यात करने में असमर्थ हैं और बिचौलियों के माध्यम से अपनी वस्तुओं का निर्यात कर रहे हैं, को जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से निर्यात संवर्द्धन, प्रक्रिया एवं दस्तावेजीकरण पर प्रशिक्षण कार्यक्रम योजना वर्ष 2012 से प्रारंभ की गई थी।
– योजनान्तर्गत प्रतिवर्ष राज्य से 6-7 जिलों का चयन कर 2 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों के आयोजन हेतु प्रति जिले 75,000 रुपये की दर से जिला उद्योग केन्द्र को बजट आवंटन किया जाता है।
– प्रत्येक जिला उद्योग केन्द्र द्वारा लगभग 35-40 निर्यातकों को प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है।
– राज्य के निर्यातकों की निर्यात संबंधी कठिनाइयों के समाधान एवं उन्हे निर्यात प्रक्रियाओं एवं दस्तावेजीकरण संबंधी प्रशिक्षण प्रदान करवाएँ जाने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा राजस्थान निर्यात संवर्द्धन परिषद् (आर.ई.पी.सी.) की स्थापना की गई है।
औद्योगिक वित्तीय संगठन
राज्य में उद्योगों के विकास हेतु निम्नलिखित संस्थाएँ कार्यरत हैं-
1. राजस्थान औद्योगिक विनियोग विकास निगम – RIICO
– 28 मार्च, 1969 को राजस्थान उद्योग तथा खनिज निगम (RSIMDC) की स्थापना हुई जिसके बाद में खनिज तथा उद्योग दोनों के लिए पृथक् निगम बना दिए गए।
– 1979 में राजस्थान खनिज विकास निगम तथा 1 जनवरी, 1980 को रीको की स्थापना की गई। रीको राजस्थान में उद्योगों के लिए सबसे बड़ी संस्था है।
– रीको के प्रमुख उद्देश्य आधारभूत सुविधाएँ प्रदान कर लघु, मध्यम एवं वृहद् श्रेणी के उद्योग स्थापित करने हेतु औद्योगिक क्षेत्रों को विकसित करना एवं सावधि ऋण प्रदान करना है। औद्योगिक व्यापार एवं विनियोजन संवर्द्धन गतिविधियों को बढ़ावा देना रीको की प्राथमिकता है।
– राज्य में रीको द्वारा 370 औद्योगिक क्षेत्र संचालित किए जा रहे हैं।
रीको के कार्य:-
1. राज्य का शीर्ष औद्योगिक वित्तीय संगठन है।
2. वृहद् तथा मध्यम इकाइयों को दीर्घकालीन ऋण सुविधा उपलब्ध करवाता है।
3. उद्योगों को प्रोत्साहन देने हेतु औद्योगिक अवसरंचना का विकास करता है।
4. औद्योगिक व्यापार तथा औद्योगिक निवेश संवर्द्धन का कार्य करता है।
5. रीको मर्चेन्ट बैंकर के रूप में कार्य करता है।
6. राज्य में औद्योगिक परियोजनाओं के प्रतिवेदन पर राज्य सरकार को सलाह प्रदान करता है।
7. उद्योगों को वित्तीय रियायतें प्रदान कर प्रोत्साहन देना।
रीको के विशेष कार्य व उपलब्धियाँ:-
1. स्पोर्ट्स गुड्स एवं टॉयज जोन- राजस्थान में स्पोर्ट्स गुड्स एवं टॉयज सेक्टर में निवेश आकर्षित करने हेतु रीको द्वारा खुशखेड़ा औद्योगिक क्षेत्र, अलवर में वर्ष 2020 में ‘स्पोर्ट्स गुड्स एवं टॉयज जोन’ की स्थापना की गई।
– खुशखेड़ा औद्योगिक क्षेत्र में खेल के सामान और खिलौना उद्योगों के लिए एक क्लस्टर बनाया गया है।
2. MEDTech मेडिकल डिवाइस पार्क- जोधपुर के बोरानाडा विस्तार औद्योगिक क्षेत्र में 223 एकड़ भूमि पर MEDTech Medical Devices Park विकसित किया जा रहा है। इस पार्क में 6 हेक्टेयर भूमि पर कॉमन फेसिलिटी सेंटर (सीएफसी) नियोजित किया गया है। इस सीएफसी की स्थापना के संबंध में आईआईटी जोधपुर के साथ दिनांक 5 अक्टूबर, 2021 को एक एमओयू हस्ताक्षरित किया गया है।
3. क्षेत्रीय औद्योगीकरण प्रोत्साहन योजना (पिछड़े जिले)
2011-12- औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े जिलों यथा- करौली, सवाईमाधोपुर, धौलपुर, बाराँ तथा प्रतापगढ़ में निवेश को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से रीको द्वारा आवंटित भूखण्डों पर उत्पादन शीघ्र प्रारम्भ करने को प्रोत्साहित करने हेतु एक योजना ‘क्षेत्रीय औद्योगीकरण प्रोत्साहन योजना (पिछड़े जिले)’ लागू है।
4. स्टोनमार्ट-
– स्टोनमार्ट के दौरान ही जयपुर आर्किटेक्ट्स फेस्टिवल का आयोजन किया जाता है, जिसमें भी बड़ी संख्या में आर्किटेक्ट्स द्वारा भाग लिया जाता है।
– अन्तर्राष्ट्रीय पत्थर उद्योग प्रदर्शनी, राजस्थान राज्य का एक महत्त्वपूर्ण आयोजन है। इस 4 दिवसीय पत्थर उद्योग आधारित अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी में देश-विदेश के स्टोन माइनिंग, प्रोसेसिंग, मशीनरी, टूल्स एवं स्टोन क्राफ्ट के उद्यमियों द्वारा स्टॉल लगाई जाती है जिसमें बड़ी संख्या में देश-विदेश से ट्रेड विजिटर्स, वास्तुकारों द्वारा भाग लिया जाता है। ।
– इण्डिया स्टोनमार्ट के 11वें संस्करण का आयोजन दिनांक 10-13 नवम्बर, 2022 में किया जाना प्रस्तावित है।
2. राजस्थान वित्त निगम – (R.F.C)
स्थापना – 17 जनवरी, 1955 को ’राजस्थान वित्त निगम अधिनियम, 1951’ के तहत 100 करोड़ की अंश पूँजी से की गई।
कार्य:-
1. अति लघु, लघु तथा मध्यम इकाइयों को मध्यकालीन व दीर्घकालीन ऋण सुविधा उपलब्ध करवाना।
2. राज्य में तीव्र औद्योगीकरण में सहयोग प्रदान करना।
3. यह सरकार के अभिकर्ता के रूप में कार्य करता है।
4. उद्योगों का नवीनीकरण तथा विस्तार हेतु सुविधा उपलब्ध करवाना।
5. अधिकतम 20 करोड़ रुपये तक के ऋण की सुविधा।
6. यह केन्द्र सरकार, राज्य सरकार तथा IDBI व IFCI के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता हैं।
7. यह ऋणों की गारन्टी प्रदान करता है तथा यह पुनर्वित्त निगम है।
RFC द्वारा संचालित योजनाएँ
1.युवा उद्यमिता प्रोत्साहन योजना – 2013-14
– राज्य के युवा उद्यमियों को अपना उद्योग स्थापित करने हेतु प्रोत्साहित करने के लिए राजस्थान वित्त निगम द्वारा 19 अप्रैल, 2013 को यह योजना लागू की गई थी।
– इस योजना के अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा 1,000 इकाइयों को वित्तीय सहायता प्रदान करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
– जिसके तहत युवाओं को स्वरोजगार हेतु 25 लाख से 5 करोड़ तक की ऋण सुविधा उपलब्ध करवाई जा रही है।
– राज्य सरकार द्वारा इस योजना के अंतर्गत स्वीकृत ऋणों पर ₹1.50 करोड़ रुपये तक की ऋण सीमा पर 6 प्रतिशत ब्याज अनुदान दिया जाता है।
– योजना के अन्तर्गत युवा उद्यमियों की अधिकतम आयु 45 वर्ष निर्धारित की गई है।
2.महिला उद्यम निधि-योजना
– महिलाओं को स्वरोजगार हेतु 10 लाख रुपये तक ऋण सुविधा तथा लोन भुगतान अवधि 5 से 10 वर्ष तक है।
3.सेमफेम्स योजना
– भूतपूर्व सैनिकों को स्वरोजगार हेतु।
4.टॉप अप योजना
-M.S.M.E हेतु ऋण सुविधा
5.फ्लेक्सी योजना
– आसान ऋण सुविधा
6.टेक्नोक्रेट योजना
– तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवाओं को स्वरोजगार हेतु ऋण सुविधा
7.शिल्पबाड़ी –
– दस्तकारों व शिल्पकारों हेतु
Note:- ऋण प्रोत्साहन योजना के तहत उद्यमियों को सिल्वर कार्ड, गोल्ड कार्ड तथा प्लेटिनम कार्ड भी दिए जाते हैं।
3. राजस्थान लघु उद्योग विकास निगम – (RAJSICO)
– स्थापना – 3 जून, 1961
कार्य:-
– लघु औद्योगिक इकाइयों को वित्तीय सहायता उपलब्ध करवाना।
– सस्ती दरों पर कच्चा माल व विपणन सुविधा उपलब्ध करवाना।
– उद्योगों में आपसी तालमेल स्थापित करना।
– ट्राइबल प्रशिक्षण केन्द्रों का संचालन।
– विपणन वृद्धि हेतु मेले, प्रदर्शनी तथा सेमीनार का आयोजन।
– ‘राजस्थली एम्पोरियम’ के नाम से विपणन केन्द्रों का संचालन।
– राजसीको द्वारा एयरकार्गो (मालवाहक) का संचालन किया जाता है।
प्रथम एयर कार्गों – सांगानेर (जयपुर)
– राजसीको द्वारा शुष्क बंदरगाह (I.C.D) का संचालन किया जाता है।
– जयपुर (मानसरोवर)
– जोधपुर
– भीलवाड़ा
– अलवर
– बीकानेर
– निगम द्वारा प्रत्येक वर्ष प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से 10,000 से अधिक व्यक्तियों को रोजगार उपलब्ध करवाया जा रहा है।
– निगम जयपुर, जोधपुर व भीलवाड़ा में स्थित शुष्क बंदरगाहों (इनलैण्ड कन्टेनर डिपो) के माध्यम से राजस्थान के निर्यातकों/आयातकों को निर्यात आधारभूत सेवाएँ प्रदान कर रहा है।
– वर्तमान में आयात/निर्यात सुविधाएँ केवल जोधपुर और जयपुर से प्रदान की जाती है। इसके अतिरिक्त निगम द्वारा हवाई मार्ग से आयात-निर्यात की सुविधाएँ सांगानेर एयरपोर्ट, जयपुर में स्थित एयर कार्गो कॉम्प्लेक्स के माध्यम से प्रदान की जा रही है।
– इसी वित्तीय वर्ष में शीघ्र ही भीलवाड़ा में इनलैण्ड कन्टेनर डिपो प्रारम्भ किया जा रहा है।
— निगम, राजस्थान के शिल्पकारों की हस्तशिल्प वस्तुओं को जयपुर, उदयपुर, दिल्ली और कोलकाता में स्थित राजस्थली विक्रय केन्द्रों के माध्यम से विपणन करता है।
– सम्पूर्ण राजस्थान में 450 कारीगरों से हस्तशिल्प वस्तुओं की खरीद की जाती है। शिल्पकारों को प्रोत्साहित करने के लिए निगम द्वारा प्रदर्शनियों में भाग लिया जाता है। वित्तीय वर्ष 2021-22 (दिसम्बर, 2021 तक) के दौरान हस्तशिल्प वस्तुओं का कारोबार (टर्न ओवर) ₹264.93 लाख का रहा है।
राजसीको द्वारा निम्न प्रशिक्षण केंद्रों का संचालन किया जाता है-
1. फड़ चित्रण – भीलवाड़ा
2. कोटा बूँदी चित्रकला – कोटा
3. मारवाड़ चित्रकला – जोधपुर
4. मुनव्वती कला – बीकानेर
4. ग्रामीण गैर कृषि विकास अभिकरण – RUDA
– स्थापना – नवम्बर, 1995
उद्देश्य:-
– राज्य में ग्रामीण क्षेत्रों में गैर कृषि आजीविका के साधनों का विकास करना व स्वरोजगार को बढा़वा देना।
कार्य:-
– यह खादी, ग्रामोद्योग, चर्म उद्योग, सिरेमिक, पॉटरी, हस्तकला आदि उद्योगों के विकास को प्रोत्साहित करता है और वित्तीय सहायता उपलब्ध करवाता है।
– ग्रामीण दस्तकारों को प्रशिक्षण देना, संगठित करना तथा ग्रामीण हस्तशिल्प तकनीकी का विकास करना।
– हस्तकला उद्योगों को आधुनिक डिजाइन उपलब्ध करवाना।
– ग्रामीण हथकरघा उद्योगों की विपणन व्यवस्था सुनिश्चित करना तथा इनके उत्पादों का विदेशों में प्रचार प्रसार करना।
– विपणन प्रोत्साहन हेतु मेले, प्रदर्शनी व सेमीनार का आयोजन करना।
RUDA के नवाचार/योजनाएँ
1.भौगोलिक संकेतक (G.I) पंजीकरण
– भारत सरकार द्वारा जियोग्राफिकल इंडिकेशन ऑफ गुड्ज़ एक्ट 1999 को लाया गया जिसके तहत ट्रैड मार्क व भौगोलिक संकेत दिया जाता है।
– रूडा द्वारा भारत सरकार के सहयोग से भौगोलिक संकेतक (G.I.) के पंजीकरण की कार्यवाही क्रियान्वित की जा रही है।
1. कोटा डोरिया वस्त्र- हस्तशिल्प
2. ब्लू पॉटरी, जयपुर – हस्तशिल्प
3. सांगानेरी हैंड ब्लॉक प्रिंट (जयपुर) – हस्तशिल्प
4. बगरू हैण्ड ब्लॉक प्रिंटिंग (जयपुर) – हस्तशिल्प
5. पोकरण पॉटरी
6. अन्य
2.रूडा प्रमुख रूप से 3 क्षेत्रों के अंतर्गत अपनी गतिविधियाँ संचालित करता है-
1. चमड़ा उद्योग
2. ऊन व वस्त्र
3. लघु खनिज
3.हस्तकला प्रोत्साहन योजना – तालछापर (चूरू)
4.कोटा डोरिया प्रशिक्षण केंद्र – कोटा
5.कोटा डोरिया हाड़ौती क्षेत्र क्लस्टर विकास परियोजना
6.चर्म क्लस्टर – रेनवाल (जयपुर)
5. राजस्थान खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड
– खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड की स्थापना असंगठित क्षेत्र के कारीगरों को रोजगार प्रदान करने, उच्च गुणवत्तायुक्त उत्पादों के उत्पादन में सहायता प्रदान करने, दस्तकारों को प्रशिक्षण प्रदान करने और आत्मनिर्भरता की भावना जाग्रत करने के लिए अप्रैल, 1955 में की गई।
– सदस्य- एक अध्यक्ष व 12 अन्य सदस्य जिसमें कम से कम 8 गैर सरकारी सदस्य होते है जिनका कार्यकाल 2 वर्ष होता है।
– प्रधानमंत्री ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम (पी.एम. ई.जी.पी.) खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग, भारत सरकार के अन्तर्गत खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड द्वारा संचालित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत वित्तीय वर्ष 2021-22 (दिसम्बर, 2021 तक) के दौरान 262 ग्रामोद्योग इकाइयाँ स्वीकृत की गई एवं 1,917 व्यक्तियों को रोजगार उपलब्ध करवाया गया है।
– खादी बिक्री को प्रोत्साहन देने के तहत राष्ट्रीय स्तर की खादी ग्रामोद्योग प्रदर्शनी 2021-22 में 11 दिसम्बर, 2021 को रामलीला मैदान, न्यू गेट जयपुर में फैशन शो का आयोजन किया गया, जिसमें खादी परिधानों का लाइव मॉडल्स पर प्रदर्शित (खादी शो) किए गए।
7. कारखाना एवं बॉयलर्स निरीक्षण विभाग, जयपुर
– इस विभाग का मुख्य कार्य कारखाना अधिनियम-1948, बॉयलर अधिनियम-1923, वेतन भुगतान अधिनियम-1936 के प्रावधानों के तहत राज्य में स्थित कारखानों में कार्यरत श्रमिकों के सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कल्याण तथा भवन एवं अन्य संनिर्माण कर्मकार (नियोजन तथा सेवा-शर्त विनियमन) अधिनियम-1996 के तहत कार्यरत श्रमिकों के सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी प्रावधानों की पालना करवाना है।
कार्य
– इन नियमों के परिपालन द्वारा मुख्य रूप से औद्योगिक श्रमिकों को
सुरक्षित कार्यस्थिति एवं कल्याणकारी सुविधाएँ उपलब्ध करवाना एवं
कारखानों में कार्यरत श्रमिकों के कार्य घंटे, सुरक्षा, स्वास्थ्य, वेतन आदि को विनियमित करना है।
– इसके अलावा इस विभाग द्वारा कानूनी प्रावधानों की अनुपालना में कारखाना मालिकों एवं कामगारों को तकनीकी सूचनाएँ उपलब्ध करवाई जाती है एवं सामयिक सलाह भी दी जाती है। आवश्यकता होने पर राज्य सरकार को नियमों में संशोधन के सुझाव दिये जाते है।
वार्षिक प्रगति प्रतिवेदन-2021-22 के अनुसार
– वर्तमान में राज्य में कुल 12385 पंजीकृत कारखाने है जिनमें लगभग 705548 श्रमिक नियोजित है।
– वर्तमान में राज्य में 2112 पंजीकृत बॉयलर कार्यरत है।
– विभागीय अधिकारियों द्वारा वित्तीय वर्ष 2021-22 (दिसम्बर, 2021 तक) के दौरान 3894 कारखाना एवं बॉयलर्स के निरीक्षण किए गए।
– इसी अवधि के दौरान विभाग द्वारा 600 नए कारखानों एवं 145 नए बॉयलर्स का पंजीयन किया गया, जिनमें लगभग 51084 श्रमिकों को रोजगार प्रदान किया गया है।
सर्वाधिक पंजीकृत कारखाने जयपुर में व न्यूनतम प्रतापगढ़ में है।
8. अन्य अखिल भारतीय संस्थाएँ
– अखिल भारतीय सार्वजनिक वित्तीय संस्थाओं द्वारा राज्य में औद्योगिक विकास के लिए वित्तीय सहायता-
1. भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (Industrial Finance Corporation of India Ltd.)
– भारतीय औद्योगिक वित्त निगम एक गैर-बैंकिंग वित्त कंपनी है, जिसकी स्थापना 1 जुलाई, 1948 को हुई।
– इस संस्थान का प्रमुख उद्देश्य औद्योगिक फर्मों को ऋण तथा अग्रिम प्रदान करवाना है।
कार्य-
– 25 वर्षों तक की ऋण सुविधा उपलब्धता
– ऋण पत्रों की खरीद करके वित्तीय सुविधा
– विदेशी मुद्रा में ऋण सुविधा उपलब्ध
– वाणिज्यिक व सहकारी बैंकों से लिए गए ऋणों की गारन्टी प्रदान
करना
– विदेशों से खरीदी गई मशीनों के भुगतान की गारंटी
– लीजिंग व हायर परचेज वित्त प्रदान करना ऋणों की गारंटी
तकनीकी सलाह व प्रशिक्षण देना।
2. राज्य वित्त निगम (State Finance Corporation)
– SFC अधिनियम, 1951 के तहत प्रत्येक राज्य में राज्य वित्त निगम स्थापित किए गए। जिनका उद्देश्य छोटे, मध्यम तथा कुटीर उद्योगों की सहायता करना है।
3. भारतीय औद्योगिक ऋण तथा विनियोग निगम
(Industrial Credit and Investment Corporation of India Ltd.- ICICI)
– विश्व बैंक द्वारा निजी क्षेत्रों में लघु तथा मध्यम उद्योगों के विकास के लिए जनवरी, 1955 में ICICI की स्थापना करवाई गई। यह संगठन मुख्य रूप से निजी क्षेत्रों को ऋण उपलब्ध करवाता है।
4. भारतीय औद्योगिक विकास बैंक (Industrial Development Bank of India- IDBI)
– भारतीय औाद्योगिक विकास बैंक की स्थापना वर्ष 1964 में हुई अक्टूबर, 2004 में इसे वाणिज्यिक बैंक के रूप में परिवर्तित कर दिया गया।
– यह उद्योगों की स्थापना तथा विकास संबंधी परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करता है तथा आधारभूत उद्योगों के विकास को प्रोत्साहित करता है।
– वित्त स्त्रोत – RBI भारत सरकार, ऋण पत्र व Bond की बिक्री से
– वर्तमान में इसका निजीकरण LIC में कर दिया गया है।
5. भारतीय निर्यात-आयात बैंक (The Export-Import Bank of India-EXIM Bank)
– इस बैंक की स्थापना 1 जनवरी, 1982 में की गई। EXIM Bank की स्थापना का उद्देश्य निर्यातकों और आयातकों को विभिन्न सुविधाएँ उपलब्ध करवाना है।
6. खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC)
– भारत सरकार ने 1956 में एक अधिनियम द्वारा (KVIC) की स्थापना की जो ग्रामीण क्षेत्रों में कम प्रतिव्यक्ति विनियोग के साथ गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार अवसरों का सृजन करती है।
– प्रथम राष्ट्रीय श्रम आयोग का गठन 1966 में तथा नवीनतम श्रम आयोग का गठन अक्टूबर, 1999 में किया गया। यह आयोग संगठित क्षेत्र के साथ-साथ असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के कार्य की दशाओं को सुधारने के लिए सुझाव देता है।
7. भारती य लघु उद्योग विकास बैंक
(Small Industries Development Bank of India-SIDBI)
– SIDBI की स्थापना 2 अप्रैल, 1990 को संसद के एक अधिनियम के द्वारा की गई। जिसका मुख्यालय लखनऊ में हैं।
– वित्त स्त्रोत- IDBI, RBI ऋण पत्रों की बिक्री।
कार्य-
1. लघु उद्योगों के लिए बाजार दरों से कम दर पर ऋण सुविधा की उपलब्धता।
2. उपनगरीय व कस्बों में औद्योगिक विकास प्रोत्साहन।
3. SIDBI का मुख्य उद्देश्य सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम क्षेत्र के प्रोत्साहन, वित्त पोषण और विकास के लिए प्रमुख वित्तीय संस्थान के रूप में कार्य करना।
4. राज्य वित्त निगम, वाणिज्य व सहकारी बैंक को वित्तीय सहायता देना।
5. उपनगरीय व कस्बों में औद्योगिक विकास।
राज्य वित्त निगम
लघु उद्योग विकास संगठन
(Small Industries Development Organisation-SIDO)
– SIDO की स्थापना वर्ष 1954 में हुई थी।
– यह केन्द्रीय उद्योग मंत्रालय के अधीन आता है तथा इसका प्रमुख कार्य लघु उद्योगों के संबंध में नीति निर्धारक, समन्वयक तथा नायक एजेंसी के रूप में कार्य करना है।
1. राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम
(National Small Industries Corporation-NSIC)
– NSIC की स्थापना वर्ष 1955 में हुई थी।
– इसका प्रमुख कार्य किराया क्रय पद्धति पर छोटे उद्योगों को मशीनरी उपलब्ध करवाना है।
– इसके अतिरिक्त देश में तीन राष्ट्रीय स्तर के उद्यमशीलता विकास संस्थान है-
– भारतीय उद्यमशीलता संस्थान-गुवाहाटी
– राष्ट्रीय उद्यमशीलता एवं लघु विकास व्यापार संस्थान-नोएडा
– राष्ट्रीय लघु उद्योग विस्तार प्रशिक्षण संस्थान-हैदराबाद
2. राष्ट्रीय निवेश कोष
– इसका गठन वर्ष 2005 में किया गया।
– सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश से प्राप्त होने वाली राशि इस कोष में जमा की जाएगी तथा यह राशि भारत के संचित कोष से बाहर रहेगी।
– इस राशि का 75% उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे सामाजिक क्षेत्र के विकास हेतु।
– 25% राशि का उपयोग पुन: लाभ अर्जन हेतु सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में निवेश।
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