• Home
  • History
  • भारतीय संस्कृति में धर्म और दर्शन : प्राचीन धर्म, दर्शन और बौद्धिक क्रांति का इतिहास

भारतीय संस्कृति में धर्म और दर्शन : प्राचीन धर्म, दर्शन और बौद्धिक क्रांति का इतिहास

हडप्पा सभ्यता (2600 - 1900 ईशा पूर्व) | इतिहास और नगर नियोजन


धर्म एवं दर्शन का विकास :

वैदिक कालीन धर्म :

वैदिक कालीन धर्म की निम्न विशेषतायें थी –
  1. इसमे प्रकृति के देवीयकरण पर बल दिया गया अर्थात प्रकृति की जिन गुत्थियों कों वे नहीं सुलझा सके उन्होने उसका देवीयकरण कर दिया अर्थात सूर्य एवं चंद्र देवता , पृथ्वी देवी आदि ।
  2. पितृ सत्ता वादी समाज के अनुकुल वैदिक धर्म मे पुरुष तत्व की प्रधानता थी ऋग्वैदिक कालीन धर्म मे तीन सर्व श्रेष्ठ देवता के रूप मे इन्द्र अग्नि एवं वरुण स्थापित थे । इन्द्र , युद्ध एवं वर्षा के देवता थे । अग्नि , पुरोहित एवं यज्ञ के देवता थे तथा देवता एवं मानव के बीच मध्यस्थ थे । वहीं वरुण कों ऋतस्य गोप (प्राकृतिक नियमों का रक्षक) थे । इसके अतिरिक्त मित्र (शपथ एवं प्रतिज्ञा के देवता), आर्यमन (विवाह के देवता) आदि का भी विवरण मिलता है। उत्तर वैदिक काल मे सर्वश्रेस्थ देवता के रूप मे प्रजापति , विष्णु एवं रुद्र स्थापित हो गए । कुछ देवियों की भी चर्चा मिलती है परंतु उनका स्थान देवताओ से नीचा है उदाहरण के लिए उषा निशा अरण्ययी रात्री आदि । वैदिक धर्म मे बहुदेववाद का प्रचलन था अर्थात अनेक देवताओ की पूजा होटी थी ऋग्वेद मे 33 देवताओ की चर्चा है । परंतु उस काल मे मूर्ति पूजा का प्रचलन नहीं था

उत्तर वैदिक काल मे धर्म का स्वरूप इह लौकिक एवं मानवीय था दूसरे शब्दो मे सांसरिक एवं भौतिक सुख कों महत्व दिया जाता था लोग प्रजापुत्र एवं धान्य के लिए उपासना करते थे । मोक्ष की अवधारणा उपनिषद मे वैदिक काल के अंत मे आई है ।

उपासना की पद्धति के रूप मे प्राथना एवं यज्ञ का प्रचलन था उत्तर वैदिक तक आकार यज्ञ आनुष्ठाणिक (कर्मकांड) हो चुका था तथा यज्ञ मे मंत्रो उच्चारण एवं पशु बली कों अत्यधिक महत्व दिया जाने लगा था वैदिक काल के अंत मे इसके विरुद्ध प्रतिक्रीया उपनिषद के चिंतन के रूप मे प्रकट हुई

बुद्ध काल –

छठी सदी ईशा पूर्व के काल को बोद्धिक क्रांति का काल क्यों कहा जाता है?

बोद्धिक क्रांति से आशय है नए विचारो का आगमन तथा उनका तेजी से प्रसार । बुद्ध काल मे वैचारिक क्षेत्र मे निम्नलिखित परिवर्तन देखे गए –

  1. बड़ी संख्या मे नवीन धार्मिक पंथो का आगमन हुआ। उदाहरण के लिए बोद्ध ग्रंथ मे 62 धार्मिक संप्रदाय की चर्चा मिलती है ।
  2. इन धार्मिक पंथो के द्वारा मानव जीवन से संबन्धित मौलिक प्रश्नों पर विचार किया जाने लगा यथा जीवन-मृत्यु, सुख-दुख, आत्मा, ईश्वर आदि
  3. विभिन्न धार्मिक पंथो के बीच वैचारिक मतभेद भी था कोई आत्मा – परमात्मा को मानते थे तो दूसरे उसे अस्वीकार करते थे । उसी प्रकार अधिकांश धार्मिक पंथ कर्म और पुनर्जन्म की अवधारणा को स्वीकार करके चलते थे तो कुछ अन्य उन्हे अस्वीकार भी करते थे ।
  4. इस काल मे श्रमण संस्कृति पर बल दिया गया अर्थात सन्यास जीवन की ओर आकर्षण बढ़ा ।
  5. यह वैश्विक स्तर पर भी बौद्धिक चिंतन का काल था क्योंकि इस काल मे यूनान मे पायथागोरस , ईरान मे जरथ्रस्ट तथा चीन मे कन्फ़्यूशियस एवं लाओत्से जैसे चिंतक हुये ।
उपनिषद वैदिक चिंतन का निष्कर्ष प्रस्तुत करता है प्रकाश डालिए ।

वैदिक धर्म मे बहुदेववाद की प्रवृति रही थी हालांकि ऋग्वेद मे एकेश्वरवाद का भी तत्व मिलने लगता है जब यह घोषित किया गया कि सत्य एक है परंतु विद्वान उसे अलग – अलग नाम देते है ।

आगे अरण्यक नामक ग्रंथ मे तप पर बल दिया गया । उसकी अगली कड़ी उपनिषद है जो ब्रह्म एवं आत्मा कि एकता की बात करता है उसके अनुसार सर्वोच्च आत्मा , ब्रह्म एवं आत्मा दोनों मे निहित होती है । परंतु अज्ञानता के कारण आत्मा उसे समझ नहीं पाती है।

अत: उपनिषद ज्ञान को मोक्ष का साधन मानता है और वह ज्ञान है ब्रह्म तथा आत्मा की एकता का ज्ञान । उसके अनुसार यह ज्ञान प्राप्त होते ही आत्मा सांसरिक बंधनो की जकड़ से मुक्त हो जाती है इस प्रकार उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है ।

बोद्ध दर्शन पर प्रकाश डालिए ।

    संसार के संबंध मे बोद्ध पंत की निम्नलिखित धारणाये थी –

    1. यह संसार दुखमय(दुख है, दुख का कारण है ,दुख का निदान है , दुख के निदान के उपाय है , फिर वह दुख के निदान के रूप मे आष्टांगिक मार्ग की अवधारणा रखता है ) है ।
    2. यह संसार क्षणिक है अर्थात प्रत्येक क्षण बदलता है ।
    3. यह संसार आत्मा विहीन है । एक तरफ बोद्ध पंथ कर्म और पुनर्जन्म को स्वीकार करता है वहीं आत्मा को नकार देता है। अत: यह प्रश्न उपस्थित होता है कि आखिर एक से दूसरे जन्म मे क्या जाता है । बोद्ध पंथ ने इसकी व्याख्या प्रत्युतसमुत्पाद चिंतन के माध्यम से करने का प्रयास किया। दूसरे शब्दो मे अगर दुख का कारण जन्म है तो जाम का कारण कर्म फल रूपी चक्र है । इस प्रकार कार्य-कारण पद्धति के माध्यम से उसने पुनर्जन्म कि व्याख्या करने का प्रयास किया एक उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है जिस प्रकार एक दीपक बुझते हुये दूसरे दीपक को जला देता है तो पहला दीपक कारण है और दूसरा दीपक उसका परिणाम । इस प्रकार दूसरा दीपक उसका पुनर्जन्म है । अत: हम ऐसा कह सकते है कि एक से दूसरे जन्म मे कर्म जाता है ।
    4. जैन दर्शन कि व्याख्या कीजिये ।

    जैनियों के अनुसार यह सृष्टि शाश्वत है अर्थात इसका न कोई आदि है न कोई अंत। परंतु इसमे उत्थान एवं पतन का काल आता है उत्थान के काल को उत्सर्पिनी और पतन के काल को अवसरपिणी कहा जाता है । उत्थान के काल मे 63 शलाका पुरुष (महान पुरुष) पैदा होते है । इनमे 24 तीर्थंकर एवं 12 चक्रवर्ती शासक होते है ।

    जैन पंथ के अनुसार जीव और अजीव के संयोग से इस सृष्टि का संचालन होता है । जीव का अर्थ है आत्मा और अजीव की श्रेणी मे धर्म (गति का बोधक), अधर्म (अगति का बोधक), आकाश (अन्तरिक्ष), काल(समय), पुदगल (कर्म) आते है । जैन पंथ का उद्देश्य है जीव को पुदगल से मुक्त करना । इसके लिए दो प्रक्रियाओ पर बल दिया जाता –

    • जीव मे पुदगल के प्रवेश को रोकना इसे संवर कहा जाता है
    • जीव मे प्रविष्ट पुदगल को नष्ट करना इसे निर्जरा कहा जाता है । निर्जरा के अंतर्गत ही कायाक्लेश पर बल दिया जाता है ।

    जैन पंथ मे पाँच अनुव्रत अथवा महाव्रत का प्रावधान है । जैन दर्शन मे स्यादवाद अथवा अनेकांतवाद का महत्व है । इसके अनुसार सत्य एक है अथवा एक से अधिक है , स्थिर है अथवा परिवर्तनशील है । अत: हमे सोच – समझ कर व्यक्तव्य देना चाहिए । स्यादवाद मे सत्य की 7 अवस्थाए बताई गयी है । इस दर्शन का प्रभाव गांधी पर देखा जा सकता है ।


    उपनिषद, बोद्ध दर्शन और जैन दर्शन मे समानता :

    1. सभी ने वैदिक कर्मकांड पर चोट की ।
    2. तीनों कर्म और पुनर्जन्म की अवधारणा मे विश्वास करते है ।
    3. तीनों का बल संसार से मुक्ति पर है अर्थात ये तीनों निवृति मार्गी है ।

    तीनों मे असमानता के बिन्दु :

    1. उपनिषद का उद्देश्य था वैदिक धर्म मे सुधार लाकर उसे मजबूत बनाना इसलिए उसने केवल वैदिक कर्मकांड को अस्वीकार किया था । परंतु बोद्ध और जैन पंथ ने वैदिक धर्म को ही अस्वीकार कर दिया ।
    2. उपनिषद सर्वोच्च अथवा एक आत्मा की बात करता है वहीं जैन पंथ सजीव वस्तुओ के अतिरिक्त निर्जीव वस्तुओ मे भी आत्मा खोजता था। जबकि बोद्ध पंथ ने आत्मा एवं परमात्मा को अस्वीकार कर दिया
    3. बोद्ध पंथ मे निर्वाण इस शरीर मे रहते हुआ भी प्राप्त किया जा सकता था तथा यह गृहस्थों के लिए भी उपलब्ध था जबकि जैन पंथ मे केवल्य शरीर त्यागने के पश्चात ही प्राप्त होता तथा वह केवल भिक्षुकों के लिए ही उपलब्ध था।
    4. बोद्ध पंथ मध्यम मार्ग मे विश्वास करता है परंतु जैन पंथ का दृष्टिकोण अतिवादी था अर्थात वह कठिन साधना पर बल देता था।

    ❓ बोद्ध पंथ की लोकप्रियता के क्या कारण थे ? सौदाहरण स्पष्ट कीजिये ।

    बोद्ध पंथ एक ऐसा धार्मिक पंथ था जिसका भारत के अंदर और भारत से बाहर भी प्रसार हुआ तथा प्रचलित धार्मिक पंथो मे इसे सबसे अधिक लोक प्रियता मिली। इसकी लोकप्रियता के निम्नलिखित कारण थे –

    1. इसने आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व को अस्वीकार कर अपने आप को धार्मिक विवादो से दूर रखा ।
    2. इसने अहिंसा पर बल देकर कृषि अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन दिया वहीं महाजनी एवं मुनाफा अर्जन को न्यायोचित करार देकर व्यापार को भी प्रोत्साहन दिया इसीलिए इसे गृहस्थ एवं व्यापारी दोनों का समर्थन मिला ।
    3. इसने ब्राह्मणो की बोद्धिक श्रेष्ठता को चुनौती दी अत : क्षत्रिय का समर्थन इसे मिल गया ।
    4. बोद्ध पंथ ने ऐसे मुद्दो को उठाया जो सार्वदैशिक एवं सर्वकालिक था ये मुद्दे थे – दुख, बीमारी, बुढ़ापा एवं मृत्यु । इसलिए भारत के धार्मिक पंथो मे एकमात्र बोद्ध पंथ ही विश्व धर्म बन सका ।
    5. इसने महिलाओ के प्रति भी संवेदनशीलता दिखाई । उदाहरण के लिए इसने बोद्ध संघ का दरवाजा महिलाओ के लिए भी खोल दिया। साथ ही थेरीगाथा नामक रचना मे भिक्षुणीयों की कविता मिलती है जो दर्शाती है कि बोद्ध पंथ महिलाओ के प्रति बहुत ही संवेदन शील रहा था ।

    ❓ महात्मा बुद्ध धर्म सुधारक के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे इस कथन पर टिप्पणी कीजिये ।

    धर्म और समाज के बीच गहरा संबंध रहा है । धर्म के द्वारा सामाजिक प्रगति मे भी बाधा उत्पन्न की जाती है इसलिए धर्म सुधारक प्राय: समाज सुधारक भी बन जाते है वैदिक कालीन धार्मिक अनुष्ठान ने सामाजिक प्रगति के मार्ग मे भी बाधा उत्पन्न करने का प्रयास किया था । एक तरफ यज्ञ एवं पशु बाली पर अधिक बल दिया जा रहा था तो दूसरी तरफ ब्राह्मणवादी पितृ सत्ता वाद का बोलबाला था ।

    बोद्ध पंथ एवं महात्मा बुद्ध ने उन प्रश्नों का जवाब देना चाहा इस क्रम मे महात्मा बुद्ध ने ना केवल यज्ञ एवं कर्मकांड बल्कि वैदिक धर्म को ही अस्वीकार कर दिया और उसकी जगह मानवीय मूल्यो पर आधारित एक वैकल्पिक धार्मिक पंथ स्थापित करने का प्रयत्न किया। उसी प्रकार उन्होने यह घोषित किया कि वर्ण व्यवस्था ईश्वर निर्मित नहीं बल्कि मानव निर्मित है । फिर उन्होने ब्राह्मण वर्ण कि श्रेस्थता को चुनौती दी और सभी वर्णो के लिए अपने संघ का दरवाजा खोल दिया इतना ही नहीं उन्होने महिलाओ को भी संघ मे प्रवेश दिया। भिक्षुणीयों द्वारा लिखित थेरीगाथा महिलाओ के प्रति बोद्ध पंथ कि संवेदनशीलता को दर्शाता है ।

    इस प्रकार हम देखते है कि महात्मा बुद्ध धर्म सुधारक होने के साथ – साथ समाज सुधारक भी बन गए।


    ❓ बोद्ध पंथ वर्तमान काल मे कहाँ तक प्रासंगिक है ?

    भारतीय संस्कृति मे बोद्ध पंथ का महत्वपूर्ण योगदान रहा है । उसके महत्व का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि न केवल अपने युग के लिए प्रासंगिक रहा था बल्कि कुछ कारणो से यह वर्तमान मे भी प्रासंगिक बना हुआ है। जहां तक इसकी प्रासंगिकता का सवाल है तो इसके कुछ सिद्धांत आज प्रासंगिक नहीं रह गए है यथा 4 आर्य सत्य तथा निर्वाण कि अवधारणा । परंतु इसके निम्नलिखित विचाए वर्तमान मे भी प्रासंगिक है –

    • मध्यम मार्ग पर बल- यह उत्तर आधुनिक समाज की एक बड़ी चुनौती का हल प्रस्तुत करता है वह है – जीवन मे अतिवाद पर नियंत्रण । अतिवादसे तात्पर्य है – अतिउत्पादन एवं अति उपभोग । इसने पहली समस्या के रूप मे पर्यावरण संकट को जन्म दिया। जिसने दुनिया को विनाश के कगार पर ला दिया है । फिर दूसरी समस्या के रूप मे लोगो के जीवन मे बढ़ता हुआ कार्यभार है और इन दोनों का निराकरण बोद्ध पंथ के द्वारा प्रतिपादित मध्यम मार्ग है ।
    • बोद्ध पंथ ने जाति व्यवस्था के साथ हमेशा असमझोता वादी रुख बनाए रखा था यहीं कारण है कि 1956 मे डॉ भीमराव अंबेडकर ने बोद्ध पंथ को स्वीकार कर लिया और वर्तमान मे भी यह दलित समूह को आकर्षित करता रहा है ।
    • अहिंसा – वर्तमान मे आतंकवाद से ग्रस्त विश्व के लिए अहिंसा कि अवधारणा एक बड़ा उपचार है तथा बोद्ध पंथ अहिंसा की अवधारणा को प्रतिपादित करने के लिए जाना जाता है
    • नैतिक पहलू पर बल – बोद्ध पंथ एक अनिश्वरवादी पंथ रहा है जिसका हमेशा बल जीवन के नैतिक पहलू पर रहा है । इसे धम्म का नाम दिया जाता है यह सभी कालो के लिए उपयोगी है ।
    • तर्कवाद – बोद्ध पंथ ने आस्था की जगह तर्कवाद या कार्य – कारण पद्धति पर बल देता है बुद्ध ने स्वयं यह घोषित किया था कि प्रत्येक व्यक्ति अपना प्रकाश स्वयं है ।
    1. भौतिकतावादी चिंतक – इस काल मे चिंतको का एक ऐसा समूह है जो मानकर चलता है कि मनुष्य का भविष्य पूर्व निर्धारित है कृत्रिम उपायो से उसमे परिवर्तन नहीं लाया जा सकता है । इनके अनुसार न तो कर्म होता है ण पुनर्जन्म इस समूह के चिंतको मे हम अजित केशकंबली, पूरण कश्यप , मक्खली गोशाल, संजय वैलिट्टपुत्र आदि । अजित केशकंबली ने घोषित किया कि न तो कर्म होता है न पुनर्जन्म इसलिए जो चाहते हो वो करो। यह कहलाया यदृच्छावादी । इसी की शिष्य परंपरा मे चार्वाक का आगमन हुआ उसने लोकायत दर्शन दिया । चार्वाक प्रत्यक्ष अनुभव को ज्ञान का साधन मानता है मक्खली गोशाल ने आजीवक संप्रदाय की स्थापना की । ये चिंतक नास्तिक कहलाए ।

    मौर्य काल :

    • क्या अशोक का धम्म बोद्ध पंथ था?
      • यद्यपि यह सही है कि अशोक अपने जीवन मे एक समर्पित बोद्ध था। इसके निम्न उदाहरण है –
    1. राजस्थान के भब्रू शिलालेख मे उसने त्रिरत्न मे आस्था प्रकट की है
    2. उसने अपने शासन के 20 वें वर्ष मे नेपाल की रुम्मिदेई की यात्रा की और वहाँ उसने बुद्ध के सम्मान मे कर की राशि मे कमी लायी।
    फिर अशोक का धम्म क्या था ?

    यह विभिन्न धार्मिक पंथो के विचारो का सार था उसके धम्म मे नैतिक एवं सामाजिक जीवन के मूल्य शामिल थे वह राजधर्म था। उसका बल निम्नलिखित पहलुओ पर था –

    1. माता, पिता एवं गुरु की सेवा
    2. दासों , नौकरों और पशुओ के प्रति करुणा का भाव
    3. अल्प बचत एवं अल्प खर्च
    4. क्रोध , हिंसा एवं निष्ठुरता से बचना

    अर्थात उसका धम्म जियो और जीने दो के सिद्धांत से प्रेरित था ।


    अशोक की धम्म नीति को किन कारको ने प्रेरित किया ?
    1. राजनीतिक कारक – अशोक केसाम्राज्य का उत्तर से दक्षिण भारत तक विस्तार हो चुका था अत: उसकी प्राथमिकता थी किसी भी तरह से उसकी एकता और अखंडता को बनाए रखना । उसे बनाए रखने के लिए 2 विकल्प थे । एक विकल्प था सैन्य शक्ति का प्रयोग , परंतु यह स्थायी समाधान नहीं था । वहीं दूसरा विकल्प था मेल-मिलाप की नीति , धम्म नीति इसी पर आधारित था और अशोक ने इसे एक कारगर उपाय माना ।
    2. सांस्कृतिक कारक – अशोक के साम्राज्य मे विभिन्न धार्मिक समूह के लोग निवास करते थे उसके अभिलेखो मे इन्हे निम्न समूहो मे बंता गया है –
    • ब्राह्मण
    • श्रमण
    • आजीवक
    • अन्य

    इनके बीच परस्पर टकराहट न हो इसे ध्यान मे रखकर अशोक ने धम्म नीति का प्रतिपादन किया

    1. आर्थिक कारक – एक तरफ कृषि अर्थव्यवस्था का प्रसार हो रहा था वहीं दूसरी तरफ बड़ी संख्या मे पशुओ को बलि दी जा रही थी जबकि कृषि अर्थव्यव्स्था की आवश्यकता थी – पशु धन की रक्षा । अशोक ने धम्म नीति पर बल देकर पशु धन की सुरक्षा पर बल दिय

    कौटिल्य एवं अशोक की तुलना –

    1. दोनों के दृष्टिकोण मे अंतर है जहां अशोक का मानना है कि साधन की पवित्रता साध्य की पवित्रता को निर्धारित करती है वहीं कौटिल्य के अनुसार साध्य की पवित्रता साधन की पवित्रता को सुनिश्चित करता है । दूसरे शब्दो मे अशोक का दृष्टिकोण आदर्श वादी है तो कौटिल्य का दृष्टिकोण यथार्थ वादी एवं अवसर वादी है ।
    2. घरेलू नीति मे कौटिल्य का बल दंड शक्ति के उपयोग पर है वहीं अशोक का लक्ष्य कम से कम दंड शक्ति का उपयोग कर धम्म नीति के माध्यम से शासन का संचालन करना है
    3. विदेश नीति मे कौटिल्य ने राज मण्डल सिद्धांत पर बल दिया इसके तहत उसने पड़ोसी राज्यों को शत्रु एवं मित्र राज्यों मे बांटा फिर उसके साथ पृथक – पृथक नीति अपनाए जाने पर बल दिया । भारत के विदेशी मामलों के विशेषज्ञ शिवसंकर मेनन ने कौटिल्य के अर्थशास्त्र मे वर्णित राज मण्डल सिद्धांत की तुलना आधुनिक शक्ति संतुलन की अवधारणा से की है । इनके विचार मे यह अवधारणा यूरोप मे वेस्टे फेलिया की संधि के बाद 17 वीं सदी मे आई थी परंतु भारत मे राजमंडल के रूप मे यह अवधारणा 4 सदी ईशा पूर्व मे ही आ गयी । दूसरी तरफ अशोक ने युद्ध विजय की नीति को छोडकर धम्म विजय की नीति अपनाई । धम्म विजय से आशय है मेल – मिलाप की नीति अर्थात उसने पड़ोसी द्शो मे राजदूत की जगह धम्म दूत की नियुक्ति की तथा उन देशो मे अपने धार्मिक मिशन भी भेजे । वह विश्व का पहला शासक था जिसने युद्ध का विकल्प खोजने का प्रयास किया पिछले लगभग 2400 वर्षो मे विश्व ने भौतिक क्षेत्र मे काफी प्रगति कर ली है परंतु नैतिक क्षेत्र मे अशोक की घोषणा से आगे नहीं बढ़ सका है।
    4. कौटिल्य का बल राज्य विस्तार पर रहा था उसकी नीति एक ऐसे राज्य के लिए है जोसाम्राज्य बनने की ओर अग्रसर है वहीं अशोक का बल एक बड़े साम्राज्य के अनुकूल है जिसे विस्तार नहीं बल्कि स्थायित्व चाहिए ।

    मौर्योत्तर काल (200 – 300 ईशा पूर्व )-

    मौर्योत्तर काल मे धर्म के क्षेत्र मे आर्य और गैर आर्य तत्वो के बीच सामंजस्य हो रहा था और इसका एक बड़ा कारण था भूमि अनुदान । भूमि अनुदान के माध्यम से सीमावर्ती क्षेत्र मे ब्राह्मण एवं बोद्ध भिक्षु स्थापित किए गए थे ।

    पुरोहित वर्ग के प्रभाव से आर्य एवं गैर आर्य पंथ के बीच सामंजस्य संभव हुआ जैसा कि हम जानते है कि आर्यों की उपासना पद्धति मे यज्ञ की पद्धति को महत्व था वहीं गैर आर्य पंथ मे भक्ति को महत्व दिया जा रहा था । फिर आर्य और गैर आर्य दोनों प्रकार के देवताओ के बीच सामंजस्य लाने के लिए अवतार वाद की अवधारणा आई फिर इसी काल मे विभिन्न देवताओ की मूर्तियाँ बनने लगी इन परिवर्तनों का प्रभाव सभी धार्मिक पंथो पर देखा गया यथा ब्राह्मण पंथ , बोद्ध पंथ, जैन पंथ आदि

    1. ब्राह्मण पंथो पर प्रभाव : ब्राह्मण पंथो के अंतर्गतपरिवर्तन के परिणाम स्वरुप वैष्णव पंथ, शैव पंथ और कई नए पंथो का विकास हुआ ।
      • वैष्णव पंथ – वैष्णव पंथ का विकास धर्म के क्षेत्र मे गैर – आर्य एवं आर्य तत्वो के बीच सामंजस्य का परिणाम था मथुरा क्षेत्र मे वसुदेव कृष्ण , बलराम अथवा संकर्षण , शाम्ब , प्रद्युमन एवं अनिरुद्ध को देवता के रूप मे देखा जाता था ये पंच वृष्णि नायक अथवा जनजातीय मुखिया थे जिन्हे देवता का स्तर प्राप्त हुआ । इनके विषय मे सूचना हमे प्रथम सदी के मथुरा से प्राप्त मोरा अभिलेख से मिलती है । इसकी सूचना हमे पाणिनी के अष्टाध्यायी तथा छांदोग्य उपनिषद से मिलती है । उसी प्रकार हिमालय की तलहटी मे एक क्षेत्रीय देवता के रूप मे नारायण की पुजा प्रचलित थी । ये पशुचारकों के देवता थे आगे वसुदेव कृष्ण का नारायण के साथ एकीकरण हो गया । इसके पश्चात विष्णु नामक आर्य देवता ( जिसकी चर्चा हम वैदिक काल से ही सुनते है ) वसुदेव कृष्ण एवं नारायण के ऊपर आरोपित कर दिये गए अत: वैष्णव पंथ का विकास हुआ
      • शैव पंथ – शिव एक गैर-आर्य देवता थे जिसकी चर्चा हम हड़पा सभ्यता के काल से ही सुनते है , का एकीकरण एक आर्य देवता रुद्र के साथ हो गया । इसके परिणामस्वरूप शैव पंथ का विकास हुआ । अवतारवाद के प्रभाव स्वरूप विष्णु के 10 और शिव के 28 अवतारो की परिकल्पना की गई । इतना ही नहीं अब इन देवताओ की मूर्तिया भी बनने लगी । तह वह काल था जब ब्राह्मणवादी पंथो ने कुछ गैर – आर्य देवताओ को अपना लिया था उदाहरण के लिए गणेश , कुमार कार्तिकेय , मातृदेवी , वृक्ष पूजा , पशु पूजा , नाग पूजा यक्ष – यक्षिणी की पूजा आदि
    2. बोद्ध पंथ – जैसा कि हमने देखा कि बोद्ध पंथ का विकास लगभग पाँचवी सदी ईशा पूर्व मे हुआ था तथा यह क्रमिक रूप मे अपना प्रसार करता रहा था विभिन्न शासको के द्वारा इसे संरक्षण मिला तथा व्यापारी एवं कुलीनों ने भ्हि इसे संरक्षण दिया परंतु समय के साथ – साथ इसके स्वरूप मे परिवर्तन होता रहा था विशेषकर चौथी बोद्ध संगीति , जो कश्मीर के कुंडलवन मे हुई थी , बोद्ध पंथ पर गहरा प्रभाव छोड़ा । यहपंथ औपचारिक रूप मे दो शाखाओ मे विभाजित हो गया- हीनयान एवं महायान । महायान शाखा अपने स्वरूप मे हीनयान से बहुत अलग हो गया क्योंकि इसके केंद्र मे बुद्ध नहीं बल्कि बोधिसत्व था और ऐसा भक्ति के प्रभाव के कारण हुआ । बोद्ध पंथ कि महायान शाखा और हीनयान शाखा के बिच मतभेद के निम्न बिन्दु है-
      • हीनयान बुद्ध कि ऐतिहासिकता मे विश्वास करता है तो महायान बोधिसत्व कि उपासना मे । बोधिसत्व वह है जो निर्वाण प्राप्त करने कि योग्यता तो रखता है लेकिन वह अपने निर्वाण को टालता रहता है ताकि वह आँय लोगो को निर्वाण प्राप्त करा सके ।
      • हीनयान बोद्ध पंथ कहता है की प्रत्येक व्यक्ति अपना दीपक स्वयं है किन्तु महायान बोद्ध पंथ गुणों के हस्तांतरण मे विश्वास रखता है ।
      • हीनयान बोद्ध पंथ मे बुद्ध के प्रतीक चिन्ह की उपासना होती है यथा खड़ाऊ , कमण्डल आदि । वहीं महायान बोद्ध पंथ मे मूर्तियो की पूजा होती है
      • हीनयान बोद्ध पंथ मे पाली भाषा का प्रचलन था तो महायान मे संस्कृत का ।
    3. जैन पंथ – जैन पंथ पर भी भक्ति, अवतरवाद एवं मूर्ति पूजा की अवधारणा का प्रभाव देखा जा सकता है । इस काल मे तीर्थंकरो की पूजा आरंभ हो गई थी

    गुप्तकालीन धर्म :

    गुप्त काल मे धर्म के क्षेत्र मे निम्न विशेषता देखने मिलती है –

    • इस काल मे ब्राह्मण वादी पुनरुत्थान हुआ जिसका प्रभाव धर्म के क्षेत्र मे देखा गया तथा धर्म के क्षेत्र मे यज्ञ का महत्व बढ़ गया उदाहरण के लिए समुद्रगुप्त एवं कुमारगुप्त – 1 जैसे शासकों ने सफलता पूर्वक यज्ञ को सम्पन्न किया । परंतु फिर भी जन सामान्य के बीच भक्ति की परिकल्पना विकसित हुई पुरानो पर आधारित भक्ति को अत्यधिक लोकप्रियता मिली। भक्ति की अवधारणा ने ब्राह्मण पंथ, बोद्ध पंथ, जैन पंथ सभी पर अपना प्रभाव छोड़ा । ब्राह्मण पंथ के अंतर्गत वैष्णव भक्ति एवं शैव भक्ति का बेहतर विकास देखा गया । वैष्णव भक्ति की विशेष प्रगति हुई। भागवत गीता भक्ति पर एक महत्वपूर्ण रचना है । भक्ति के साथ अवतारवाद की परिकल्पना जुड़ गई थी और अवतारवाद के साथ मूर्ति पूजा । अब देवताओ की मूर्तियाँ मंदिरो मे स्थापित की जाने लगी और उनकी उपासना आरंभ हो गई ।
    • फिर वहीं काल है जो गैर – आर्य पंथ के प्रभाव से तंत्रवाद का आरंभ हुआ । इस काल मे देवताओ के साथ देवियाँ जुडने लगी और इस प्रकार की अवधारणा को बढ़ावा मिला कि पुरुषो कि क्रियाशीलता को बढ़ाने के लिएमहिलाओ का संपर्क आवश्यक है यह तंत्रवाद के उद्भव का रास्ता तैयार कर दिया ।
    • इस काल मे ब्रह्मा , विष्णु और महेश के रूप मे त्रिदेव कि परिकल्पना स्थापित हुई ।
    • प्राचीन काल मे विभिन्न विचार एवं मत प्रचलित थे । गुप्त काल तक आकार ये 6 प्रमुख दर्शन के रूप मे स्थापित हो गए । ये दर्शन इस प्रकार है –
      1. सांख्य – इसके प्रवर्तक कपिल थे । यह सबसे प्राचीन दर्शन माना जाता है । इसने सृष्टि के निर्माण मे प्रकृति एवं पुरुष की भूमिका पर बल दिया है। प्रकृति एवं पुरुष की अवधारणा जैन पंथ के जीव – अजीव की अवधारणा के निकट है ।
      2. योग – इसमे शरीर की साधना के द्वारा चित्त के निर्मल करने पर बल दिया जाता था । इसका आधार पत्तंजली का योग सूत्र है ।
      3. वैशेषिक – यह एक प्रकार का परमाणु दर्शन था । इसके प्रवर्तक उलूक कणाद थे
      4. न्याय – यह तर्क शास्त्र पर आधारित था इसके विकास मे अक्ष पद गौतम की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है ।
      5. मीमांसा – इसका उद्देश्य वेदों को प्रतिष्ठित करना था
      6. उत्तर मीमांसा – यह वेदान्त चिंतन था इसके आरंभिक प्रवर्तकों मे बादरायण था । आगे शंकरचार्य ने उपनिषद, योगसूत्र एवं भागवत गीता पर टिकाये लिखी इन्हे शंकर के वेदान्त के रूप मे जाना जाता है ।

    गुप्तोत्तर कालीन धर्म :

    उत्तर भारत :

    तंत्रवाद – इस काल मे उत्तर भारत मे प्रभावी धार्मिक पंथ तंत्रवाद रहा था । तंत्रवाद कई प्रकार के वाम आचरण से जुड़ा हुआ था अर्थात इसमे पंच मकारों कि साधना पर बल दिया जाता था । ये पंच मकार थे – मांस , मदीरा , मैथुन , मत्स्य एवं मुद्रा ।

    तंत्रवाद मे तंत्र मंत्र तथा जादुई शक्ति पर बल दिया जाता था । इसका एक सामाजिक पक्ष भी था और यह जनसामान्य से जुड़ा हुआ आंदोलन था यह एक धार्मिक आंदोलन के साथ – साथ सामाजिक आंदोलन का रूप लेने लगा था क्योंकि इसने अपना दरवाजा शूद्रो एवं महिलाओ के लिए भी खोल दिया । इतना ही नहीं महिलाओ को गुरु का पद भी प्राप्त हो सकता था ।

    तंत्रवाद का दृष्टिकोण पौलौकिक कि तुलना मे लौकिक ही अधिक था क्योंकि इसमे सांप और बिच्छू को काटने से फेलते हूए जहर को रोकने के लिए भी मंत्रो का प्रावधान था ।

    विभिन्न धार्मिक पंथो पर तंत्रवाद का प्रभाव देखा गया जो इस प्रकार है –

    • ब्राह्मण पंथ –
      1. शैव पंथ – शैव पंथ के अंतर्गत कापालिक एवं कालामुख शाखा का विकास हुआ । कापालिक साधू श्मशान मे रहते थे । नरकपाल मे भोजन करते थे और शरीर पर चिता की राख़ मलते थे ।
      2. वैष्णव पंथ – इसके अंतर्गत सहजीया शाखा का विकास हुआ
      3. मातृ देवी की पूजा – इसका मुख्य क्षेत्र पूर्वी क्षेत्र अथवा बंगाल था । मातृ देवी की पूजा तंत्रवाद से अत्यधिक प्रभावित हुई ।
    • बोद्ध पंथ- बोद्ध पंथ के अंतर्गत वज्र यान शाखा का विकास हुआ । वज्र यान शाखा पर तंत्रवाद का गहरा प्रभाव था । इसमे जादुई शक्ति पर विशेष बल दिया जाता । वज्र यान के अंतर्गत बुद्ध के साथ एक स्त्री तारा जुड़ गई । इसका मुख्य केंद्र पाल शासको के अंतर्गत बंगाल हुआ।
    • जैन पंथ – वैसे जैन पंथ पर तंत्रवाद का सबसे कम प्रभाव था परंतु जैन पंथ ही अंतर्गत भी यक्ष एवं यक्षिणी की पूजा आरंभ हो गई ।
    दक्षिण भारत –

    दक्षिण भारत मे छ्ठी – सातवीं सदी मे एक धार्मिक आंदोलन आरंभ हुआ जो लगभा 11 वीं सदी तक चलता रहा। इसे भक्ति आंदोलन का नाम दिया जाता है ।

    उत्तर से आई हुई पुरानो पर आधारित भक्ति तमिल साहित्य अथवा संगम साहित्य मे प्रतिपादित प्रेम के तत्व के साथ जुड़ गई और फिर दक्षिण की भक्ति मे भावनात्मक पक्ष प्रबल हो गया । भक्ति से 12 अलवार (विष्णु पूजक ) एवं 63 नयनार (शिव पूजक ) संत जुड़े हुये थे । अलवार संतो मे एक महिला संत अंदाल भी थी तथा एक पाण्डेय शासक कुल शेखर भी रहा था । उसी प्रकार नयनार संतो मे अप्पर, नान संबंदर , सुंदर मूर्ति आदि संत प्रमुख थे ।

    अलवार और नयनार संत मिश्रित जाति से थे अर्थात उच्च एवं निम्न जाति दोनों से । परंतु जाति व्यवस्था के प्रति इनके मन मे सम्मान का भाव नहीं था अत: इन्होने जाति समानता की भी बात की । इसलिए भक्ति आंदोलन एक लोकप्रिय आंदोलन के साथ – साथ एक सामाजिक आंदोलन भी था परंतु जब आगे चलकर ब्राह्मण आचार्यों का आगमन हुआ तो फिर भक्ति आंदोलन का स्वरूप बदल गया।

    अलवार संतो की रचना 10 वीं सदी तक प्रबंधम नामक ग्रंथ मे संकलित हुई। द. की परंपरा मे प्रबंधम को वेदो की तरह सम्मान प्राप्त था उसी प्रकार नयनार संतो की रचना 12 वीं सदी तक पेरियपुराणम नामक ग्रंथ मे संकलित हुआ ।

    पूर्व मध्य काल :

    उत्तर भारत –

    नाथपंथी आंदोलन – नाथपंथ लगभग 10 वीं सदी मे एक धार्मिक आंदोलन के रूप मे उदित हुआ । इसके संस्थापक मत्स्येंद्र्नाथ थे इसके आगे गोरखनाथ ने इसके प्रसार मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उत्तर भारत मे यह एक प्रभावी आंदोलन के रूप मे ढल गया इसने धार्मिक आंदोलन के साथ – साथ एक सामाजिक आंदोलन का भी रूप ले लिया क्योंकि इसने निम्न जाति के लोगो के लिए अपना दरवाजा खोल दिया साथ ही इसने ब्राह्मण वाद को गहरी चुनौती दी । नाथ पंथ ने योग की पद्धति पर विशेष बल दिया तथा अपनी भाषा के रूप मे उल्ट्बासियों का प्रयोग किया । उत्तर भारत मे यह इतना प्रभी रहा कि इसने कबीर और नानक जैसे भक्ति संत के साथ- साथ निज़ामुद्दीन औलिया जैसे सूफी संत पर भी अपना प्रभाव छोड़ा ।

    भारत मे बोद्ध पंथ के इतिहास मे पाल काल को अतिमहत्वपूर्ण काल क्यों माना जाता है ?

    भारत मे बोद्ध पंथ के इतिहास मे पाल काल को इसलिए अतिमहत्वपूर्ण काल मान सकते है कि जिस समय भारत के अन्य क्षेत्रों के जब बोद्ध पंथ अवनति पर था उत्तर भारत मे लगभग उसका सफाया हो गया था तब पालों ने बोद्ध पंथ को संरक्षण देकर भारत मे उसको जीवित रखा ।

    निम्नलिखित कारणो से बोद्ध पंथ का पतन हुआ था –

    1. महायान शाखा के विकास के साथ बोद्ध पंथ का स्वरूप बदल चुका था और उसे ब्राह्मण पंथ से पृथक करना मुश्किल हो गया था ।
    2. हूणों के आक्रमण के परिणामस्वरूप बोद्ध भिक्षुओ पर अत्याचार हुआ
    3. शंकराचार्य ने हिन्दू धर्म को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया इस कारण भी बोद्ध पंथ को धक्का लगा
    4. 7 वीं सदी मे चीनी यात्री हवेनसांग ने उत्तर भारत के अधिकांश बोद्ध केन्द्रो को पतन की स्थिति मे पाया

    फिर पाल शासको ने इस संकट की घड़ी मे बोद्ध पंथ को निम्नलिखित रूप मे प्रोत्साहन दिया –

    1. बंगाल मे वज्र यान शाखा जन सामान्य से जुड़ी हुई थी क्योंकि जन सामान्य के बीच तंत्रवाद प्रचलित रहा था पाल शासको ने बोद्ध पंथ के लोकप्रिय स्वरूप को समझा और उसे संरक्षण दिया ।
    2. पालों के अधीन नालंदा विश्वविद्यालय को संरक्षण मिला साथ ही उस काल मे विक्रमशीला, ओदंतपुरी तथा सोमपुरा जैसे बोद्ध शिक्षा केन्द्रो का विकास हुआ ।
    3. पाल शासको ने बोद्ध कला को भी संरक्षण दिया अर्थात ताल पत्र एवं चित्र पट (कपड़े पर चित्र ) पर बोद्ध विषय से संबन्धित चित्र बनाए गए । तथा इस काल मे बोद्ध पंथ से संबन्धित कुछ महत्वपूर्ण ग्रंथो की भी रचना हुई ।
    4. पाल शासको के प्रयास से उत्तर – पूर्व मे नेपाल , सिक्किम , तिब्बत एव द.-पूर्वी एशिया मे बोद्ध पंथ का प्रसार हुआ । बोद्धों का सबसे बड़ा मंदिर इन्डोनेशिया के बोरबोडुर मे है ।
    दक्षिण भारत –
    हैंदव धर्मो धारक के रूप मे शंकराचार्य की भूमिका पर टिप्पणी कीजिये ?

    शंकराचार्य ने हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान के लिए निम्नलिखित कदम उठाए –

    • हिन्दू धर्म के वैचारिक दार्शनिक आधार को मजबूत करने के लिए वेदान्त चिंतन को पुनर्जीवित किया । उन्होने उपनिषद , ब्रह्म सूत्र और भागवत गीता पर टिकाये लिखी इसे शंकर के वेदान्त के रूप मे जाना गया
    • एक तरफ विद्वानो के लिए जहां उन्होने वेदान्त चिंतन को प्रतिपादित किया वहीं जन सामान्य के बीच उन्होने मूर्ति पूजा को प्रोत्साहन दिया तथा ब्रह्मा विष्णु और महेश की अवधारणा को ब्रह्म की अवधारणा से जोड़कर मूर्ति पूजा के लिए एक मार्ग तैयार कर दिया
    • भारत के चार छोरों पर यथा उत्तर मे बद्रीनाथ , द. मे शृंगेरी , पूर्व मे जगन्नाथ पूरी और पश्चिम मे द्वारिका के रूप मे 4 मठो की स्थापना की ।
    • हिन्दू धर्म के प्रचार के लिए उन्होने बोद्ध संघ के मॉडल पर सन्यासियों का संघ बनाया और ब्राह्मण सन्यासियों को अन्य धार्मिक पंथो के लोगो के साथ शास्त्रार्थ करने के लिए प्रोत्साहित किया

    भक्ति आंदोलन मे आचार्यो की भूमिका – ब्राह्मण आचार्यो के द्वारा भक्ति आंदोलन के स्वरूप मे परिवर्तन लाया गया 12 वीं सदी मे रामनुज का आगमन हुआ रामानुज ने भक्ति आंदोलन के द्वारा प्रतिपादित सामाजिक समानता के भाव को वर्ण विभाजन से जोड़ दिया वहीं दूसरी तरफ उन्होने भक्ति आंदोलन को एक स्पष्ट दार्शनिक आधार प्रदान किया उन्होने शकर के अद्वैत मे यथा संभव संशोधन लाकर उसे भक्ति के अनुकूल बनाया अत: रामानुज के विचार को विशिष्टा द्वैत का नाम दिया जाता है इसका बल निम्न करको पर रहा था –

    • शंकर का मानना था कि ब्रह्म और जीव दोनों एक ही तत्व से निर्मित है इसल्लिए दोनों एक है रामानुज ने उसमे संशोधन लाते हुये कहा कि दोनों एक हितत्व से निर्मित है परंतु दोनों एक नहीं है क्योंकि ब्रह्म अगर परिमाण है तो जीव उनका गुण ।
    • जीव कि मुक्ति के लिए ज्ञान आवश्यक है परंतु रामानुज के अनुसार जीव की मुक्ति के लिए ज्ञान आवश्यक है किन्तु उससे भी आवश्यक है-ईश्वर कि कृपा । अत: यही से प्रपतिवाद का चिंतन निकलता है ।
    • शंकर के अनुसार जीव कीमुक्ति ब्रह्म मे लीन हो जाने मे है परंतु रामानुज के अनुसार जीव की मुक्ति ब्रह्म मे लीन होने मे नहीं बल्कि उससे मिलने और मिलन का साक्षी बनकर उस आनंद को महसूस करने मे है ।

    Economy History Notes Rajasthan Art & Culture Rajasthan Geography Rajasthan GK Static GK


    Latest Posts

    Related Posts

    ByBySONU Jul 14, 2026

    राजस्थान में सिंचाई परियोजनाएँ

    राजस्थान में सिंचाई परियोजनाओं (Indira Gandhi Canal, Bhakra Nangal, Chambal Project) के बारे में विस्तार से जानें। प्रमुख…

    ByBySONU Jul 11, 2026

    प्राचीन काल की अर्थव्यवस्था: ऋग्वैदिक काल से पूर्व मध्य काल तक

    प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था कैसी थी? ऋग्वैदिक काल, मौर्य काल, गुप्त काल और पूर्व मध्य काल में कृषि,…

    ByBySONU Jul 8, 2026

    प्राचीन भारत का इतिहास : काल विभाजन, पुरापाषाण एवं मध्यपाषाण काल

    प्राचीन भारतीय इतिहास को समझने और उसके काल विभाजन का सटीक विश्लेषण। जानें पुरापाषाण और मध्यपाषाण काल के…

    ByBySONU Jul 6, 2026

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    Scroll to Top