प्राचीन काल की अर्थव्यवस्था
ऋग्वैदिक काल –
इस काल मे अर्थव्यवस्था का आधार पशु चारण था क्योंकि ऋग्वेद मे पशु चारण से जुड़ी हुई अनेक शब्दावलियाँ मिलती है यथा – गाविष्टि (युद्ध), गोप (राजा), गवयतु (दूरी माप की इकाई), दुहिता (पुत्री ) आदि ।
कृषि द्वितीयक पेशा थी संभवत: अर्थव्यवस्था मे इसे कम महत्व प्राप्त था चूंकि कृषि अधिशेष सीमित था इसलिए सिल्क एवं व्यापार भी पिछड़ा हुआ था । धातु के रूप मे अयस शब्द का प्रयोग होता था इसकी पहचान तांबा अथवा कांसे से हुई है । ऋग्वैदिक काल मे लोहे का प्रचलन नहीं था ।
नियमित मुद्रा का प्रचलन नही था मुद्रा के रूप मे हमे निष्क एवं शतमान का विवरण प्राप्त होता है । निष्क संभवत: कोई आभूषण होता था और शतमान सौ गायों की इकाई को दर्शाता था।
अर्थव्यवस्था मे व्यापार की भूमिका सीमित थी एक पणि नामक व्यापारियों की चर्चा मिलती है जो आर्यों के साथ वस्तुओ की लेनदेन करते थे ।
ऋग्वैदिक अर्थव्यवस्था एक ग्रामीण अर्थव्यवस्था थी ऋग्वेद मे हमे ग्राम की चर्चा नहीं मिलती ।
उत्तर वैदिक काल –
अर्थव्यवस्था मे कृषि का महत्व बढ़ गया । शतपथ ब्राह्मण नामक ग्रंथ मे राजा जनक को अपने हाथो से हल चलाते हुये दिखाया गया है । कृषि अधिशेष को प्रोत्साहन मिला तथा फसल के रूप मे यव(जौ) के साथ – साथ गोधूम (गेहूं ) एवं व्रीहि (चावल) की चर्चा मिलने लगती है ।
कृषि अधिशेष ने शिल्पों के विकास को प्रोत्साहन दिया क्योंकि वाजसनेयी संहिता मे विभिन्न प्रकार के शिल्पों का विवरण प्राप्त होता है इससे व्यापार के विकास मे प्रोत्साहन मिला परंतु नियमित मुद्रा का प्रचलन आरंभ नहीं हुआ था बल्कि मुद्रा के रूप मे निष्क एवं शतमान के साथ – साथ कृष्णल नामक मुद्रा की चर्चा भी मिलने लगती है।
इस काल मे नगरीकरण का विकास नहीं हुआ था अर्थव्यवस्था ग्रामीण ही थी परंतु तैत्तरीय अरण्यक नामक ग्रंथ मे पहली बार नगर शब्द का उल्लेख मिलता है ।
बुद्ध काल :
इस काल मे मध्य गंगा घाटी मे कृषि का प्रसार हुआ लोहे के उपकरणो की सहायता से जंगलो की सफाई संभव हुई दासों एवं श्रमिकों को खेती मे लगाया गया । धान की रोपाई की पद्धति विकसित हुई इसके कारण व्यापक कृषि अधिशेष उत्पन्न हुआ इससे शिल्पों एवं व्यापार के विकास को प्रोत्साहन मिला ।मुद्रा का प्रचलन आरंभ हुआ पहली नियमित मुद्रा के रूप मे आहत मुद्रा अथवा पंच मार्क्ड सिक्के पाँचवी सदी ईशा पूर्व से प्रयोग मे आने लगे। ये चाँदी एवं तांबे से निर्मित होते थे । तथा चाँदी – तांबे मिश्रित भी होते थे । बुद्ध काल मे ही द्वितीय नगरीकरण आरंभ हुआ अगर प्रथम नगरीकरण का केंद्र सिंधु घाटी रहा था तो द्वितीय नगरीकरण का केंद्र गंगा घाटी रहा ।
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मौर्य काल-
इस काल मे द्वितीय नगरीकरण को और भी प्रोत्साहन मिला क्योंकि राज्य ने कृषि शिल्प एवं व्यापार तीनों मे ही सक्रिय भूमिका निभाई थी । राज्य की अपनी भूमि को सीता भूमि कहा जाता था तथा उसमे सिताध्यक्ष नामक अधिकारी के अंतर्गत खेती क्राइ जाती थी खेती मे दासों , शूद्रों और युद्ध बंदियों को लगाया जाता था। साथ ही राज्य की ओर से सिंचाई के विकास के लिए भी काम किया गया । उदाहरण के लिए चन्द्रगुप्त मौर्य के एक अधिकारी पुष्यभूत ने सुदर्शन झील का निर्माण कराया था । उसी प्रकार कुछ शिल्पों पर राज्य का एकाधिकार था उदाहरण के लिए लोहशिल्प । जहाज निर्माण , हथियार निर्माण आदि । साथ ही राज्य व्यापार मे हिस्सा लेता था । राज्य की वस्तुए राज्य पण कहलाती थी ।
मौर्योत्तर काल –
इस काल मे भूमि अनुदान के माध्यम से कृषि अर्थव्यवस्था का प्रसार हुआ फिर सिंचाई की नवीन तकनीकी के रूप मे अरघट्ट के प्रयोग की सूचना मिलती है इसकी सूचना हमे सातवाहन कालीन एक ग्रंथ गाथाशप्तसती मे मिलती है ।
इस कारण कृषि अधिशेष को प्रोत्साहन मिला कृषि अधिशेष ने शिल्पों के विकास को विशेष प्रोत्साहन दिया अत: मिलिंदपनहों नामक ग्रंथ मे 75 व्यवसायो का जिक्र मिलता है इनमे 60 शिल्पों से जुड़ा हुआ है । इस काल मे शिल्पी समूह मे बंधकर उत्पादन करने लगे थे शिल्पियों का समूह श्रेणी कहलाता था और व्यापारियों के संगठन को निगम कहा जाता था । कृषि एवं शिल्पों के विकास ने व्यापार के विकास को प्रोत्साहन दिया इस काल मे विदेश व्यापार की विशेष प्रगति हुई इसका एक बड़ा कारण था रोमन व्यापार को प्रोत्साहन । पश्चिम मे रोमन साम्राज्य और पूर्व मे चीन हान साम्राज्य के बीच भारत था । एक रेशम मार्ग चीन को रोमन साम्राज्य से जोड़ता था । उसके एक भाग पर कुषाण साम्राज्य का भी नियंत्रण था इसलिए इस व्यापार का व्यापक लाभ भारत को मिला ।भारत से रोमन साम्राज्य को मुख्यत : मसाले, रेशम , लोहे के उपकरण , कीमती पत्थर तथा औषधि का निर्यात होता था बदले मे भारत को बड़ी मात्र मे चाँदी एवं सोना मिलता था तथ भारत, रोमन साम्राज्य से शराब एवं शराब के दो-हत्थे कलश अरेटाइन मृदभांड सीसे की बनी वस्तुए आदि आयात करते थे किन्तु व्यापार संतुलन भारत के पक्ष मे था । इस काल मे सर्वाधिक मात्र मे सिक्के जारी किए गए । कुषाण शासको ने रॉम के दीनार पैटर्न पर सबसे शुद्ध सोने के सिक्के जारी किए । शक शासको ने बड़ी संख्या मे चाँदी के सिक्के जारी किए । वहीं सातवाहन शासको ने चाँदी , तांबे, कांसे ,टीन , पोटीन एवं सीसे के सिक्के जारी किए । मौर्योत्तर काल मे आकर द्वितीय नगरीकरण अपने चरम पर पहुँच गगु
गुप्त काल :
इस काल मे भी भूमि अनुदान के माध्यम से कृषि अर्थव्यवस्था का प्रसार हो रहा था उसी प्रकार राजा के द्वारा सिंचाई के विकास के लिए भी काम किया गया उदाहरण के लिए स्कंदगुप्त के काल मे सुदर्शन झील की मरम्मत कराई गयी । अमर सिंह के अमरकोश मे 12 प्रकार की भूमि की चर्चा मिलती है ।
गुप्त काल मे आरंभ मे व्यापार को थोड़ा धक्का लगा था जब तीसरी सदी मे रोमन साम्राज्य के साथ मसाले व्यापार को धक्का लगा परंतु शीघ्र ही पूर्वी रोमन साम्राज्य के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित हो गया इसलिए गुप्त काल के पूर्वार्द्ध मे आर्थिक समृद्धि बनी रही थी । वात्सायन के कामसूत्र मे समृद्ध नगरीय जीवन की चर्चा मिलती है । उसी प्रकार चीनी यात्री फ़ाह्यान ने मध्य देश एवं पाटलिपुत्र की समृद्धि की चर्चा की है परंतु गुप्त काल के अंत तक पूर्वी रोमन साम्राज्य के साथ रेशम व्यापार को धक्का लगा क्योंकि पूर्वी रोमन साम्राज्य के व्यापारियों ने चीन ने रेशम बनाने की कला सीख ली थी । वहीं समय है कि मध्यस्थ एवं बिचौलियों के उद्भव के कारण आंतरिक व्यापार मे भी व्यवधान उत्पन्न हो गया था। हालांकि सर्वाधिक संख्या मे स्वर्ण सिक्के गुप्त काल मे जारी हुये थे परंतु चाँदी के सिक्के अपेक्षाकृत कम जारी हुये तथा तांबे के सिक्के गुप्त शासक रामगुप्त एवं कुमारगुप्त – 1 के मिले है ।
गुप्तोत्तर काल –
जैसा कि हमने देखा कि गुप्त काल के अंत तक व्यापार का पतन हुआ था इस कारण संभवत: गंगा घाटी मे नगरो का भी पतन हो गया तथा मुद्राओं की भी कमी हो गयी । पुरातात्विक साक्ष्य से यह ज्ञात होता है कि न केवल मुद्रा का अभाव हुआ बल्कि मुद्रा बनाने वाले साँचे की भी कमी पड़ गयी ।
परंतु दूसरी तरफ भूमि अनुदान एवं सिंचाई व्यवस्था के कारण कृषि अर्थव्यवस्था का प्रसार होता रहा था ।
पूर्व मध्य काल –
जहां तक कृषि अर्थव्यवस्था का सवाल है तो वह विकसित अर्थव्यवस्था मे ही रही परंतु व्यापार एवं नगरीकरण के विकास को हम 2 चरणों मे बांटकर देख सकते है –
- प्रथम चरण (750-1000ईस्वी)- इस काल मे व्यापार , मुद्रा अर्थव्यवस्था एवं नगरीकरण पतन की अवस्था मे ही रही थी
- द्वितीय चरण (1000-1200ईस्वी )- इस काल मे व्यापार , मुद्रा अर्थव्यवस्था एवं नगरीकरण का पुनरुत्थान हुआ । इसका एक कारण था पश्चिम एशिया मे एक बड़े अरब साम्राज्य की स्थापना के साथ भारतीय वस्तुओ की मांग मे तेजी से वृद्धि । फिर वहीं समय है जब धीरे – धीरे आंतरिक व्यापार भी पुनर्जीवित होने लगा था इसके परिणामस्वरूप व्यापार , मुद्रा अर्थव्यवस्था एवं नगरीकरण का पुनरुत्थान हुआ। इसे तृतीय नगरीकरण का नाम दिया गया ।
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