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PDS , MSP, FCI, E-Rupee & ONORC- Important For SSC, UPSC & Other State Exams

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Q. अनाज वितरण प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने हेतु सरकार द्वारा कौन-कौनसे सुधारात्मक कदम उठाए गए है?

Q. भारत मे PDS की प्रमुख चुनौतियाँ क्या है ? इसे किस प्रकार प्रभावी तथा पारदर्शी बनाया जा सकता है ?

FCI — Food Corporation of India (भारतीय खाद्य निगम):

प्रारूप
  1. FCI
  2. बफ़र स्टॉक
  3. PDS क्या है ?
  4. उद्देश्य
  5. कार्यप्रणाली
  6. भारत मे PDS का विकास
  7. PDS की चुनौतियाँ
  8. सरकार द्वारा सुधार के लिए उठाए गए कदम
  9. ONORC (एक राष्ट्र , एक राशन कार्ड)
  10. PDS मे DBT
  11. E-Rupee Voucher

स्थापना-1965

इसकी स्थापना FCI अधिनियम, 1964 के तहत किया गया है ।

यह सांविधिक निकाय है ।

मुख्यालय – नई दिल्ली मे

यह केंद्र सरकार का सार्वजनिक उपक्रम है । यह उपभोक्ता मामले खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के अंतर्गत आता है।

FCI का मुख्य कार्य –

  1. यह किसानो से न्यूनतम समर्थन मूल्य मे अनाजों का अधिग्रहण कर उसका भंडारण करता है ।
  2. यह देश भर मे भंडार ग्रहों के निर्माण का कार्य करता है ।
  3. यह देश मे बफ़र स्टॉक का संचालन करता है ।

 

वर्ष 2014 मे FCI की पुन: संरचना के लिए शांता कुमार समिति का गठन किया गया । उन्होने निम्न 3 मुख्य सुझाव दिये

  1. FCI उन राज्यों से MSP पर अनाजों के अधिग्रहण का कार्य स्वयं ना करके यह कार्य उन राज्यों को सोंप दे जहां इससे संबन्धित आधारभूत संरचना मौजूद हो ।
  2. FCI को देश भर मे शीत भंडार गृहों के निर्माण पर ज़ोर देना चाहिए ।
  3. FCI को PDS प्रणाली को सम्पूर्ण रूप से कम्प्यूटरीकृत कर देना चाहिए ।

 

FCI का आर्थिक लागत —

FCI द्वारा अनाजों के अधिग्रहण से लेकर उसके वितरण तक होने वाले सभी खर्चों के योग को कुल योग को FCI का आर्थिक लागत कहा जाता है ।

FCI के आर्थिक लागत मे 3 घटक शामिल होते है –

  1. खरीद मूल्य (Procurement Price)- यह वह मूल्य होता है जिस पर FCI किसानों से अनाज का अधिग्रहण करता है । इसे वसूली कीमत भी कहा जाता है ।
  2. खरीद लागत (Procurement cost)- इसे प्रापण प्रासंगिक प्रभार भी कहा जाता है। इसके अंतर्गत परिवहन लागत, भंडारण लागत , श्रमिक लागत , ढुलाई लागत इत्यादि को शामिल किया जाता है ।
  3. वितरण लागत (Distribution cost ) — इसमे परिवहन , भंडारण और वितरण मे होने वाले नुकसान को शामिल किया जाता है ।

FCI का आर्थिक लागत = खरीद मूल्य + खरीद लागत + वितरण लागत

 

बफ़र स्टॉक-

बफर स्टॉक की अवधारणा चौथी पंचवर्षीय योजना (1969-74) के तहत शुरू हुई। बफर स्टॉक का उद्देश्य किसी आकस्मिक परिस्थिति जैसे युद्ध, अकाल, प्राकृतिक आपदा , महामारी इत्यादि मे लोगों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करना है । वर्तमान मे केवल गेहूं और चावल का बफर स्टॉक किया जाता है । बफर स्टॉक प्रत्येक तिमाही मे आर्थिक मामलों के संसदीय समिति (CCEA – Cabinet Committee on Economic Affair ) द्वारा किया जाता है जबकि इसका संचालन FCI द्वारा होता है ।

FCI किसानों से अनाज का अधिग्रहण कर उसका भंडारण करता है जिसका 2 प्रमुख रूप से प्रयोग होता है -NFSA कार्यक्रम तथा अन्य कल्याणकारी कार्यक्रम जैसे mid day meal , अंतयोदय अन्न योजना इत्यादि । इसके पश्चात अधिशेष का भडारण बफर स्टॉक के रूप मे किया जाता है बफर स्टॉक मे खाद्य रिजर्व 2 प्रकार का होता है –

  1. कार्यशील रिजर्व (Operational reserve)
  2. रणनीतिक रिजर्व (Strategic reserve )

रणनीतिक रिजर्व लगभग 5MMT का होता है जिसमे 2 MMT गेहूं के रूप मे और 3 MMT चावल के रूप मे संग्रहीत होता है । शेष कार्यशील रिजर्व के रूप मे होता है ।

 

बफर स्टॉक का उद्देश्य / लाभ –

  1. यह आकस्मिक परिस्थिति मे लोगों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करता है । जैसे कोरोना महामारी के दौरान देशव्यापी lockdown के समय गरीबों को खाद्य सुरक्षा देने मे बफर स्टॉक की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
  2. बाजार मे अप्रत्यक्ष तरीके से गेहूं और चावल के मूल्य को नियंत्रित करता है ।

बफर स्टॉक की चुनौती –

  1. बफर स्टॉक के संग्रहण के लिए वर्तमान मे FCI के पास पर्याप्त क्षमता वाले भंडार ग्रहों का अभाव है । इस कारण इनके संग्रहण मे समस्या आती है ।
  2. बफर स्टॉक मे रखे अधिकांश अनाज सड़कर खराब हो जाते है ।

 

वर्ष 2015 मे बफर स्टॉक के नियमावली मे परिवर्तन किए गए इस प्रकार बफर स्टॉक नियम 2015 के अनुसार सरकार FCI को अनुमति देती है कि वह OMSS के माध्यम से बाजार मे बफर स्टॉक मे संग्रहीत अनाजों का विक्रय कर सकता है।

OMSS (Open Market Sales scheme-खुला बाजार बिक्री योजना)-

इस स्कीम के तहत FCI ई- नीलामी प्रक्रिया से बफर स्टॉक मे रखे खाद्यान का विक्रय कर सकता है या उसे विदेशों मे निर्यात कर सकता है । यह बिक्री उन क्षेत्रों मे किया जाएगा जहां गेहूं और चावल का उत्पादन कम हो तथा मांग अधिक हो अत: इसके माध्यम से उन क्षेत्रों मे मूल्य को नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है ।

 

PDS (जन वितरण प्रणाली ):

PDS सरकार का लोक कल्याण कारी कार्यक्रम है जहां राशन की दुकानों के माध्यम से राशन कार्ड धारकों को आवश्यक वस्तुएं (खाद्य और गैर-खाद्य) अत्यंत न्यून कीमत या मुफ्त मे उपलब्ध करायी जाती है ।

PDS प्रणाली गरीबों के लिए सुरक्षा जाल का कार्य करती है क्योंकि यह बाजार मे खाद्य वस्तुओं के बढ़ती कीमतों से गरीबों को सुरक्षा देता है ।

PDS के उद्देश्य –

  1. गरीबों को खाद्य सुरक्षा देना
  2. किसानों से अनाज का अधिग्रहण कर उसका भंडारण करना
  3. सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करना
  4. बाजार मे खाद्य वस्तुओं के बढ़ती कीमतों को अप्रत्यक्ष तरीके से नियंत्रित करना

 

PDS प्रणाली संविधान मे समवर्ती सूची का विषय है । इस कारण केंद्र और राज्य दोनों मिलकर इस प्रणाली का संचालन करते है ।

राशन की दुकानों को ही उचित मूल्य की दुकान (FPS – Fair Price Shop) कहा जाता है ।

PDS प्रणाली उपभोक्ता मामले , खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग द्वारा संचालित किया जाता है।

 

PDS की कार्यप्रणाली —

भारत मे PDS प्रणाली की शुरुआत वर्ष 1945 मे द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान किया गया जबकि 1965 मे FCI की स्थापना के पश्चात भारत मे इसे पुन: शुरु किया गया ।

PDS प्रणाली समवर्ती सूची का भाग होने के कारण केंद्र और राज्य दोनों के माध्यम से संचालित होती है यहाँ केंद्र सरकार FCI के माध्यम से वसूली कीमत मे किसानो से अनाज का अधिग्रहण करती है और उसका भंडारण किया जाता है । जबकि राज्य सरकार केंद्र बिन्दु से CIP (केंद्रीय निर्गमित मूल्य ) पर अधिग्रहण करके उसे राशन की दुकानों तक पहुँचती है जहां राशन कार्ड धारकों को सब्सिडी मूल्य पर अनाज वितरित किया जाता है । इसे खाद्य सब्सिडी कहा जाता है । खाद्य सब्सिडी का वहन केंद्र सरकार करती है ।

केंद्र सरकार द्वारा दिये जानी वाली सब्सिडी मे सबसे प्रमुख 3 सब्सिडी होती है जिसे FFF कहा जाता है

  1. F- Food
  2. F- Fertilizer
  3. F- Fuel

इन तीनों सब्सिडी का कुल योग सरकार द्वारा दी गई कुल सब्सिडी का लगभग 85% होता है ।

इस प्रकार PDS प्रणाली मे केंद्र सरकार FCI द्वारा वसूली कीमत , परिवहन और भंडारण लागत तथा राज्य सरकार द्वारा किया गया परिवहन लागत को वहन करती है । जबकि राज्य सरकार लाभार्थी की पहचान, राशन कार्ड का वितरण , राशन की दुकानों मे पर्यवेक्षक की भूमिका और केंद्र बिन्दु से राशन की दुकानों तक खाद्यान पहुंचाने और उसे राशन कार्ड धारकों को वितरित करने का कार्य करती है ।

 

MSP(न्यूनतम समर्थन मूल्य )—

यह वह न्यूनतम कीमत मूल्य होता है जिस पर सरकार FCI के माध्यम से किसानों से अनाज अधिग्रहण करती है । इसकी घोषणा वर्ष मे 2 बार (खरीफ और रबी ) उत्पादन के पूर्व किया जाता है ।

वसूली कीमत — यह वह कीमत होता है जिस पर सरकार किसानों से अनाज का अधिग्रहण करती है । इसकी घोषणा उत्पादन पश्चात की जाती है । यह वसूली कीमत या तो MSP के बराबर होता है या उससे अधिक यह कभी MSP से कम नहीं हो सकता है ।

CIP(Central Issue Price) —

यह वह सब्सिडी युक्त कीमत होता है जिसमे राज्य सरकार FCI से अनाज का अधिग्रहण करती है । इसका निर्धारण केंद्र सरकार करती है । CIP स्थिर मूल्य नहीं होता है समय – समय पर केंद्र सरकार इसे परिवर्तित कर सकती है । यह कीमत कभी भी MSP से अधिक नहीं हो सकता है जैसे चावल गेहूं और मोटा अनाज का CIP क्रमश: प्रति किलो 3 रुपया, 2 रुपया और 1 रुपया ।

आर्थिक लागत मूल्य — FCI अनाजों के अधिग्रहण, भंडारण और वितरण पर जो खर्च करता है उसे FCI का कुल आर्थिक लागत मूल्य कहा जाता है ।

FCI का कुल आर्थिक मूल्य लागत = खरीद मूल्य + खरीद लागत + वितरण लागत

CIP — MSP — वसूली कीमत — आर्थिक लागत

खाद्य सब्सिडी = आर्थिक लागत – CIP

 

PDS प्रणाली की चुनौतियाँ —

PDS प्रणाली की कमजोरियों को उजागर करने के लिए न्यायमूर्ति वाधवा समिति का गठन किया गया । उन्होने PDS प्रणाली मे निम्न चुनौतियों को उजागर किया –

  1. फर्जी राशन कार्ड की समस्या
  2. नए राशन कार्ड बनाने मे चुनौती (स्थायी पता का अभाव)
  3. इस प्रणाली मे वितरित होने वाला अनाज गुणवत्तापूर्ण नहीं होता है ।
  4. यहाँ भ्रष्टाचार संस्थागत रूप ले लिए अर्थात कोटेदार , transporter और व्यापारी तीनों मिलकर भ्रष्टाचार करते है ।
  5. यहाँ रिसाव अत्यधिक है । NSSO के सर्वे रिपोर्ट के आन्सर राशन की दुकानों से वितरित होने वाले लगभग 35% किरोसिन का कालाबाजारी हो जाता है ।
  6. CAG के PDS निष्पादन रिपोर्ट के अनुसार उचित भंडारगृहों के अभाव मे अधिकांश अनाज बर्बाद हो जाता है ।

PDS मे सुधार के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम —

  1. सरकार द्वारा राशन कार्ड को आधार कार्ड से जोड़ा जा रहा है जिससे फर्जी राशन कार्ड की समस्या दूर होगी ।
  2. सरकार द्वारा राशन की दुकानों मे e-pos मशीन (बायोमेट्रिक प्रणाली ) स्थापित की जा रही है जिससे लाभार्थी की सही पहचान की जा सके । वर्तमान मे लगभग 88% राशन की दुकानों मे e-pos स्थापित हो चुके है ।
  3. सरकार ने अनिवार्य किया है कि PDS प्रणाली मे प्रयोग होने वाले परिवहन मे अनिवार्य रूप से GPS का प्रयोग होगा ।
  4. वर्ष 2017 मे FCI द्वारा ऑनलाइन डिपो योजना की शुरुआत की गई यहाँ देश मे स्थित सभी राशन की दुकानों को ऑनलाइन FCI से जोड़ा जा रहा है।
  5. सरकार द्वारा वर्ष 2021 मे पीडीएस प्रणाली को पारदर्शी बनाने के लिए “मेरा राशन एप” की शुरुआत की है ।
  6. सरकार द्वारा वर्ष 2022 से पूरे भारत वर्ष मे एक राष्ट्र , एक राशन कार्ड योजना कार्यक्रम को लागू कर दिया है ।
  7. सुधारात्मक उपाय- सरकार द्वारा वर्ष 2018 मे **PDS – IM(Integrated Management – एकीकृत प्रबंधन)की शुरुआत की गई । इसकी अवधि वर्ष 2019 से लेकर 2022 तक है। इस कार्यक्रम के 3 प्रमुख उद्देश्य है –
    1. राशन कार्ड का डिजिटलीकरण करना – सरकार द्वारा राशन कार्ड धारको के लिए Digilocker की शुरुआत की गई है ।
    2. राशन कार्ड को आधार कार्ड से जोड़ना
    3. राशन की दुकानों को कम्प्यूटरीकृत करना
  8. सरकार जल्द ही PDS मे DBT(Direct Benefit Transfer – प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ) प्रणाली को लागू करना चाहती है , इसे सफलता पूर्वक पायलट परियोजना के रूप मे केंद्र शाषित प्रदेशों जैसे – चंडीगढ़ , पुडुचेरी और दादर नगर हवेली मे चलाया जा रहा है जिसे सरकार सम्पूर्ण भारत मे लागू करना चाहती है ।

 

भारत मे PDS का विकास —

वर्षविकास
1945भारत मे PDS की शुरुआत
1965PDS की पुन: शुरुआत , इसे UPDS (Universal PDS – सार्वभौमिक PDS) कहा जाता था जो लक्षित न होकर सार्वभौमिक अर्थात सभी के लिए होता था ।
1992RPDS (Revamped PDS – नवीकृत PDS) की शुरुआत , जिसका उद्देश्य PDS प्रणाली का विस्तार करना था । इसके अंतर्गत राशन की दुकानों को सुदूर ग्रामीण क्षेत्र, दुर्गम इलाके और मलीन बस्तियों मे लगभग 1775 ब्लॉक मे विस्तारित किया गया ।
19971997 मे TPDS (Targeted PDS ) को शुरू किया गया । इसे UPDS से बदलकर TPDS किया गया अर्थात इसे लक्षित बनाया गया । यहाँ परिवार को 2 भागों मे बांटा गया- APL और BPL । APL परिवार को गेहूं और चावल आर्थिक लागत मूल्य मे वितरित किया जाता था जबकि BPL परिवारों को अनाज आर्थिक लागत के 50% मूल्य पर वितरित किया जाता था ।
2000BPL परिवारों मे वे परिवार जिनकी स्थिति अत्यंत दयनीय थी उनका अंत्योदय परिवार के रूप मे किया गया तथा उनके लिए अंत्योदय अन्न योजना की शुरुआत की गई । जिसके तहत अंत्योदय परिवार को 10 kg अनाज प्रति माह दिया जाता था जिसे बाद मे वर्ष 2002 मे बढ़ाकर प्रति माह 25 kg कर दिया गया ।
2013NFSA कार्यक्रम की शुरुआत की गई जिसके तहत प्राथमिक परिवार को प्रति माह 25KG अनाज तथा BPL और अंत्योदय परिवार को प्रति माह 35KG अनाज चावल , गेहूं और मोटे अनाज के रूप मे प्रति किलो क्रमश 3 रुपया , 2 रुपया और 1 रुपए की दर से दिया गया ।
2020कोरोना महामारी के दौरान PM गरीब कल्याण अन्न योजना की शुरुआत की गई जिसके तहत प्रत्येक व्यक्ति को 5kg अनाज मुफ्त कर दिया गया ।
2023PM गरीब कल्याण अन्न योजना का विलय NFSA कार्यक्रम मे कर दिया गया जहां अब प्राथमिक परिवार को 25 kg अनाज प्रति माह और BPL तथा अंत्योदय परिवार को प्रति माह 35kg अनाज मुफ्त मे वितरित किया जाता है ।

 

एक राष्ट्र , एक राशन कार्ड —

यह सरकार का एक महत्वकांक्षी कार्यक्रम है जो राशन कार्ड की portibility को बढ़ावा देता है । जिसके तहत कोई भी राशन कार्ड धारक देश के किसी भी कोने मे स्थित राशन की दुकान से अपने कोटे का अनाज प्राप्त कर सकता है । एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड को लागू करने के लिए 2 प्रमुख शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है

  1. राशन कार्ड को आधार कार्ड से जोड़ना
  2. राशन की दुकानों मे e-pos मशीन की स्थापना

भारत मे एक राष्ट्र , एक राशन कार्ड को वर्ष 2019 मे सरकार द्वारा 4 राज्यों मे – गुजरात , महाराष्ट्र , आंध्रप्रदेश और तेलंगाना मे पायलट परियोजना के रूप मे चलाया गया । इसके बाद वर्ष 2020 मे इसे देश मे लागू किया गया । सबसे पहले चंडीगढ़ मे इसे लागू किया गया जबकि सबसे पहला राज्य गुजरात है । वर्ष 2022 मे इसे सम्पूर्ण भारत (36 राज्य और केंद्र शासित प्र्देशों मे) लागू किया गया। सबसे अंतिम राज्य असोम (असम) है ।

एक राष्ट्र , एक राशन कार्ड के अंतर्गत लाभार्थी —

इसमे वे सभी लाभार्थी शामिल होंगे जो NFSA कार्यक्रम मे शामिल है (लगभग 81 करोड़ ) इसका उद्देश्य यह लाभार्थी वर्ग को अंतर्राज्य और अंतराराज्य के प्रवसन मे उन्हे कोटे का अनाज उपलब्ध कराकर खाद्य सुरक्षा प्रदान करता है । 

ई-रूपी वाउचर (E-Rupee Voucher)—

  • इसे NPCI (National Payment Corporation of India – भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम ) द्वारा संचालित किया जाता है ।
  • इसे सरकार और निजी कंपनी दोनों जारी कर सकते है ।
  • यह व्यक्ति आधारित और उद्देश्य आधारित होता है ।

 ई – रूपी वाउचर की कार्यप्रणाली —

ई-रूपी वाउचर के लाभ —

  • भ्रष्टाचार कम करेगा
  • सरकार/निजी कंपनी द्वारा दी गई सहायता/लाभ के दुरुपयोग को कम करेगा और पारदर्शिता को बढ़ाएगा ।
  • national payment corporation of India (भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम)
  • स्थापना – 2008 मे
  • यह एक गैर-लाभकारी संस्था है ।
  • उद्देश्य— देश मे वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) को बढ़ावा देना

वित्तीय समावेशन का सामान्य अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति का बैंक मे खाता उपलब्ध हो ।

IMPS {NPCI द्वारा संचालित}- Immediate Money Payment Service

UPI – Unified Payment Interface

BHIM- Bhart Interface for money

QR Code- Quick Response Code

NEFT {RBI और बैंक द्वारा संचालित}- National Electronic Fund Transfer

RTGS- Real Time Gross Settlement

 

NPCI के मुख्य कार्य –

  • वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देना
  • Rupay dabit card का निर्माण और संचालन करना
  • BHIM app, IMPS, UPI, QR code और FASTTAG का निर्माण और संचालन करना
  • ई-रूपी वाउचर का संचालन करना
  • देश मे स्थापित सभी ATM को आपस मे जोड़ना इत्यादि ।

 

PDS मे DBT प्रणाली –

DBT {Direct Benefit Transfer – प्र्त्यक्ष लाभ अंतरण }—

देश मे DBT की शुरुआत 1 जनवरी 2013 मे हुई । यह एक तकनीक आधारित कार्यक्रम है जो JAM {J- जनधन , A- आधार और M- मोबाइल} तकनीक पर आधारित होता है । इस प्रणाली मे सबसे प्रमुख शर्त लाभार्थी का बैंक खाता होना अनिवार्य है । बैंक खाता अनिवार्य रूप से आधार कार्ड और मोबाइल नंबर से जुड़ा हो ।

DBT प्रणाली के माध्यम से सरकार सही लाभार्थी को बैंक के माध्यम से नकद सब्सिडी का प्र्त्यक्ष अंतरण कर सकती है जैसे PM किसान योजना , मनरेगा इत्यादि । वर्तमान मे केंद्र सरकार की अधिकांश योजनाएँ DBT प्रणाली पर आधारित है ।

DBT के 3 मुख्य उद्देश्य है –

  • मध्यस्थों या बीचोलियों की भूमिका को समाप्त करना ।
  • लाभार्थी को प्रत्यक्ष रूप से नकद अंतरण का लाभ देना ।
  • अविलंब अंतरण को सुनिश्चित करना ।

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