1) One China Policy बनाम One Country, Two Systems (ताइवान संदर्भ)
हालिया समय में चीन–ताइवान के बीच बढ़े राजनीतिक तनाव के संदर्भ में One China Policy और One Country, Two Systems के सैद्धांतिक पक्ष को स्पष्ट कीजिए।
One China Policy — मूल विचार
- 1949 में साम्यवादी चीन की स्थापना के बाद माओ के नेतृत्व में चीन ने “One China Policy” को अपनी संप्रभुता की आधार-रेखा बनाया।
- इसके अंतर्गत चीन ऐतिहासिक रूप से विवादित/विशिष्ट रहे क्षेत्रों (विशेषकर ताइवान, तिब्बत, हांगकांग, मकाउ) को “एक चीन” की संप्रभु सीमा में मानता है।
- नीति का कठोर पक्ष: जो देश “One China” सिद्धांत नहीं मानता, उससे चीन औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं रखता।
विरोधाभास/दुविधा
इन क्षेत्रों में राजनीतिक/आर्थिक/सांस्कृतिक व्यवस्थाएं मुख्यभूमि चीन से भिन्न दिखती हैं, जैसे:
- ताइवान/हांगकांग में लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं
- तिब्बत में धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान/स्वायत्तता की मांगें
One Country, Two Systems — प्रस्ताव
- उद्देश्य: संप्रभुता “एक” रखते हुए, कुछ क्षेत्रों को विशेष प्रशासनिक/आर्थिक/कानूनी व्यवस्थाएं देना।
- तात्पर्य: चीन संप्रभु शक्ति के अंतर्गत ही “विशिष्ट अधिकार” देता है; इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि वे क्षेत्र चीनी संप्रभुता से बाहर हैं।
2) “Peaceful Rise / Peaceful Development” और चीन की विदेश नीति
चीन अपने संघर्षपूर्ण, रक्त-रंजित इतिहास को केंद्र में रखकर भविष्य के संदर्भ में “शांतिपूर्ण उदय” के सिद्धांत को प्रस्तावित करता है।
चीन की पारंपरिक रणनीतिक सोच को अक्सर “Hide your strength, bide your time” के रूप में उद्धृत किया जाता है। इस दृष्टि से विदेश नीति के प्रमुख सूत्र:
- पड़ोसियों के साथ यथासंभव अच्छे संबंध बनाए रखना
- Tier-2 देशों (मध्य/उभरती शक्तियां) के साथ संबंध मजबूत करना
- जापान से जुड़े ऐतिहासिक नकारात्मक मुद्दों पर यथासंभव “उपेक्षा/कम टकराव”
- अमेरिका की बढ़ती/स्थापित प्रभुता को सीधे चुनौती न देना
लंबे समय तक इस “कम-प्रोफ़ाइल” (low profile) नीति के बाद, शक्ति/आत्मविश्वास बढ़ने पर चीन में अधिक सक्रिय (assertive) रुझान उभरते दिखते हैं।
3) समकालीन चीन का आक्रामक व्यवहार और “4 in 1” विदेश नीति
समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चीन का बेहद आक्रामक व्यवहार उसकी “4 in 1” विदेश नीति के मूल संदर्भ से जुड़ता है—इस कथन की विवेचना कीजिए।
21वीं शताब्दी के भू-राजनीतिक परिवर्तनों के अनुरूप निम्न तत्व प्रमुख दिखते हैं:
- पड़ोस एवं सीमाई हितों की हर हाल में सुरक्षा
- दक्षिण चीन सागर में ASEAN देशों के साथ तनाव
- डोकलाम/गलवान सहित भारत के साथ सीमा-संघर्ष
- उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ आर्थिक ब्लॉक/प्रभाव बढ़ाना
- BRICS के संदर्भ में New Development Bank जैसी पहल
- विकासशील देशों के नेतृत्वकर्ता की भूमिका
- अमेरिका की एकध्रुवीयता को चुनौती देकर शक्ति-संतुलन (बायपोलर/मल्टीपोलर) की ओर प्रयास
- क्षेत्रीय/प्रभुत्वशाली साझेदारों को जोड़ना
- रूस, तुर्की, ईरान, पाकिस्तान आदि के साथ रणनीतिक निकटता
- कुछ विश्लेषकों के अनुसार इसे “Cold War 2.0” की दिशा में कदम भी माना जाता है
4) चीन की राजनीतिक व्यवस्था: गणतंत्र बनाम लोकतंत्र (संकेत)
हालिया समय में चीन में हुए राजनीतिक सत्ता-परीक्षण के संदर्भ में उसकी राजनीतिक व्यवस्था को स्पष्ट करते हुए गणतंत्र बनाम लोकतंत्र की चर्चा कीजिए।

5) भारत–चीन सीमा विवाद: “पैकेज डील” बनाम “म्युचुअल अंडरस्टैंडिंग”
भारत–चीन सीमा विवादों का प्रारंभ सैद्धांतिक स्तर पर पंचशील के समानांतर 1954 में दिखता है, जब चीन ने Mutual accommodation (पैकेज डील) का प्रस्ताव रखा:
- चीन की अपेक्षा: भारत अक्साई चीन पर चीन का नियंत्रण मान ले
- बदले में: चीन अरुणाचल प्रदेश को भारतीय संप्रभुता का हिस्सा मान ले
भारत का तर्क: पहले कूटनीतिक वार्ता से समझ विकसित हो, फिर “अदला-बदली/समाधान” पर निर्णय हो।
1962 के युद्ध में चीन ने बल-प्रयोग द्वारा अक्साई चीन पर नियंत्रण स्थापित किया—इसे इस सैद्धांतिक टकराव से जोड़ा जाता है।

6) मैकमोहन रेखा विवाद: भूमिका और तर्क
मैकमोहन रेखा विवाद की भारत–चीन सीमा विवादों के संदर्भ में भूमिका का परीक्षण करें।
- ब्रिटिश नीति (Buffer/कूटनीतिक लाभ) के संदर्भ में 1913–14 का शिमला सम्मेलन (त्रिपक्षीय):
- स्वतंत्र तिब्बत
- राष्ट्रवादी चीन
- ब्रिटिश भारत
- सहमति से ब्रिटिश भारत–तिब्बत के बीच मैकमोहन रेखा निर्धारित हुई।
- स्वतंत्रता के बाद भारत इसे NE सीमा में स्वीकार करता है, पर चीन दो प्रमुख आधारों पर अस्वीकार करता है:
- इसे मानने पर “पैकेज डील” का आधार कमजोर होता है (अरुणाचल को भारतीय संप्रभु हिस्सा मानना पड़ता)
- सीमा निर्धारण में तिब्बत स्वतंत्र पक्ष के रूप में शामिल था—चीन इसे स्वीकार नहीं करना चाहता
तवांग विवाद (संकेत)
- अरुणाचल का महत्वपूर्ण जिला; चीन तवांग/अरुणाचल को तिब्बत से जोड़कर दावा करता है।
- भारत का तर्क: धार्मिक/ऐतिहासिक संबद्धता के आधार पर आधुनिक संप्रभुता तय करना तर्कसंगत नहीं।
7) LAC, CBMs, SRs और 2005 Guiding Principles (संक्षेप)
- 1962 के बाद सैन्य नियंत्रण अलग करने हेतु LAC (Line of Actual Control) की अवधारणा।
- 1993–2013 के बीच CBMs (Confidence Building Measures) में प्रमुख बातें:
- सीमा के दोनों ओर सैन्य संकेन्द्रण सीमित रखना
- आधारभूत संरचना में बड़े एकतरफा बदलाव से बचना
- सैन्य स्थिति की सूचना/पारदर्शिता
- सैन्य अधिकारियों के संवाद, हॉटलाइन आदि
दो महत्वपूर्ण फैसले:
- 2003: NSA स्तर पर Special Representatives (SRs) नियुक्त
- 2005: Political Guiding Principles — सीमा सहित विवादों को पीछे रखकर सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक सहयोग को प्राथमिकता
गलवान संकट ने इन प्रयासों को प्रभावित किया—भविष्य की वार्ताओं में CBMs पर चीन की स्थिति महत्वपूर्ण होगी।
8) तिब्बत समस्या और भारत की तिब्बत नीति
तिब्बत समस्या के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए भारत की तिब्बत नीति की भी विवेचना कीजिए।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (संक्षेप)
- 18वीं शताब्दी तक तिब्बत स्वतंत्र; 1912–49 के दौरान भी अलग पहचान/स्वायत्तता के चरण।
- साम्यवादी चीन के बाद नियंत्रण सख्त हुआ।
- 1951 में दलाई लामा के नेतृत्व में समझौते की दिशा (स्वायत्तता के आश्वासन)
- 1959 में आंदोलन और दमन; दलाई लामा का भारत में शरण
- 1965 में प्रशासनिक पुनर्गठन ने पहचान/आंदोलन को कमजोर किया (क्षेत्रीय विभाजन)
वर्तमान मुद्दे
- “Greater Tibet”/1965 पूर्व स्वरूप की बहाली की मांग
- जनसंख्या स्थानांतरण/डेमोग्राफिक परिवर्तन की नीति पर आपत्ति
- सैन्य संकेन्द्रण में कमी
- विकास से उत्पन्न पारिस्थितिक संकट/क्षतिपूर्ति
- धार्मिक-सांस्कृतिक के साथ स्थानीय राजनीतिक स्वायत्तता
भारत की नीति (संकेत)
- भारत One China के अनुरूप तिब्बत पर चीन की संप्रभुता को औपचारिक रूप से मानता है, पर शांतिपूर्ण समुदाय के रूप में तिब्बतियों की सांस्कृतिक-धार्मिक पहचान/मानवीय मुद्दों पर संवेदनशील रुख रखता है।
9) चीन के साथ Trade Deficit (व्यापार घाटा)
Trade deficit with China
चीन के साथ व्यापार घाटे की चुनौती के मूल कारणों और भारत की रणनीति को स्पष्ट करें।
- भारत में दीर्घकालिक व्यापार घाटे का एक कारण: द्वितीयक क्षेत्र की तुलनात्मक कमजोरी, ऊर्जा/कच्चे माल/इनपुट्स पर निर्भरता, और निर्यात-योग्य उत्पादों के लिए भी कुछ आयातित इनपुट्स।
- चीन से भारत का घाटा अत्यधिक (≈ 100+ बिलियन USD/वर्ष) होना नीतिगत चिंता है।
चीन का आयात-पैटर्न (भारत से):
- प्राथमिक वस्तुएं प्रमुख (उदा. लौह अयस्क, कपास आदि)
भारत की अपेक्षा/रणनीति:
- व्यापार का विविधीकरण
- फार्मास्यूटिकल्स और IT सेवाओं में बाजार-पहुंच
- घरेलू विनिर्माण क्षमता (PLI/आत्मनिर्भरता)
- संवेदनशील निवेश/डिजिटल/कॉमर्स पर नियमन, anti-dumping कदम, “country of origin” जैसे उपाय
गलवान के बाद रिश्तों में तनाव के बावजूद व्यापार घाटा क्यों बढ़ा—इस विरोधाभास के कारण स्पष्ट करें।
- राजनीतिक तनाव के बावजूद सप्लाई-चेन/इनपुट निर्भरता बनी रही:
- मोबाइल/इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स
- दवाओं के APIs
- EV बैटरी/लिथियम-आधारित उपकरण
- आत्मनिर्भरता की प्रक्रिया में “ट्रांज़िशन पीरियड” में आयात निर्भरता अस्थायी रूप से बढ़ सकती है।
10) Stapled Visa Controversy (नत्थी वीज़ा विवाद)
Stapled visa controversy (नत्थी वीज़ा विवाद)
- चीन अरुणाचल प्रदेश पर दावे को “विवादित” दिखाने हेतु कुछ मामलों में वीज़ा पासपोर्ट पर न लगाकर अलग कागज पर देता है और उसे पासपोर्ट से नत्थी करता है।
- भारत इसे संप्रभुता-सम्बन्धी मुद्दा मानकर विरोध करता है और इसे समाप्त करने पर जोर देता है।
11) जिनजियांग (Xinjiang) समस्या: स्वरूप और रणनीतिक महत्व
जिनजियांग समस्या
जिनजियांग संकट को स्पष्ट करते हुए चीन के लिए इसके रणनीतिक महत्व की चर्चा कीजिए।
- ऊईगर मुस्लिम समुदाय और साम्यवादी सरकार के बीच संघर्ष का ऐतिहासिक-राजनीतिक आधार।
- जनसंख्या स्थानांतरण (Han migration) से सांस्कृतिक पहचान/टकराव बढ़ा।
- अलगाववादी/आतंकवादी संगठनों (ETR/ETIM संदर्भ) की गतिविधियों का उल्लेख मिलता है।
- BRI के कई महत्वपूर्ण कॉरिडोर/लिंक जिनजियांग से जुड़े हैं—इसलिए स्थिरता चीन के लिए केंद्रीय है।
12) भारत–चीन: नदी जल संभावित विवाद (ब्रह्मपुत्र/सियांग)
भारत–चीन के बीच नदी जल के संदर्भ में उत्पन्न होने वाले संभावित विवादों की समीक्षा करें।
- तिब्बत को “तीसरा ध्रुव” कहा जाता है; कई नदियां दक्षिण/दक्षिण-पूर्व एशिया को जल देती हैं।
- ब्रह्मपुत्र (सियांग) पर भारत की प्रमुख चिंताएं:
- बांधों का स्वरूप/मानक (चीन का दावा: run-of-the-river)
- जल को उत्तर दिशा में मोड़ने की संभावनाएं (तकनीकी/पारिस्थितिक/राजनीतिक कारणों से कठिन)
- जल-गुणवत्ता/प्रदूषण/छेड़छाड़ की आशंकाएं (कुछ घटनाओं का संदर्भ)
नीतिगत संकेत:
- निगरानी (space/ground), कूटनीतिक वार्ता, और क्षेत्रीय सहयोग से दबाव/पारदर्शिता बढ़ाना।
13) String of Pearls बनाम Necklace of Diamonds
चीन की String of Pearls रणनीति और इसके प्रति-संतुलन में भारत की Necklace of Diamonds रणनीति का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
- “String of Pearls”: बंदरगाह/आधारभूत संरचना के माध्यम से प्रभाव (ग्वादर, हम्बनटोटा, चिट्टगोंग, सितवे आदि)
- “Necklace of Diamonds”: भारत की एक्ट ईस्ट, इंडो-पैसिफिक दृष्टि, QUAD, और क्षेत्रीय साझेदारियाँ (जापान, ASEAN, सिंगापुर/इंडोनेशिया/वियतनाम, पश्चिमी हिंद महासागर के देश आदि)
14) BRI / Yi Dai Yi Lu (बेल्ट एंड रोड)
Yi Dai Yi Lu (बेल्ट तथा रोड की रणनीति)
चीन की बेल्ट एंड रोड रणनीति के पक्षों को स्पष्ट करते हुए भारत की प्रतिक्रिया बताइए।
- BRI: विशाल कनेक्टिविटी/इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजना; कई “इकोनॉमिक कॉरिडोर”
- भारत की प्रमुख आपत्तियाँ:
- CPEC का विवादित क्षेत्र (PoK) से गुजरना
- पारदर्शिता/ऋण-जोखिम/स्थानीय राजनीतिक अस्थिरता
- अंतरराष्ट्रीय नियमों/मानकों पर चीन के चयनात्मक अनुपालन की आलोचना
15) भारत–चीन कूटनीतिक संबंध: वर्तमान स्थिति (चित्र)







