Syllabus Update
अभ्यर्थियों के लिए खुशखबरी! Rajasthan Geography (राजस्थान का भूगोल) का नवीनतम एवं विस्तृत Syllabus (पाठ्यक्रम) अब हमारी वेबसाइट पर पूरी तरह उपलब्ध करा दिया गया है। नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करें और अभी पढ़ना शुरू करें।
Click Here to Readराजस्थान की कृषि
– राजस्थान की अर्थव्यवस्था प्रमुखत: कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है।
– राजस्थान में लगभग 75 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्र में निवास करती है।
– यहाँ कुल कामगारों में 62 प्रतिशत कामगार जीवनयापन के लिए कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्र पर निर्भर है।
राजस्थान की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान
1. राजस्थान देश में सरसों, चना एवं बाजरा के उत्पादन में प्रथम स्थान रखता है।
2. वर्ष 2021-22 में प्रचलित मूल्यों पर सकल राज्य मूल्यवर्द्धन में कृषि क्षेत्र का योगदान 30.23 प्रतिशत है।
3. प्रारम्भिक पूर्वानुमान के अनुसार राज्य में वर्ष 2021-22 में खाद्यान्न का कुल उत्पादन 225.20 लाख मैट्रिक टन होने की संभावना है जो कि गत वर्ष के 269.09 लाख मैट्रिक टन की तुलना में 16.31 प्रतिशत कम है।
4. राज्य में कृषि क्षेत्र सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता है। कृषि क्षेत्र के द्वारा राज्य की लगभग 58 प्रतिशत जनसंख्या को रोजगार प्रदान किया जाता है।
5. भू-उपयोग सांख्यिकी 2019-20 के अनुसार राज्य में 52.58 प्रतिशत शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल है। 10.04 प्रतिशत क्षेत्र बंजर भूमि है। वहीं, लगभग 8.08 प्रतिशत क्षेत्र वानिकी के अंतर्गत है।
भू-उपयोग सांख्यिकी, 2019-20
भू-उपयोग | क्षेत्रफल (लाख हैक्टेयर) | प्रतिशत (क्षेत्रफल) |
शुद्ध बोये गए क्षेत्रफल | 180.32 | 52.58 |
बंजर भूमि | 37.17 | 10.84 |
वानिकी | 27.70 | 8.08 |
ऊसर तथा कृषि अयोग्य भूमि | 23.72 | 6.92 |
अन्य चालू पड़त भूमि | 21.42 | 6.25 |
कृषि के अतिरिक्त अन्य उपयोग भूमि | 20.07 | 5.85 |
स्थायी चारागाह तथा अन्य गोचर भूमि | 16.67 | 4.86 |
चालू पड़त | 15.55 | 4.54 |
वृक्षों के झुण्ड तथा बाग | 0.29 | 0.08 |
कुल | 342.90 | 100 |
राजस्थान में कृषि की प्रमुख विशेषताएँ :
1 राज्य में कृषि मानसून पर आधारित है अत: मानसून की सक्रियता और निष्क्रियता का कृषि पर प्रभाव पड़ता है।
2. राजस्थान में उगाई जाने वाली रबी की फसलों में गेहूँ, सरसों, जौ, चना, तारामीरा इत्यादि हैं तथा खरीफ की फसलों में बाजरा, ज्वार, ग्वार, मूँग, उड़द, सोयाबीन, मूँगफली इत्यादि प्रमुख हैं। जायद की फसलों में खीरा, तरबूज, ककड़ी, खरबूजा व हरी सब्जियाँ इत्यादि।
3. राज्य में लगभग 52 प्रतिशत भाग पर कृषि की जाती है। जिसमें से मात्र 30 प्रतिशत भाग ही सिंचित क्षेत्र है।
4. भारत के कुल कृषिगत क्षेत्रफल का लगभग 11 प्रतिशत भाग राजस्थान में हैं लेकिन सतही जल की उपलब्धता देश की मात्र 1.16 प्रतिशत ही है।
5. राज्य में भू-जल की स्थिति भी बहुत विषम है। साथ ही इसमें पिछले दो दशकों में तेजी से गिरावट आई है। राज्य के 249 खंडों में से अधिकांश डार्क जोन में हैं तथा केवल 40 खंड ही सुरक्षित श्रेणी में हैं। यद्यपि पिछले वर्षों में मुख्यमंत्री स्वावलंबन अभियान के कारण इसमें कुछ सुधार देखा गया है।
6. राजस्थान में कृषि प्राथमिक रूप से वर्षा पर निर्भर है एवं सिंचाई की सुविधाओं में कमी के कारण प्रति हैक्टेयर उत्पादकता काफी कम रहती है।
7. राज्य में सिंचाई के प्रमुख स्रोत कुएँ, नलकूप, नहर और तालाब हैं, जिसमें सर्वाधिक प्रतिशत क्षेत्र कुओं व नलकूपों का है।
8. राज्य में प्रतिव्यक्ति स्रोत के आकार में निरंतर गिरावट आई है।
राज्य की प्रमु ख कृषि फसलें :
रीले क्रोपिंग
– एक ही वर्ष में एक ही खेत में चार फसल उगाना।
– फसलों के आधार पर कृषि:- यह कृषि का प्रकार बुवाई व फसलों के आधार पर है। प्रमुख रूप से इसे हम तीन भागों में बाँट सकते हैं–
1. खरीफ फसलें – खरीफ के मौसम को राजस्थान में चौमासा एवं स्यालु कहा जाता है।
– राज्य में ये फसलें जून-जुलाई में बोई जाती हैं तथा सितम्बर, अक्टूबर में काटी जाती है। मुख्य खरीफ फसलें – ज्वार, बाजरा, चावल, मक्का, मूँग, उड़द, अरहर, मोठ, मूँगफली, अरण्डी, तिल, सोयाबीन, कपास, गन्ना, ग्वार आदि।
– राज्य में खरीफ की 90 फसलें बारानी क्षेत्र पर बोई जाती हैं, जो पूर्णत: वर्षा पर निर्भर होती है।
– खाद्यान्नों में बाजरे का कृषित: क्षेत्रफल सर्वाधिक है।
2. रबी फसलें – इन्हें उनालु कहा जाता है।
– ये फसलें अक्टूबर-नवम्बर में बो कर मार्च-अप्रैल में काट ली जाती है।
– मुख्य रबी फसलें – गेहूँ, जौ, चना, मटर, सरसों, अलसी, तारामीरा, सूरजमुखी, धनिया, जीरा, मैथी आदि हैं।
3. जायद फसलें – इन फसलों को मार्च–अप्रैल से मध्य जून तक उगाया जाता हैं।
– राज्य में जायद फसलों की कृषि जल की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में की जाती हैं।
– मुख्य जायद फसलें – तरबूज, खरबूजा, ककड़ी, सब्जियाँ इत्यादि।
कृषि के अन्य प्रकार :
1. जीवन निर्वाह कृषि:-
– यह कृषि परंपरागत तरीके से की जाती है। इसका उद्देश्य मात्र उदर–पूर्ति करना होता है।
2. यांत्रिक कृषि:–
– यह कृषि विस्तृत क्षेत्र में होती है तथा इसमें यंत्रों का उपयोग सर्वाधिक होता है।
– राजस्थान का सबसे बड़ा यांत्रिक कृषि फार्म सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर) में 15 अगस्त, 1956 को रूस की सहायता से स्थापित किया गया था।
– राज्य का दूसरा यांत्रिक कृषि फार्म जैतसर (श्रीगंगानगर) में स्थापित किया गया।
3. व्यापारिक कृषि:–
– इसका प्रमुख उद्देश्य नकदी कमाना होता है। इसकी प्रमुख फसलें गन्ना, कपास एवं तंबाकू हैं।
4. मिश्रित कृषि:–
– कृषि एवं पशुपालन कार्य को एक साथ करना मिश्रित कृषि कहलाती है।
5. समोच्च कृषि:-
– पहाड़ी क्षेत्रों में समस्त कृषि कार्य और फसलों की बुवाई ढाल के विपरीत करना ताकि वर्षा से होने वाली मृदा क्षरण को न्यूनतम किया जा सके।
6. स्थानांतरण कृषि:-
– इसे झूमिंग कृषि भी कहते हैं। यह कृषि सर्वाधिक आदिवासी या जनजातीय लोग करते हैं।
– राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों (डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, उदयपुर, बाराँ आदि) में यह कृषि की जाती है।
– राजस्थान में भूमि के कटाव की अधिकता के कारण कई क्षेत्रों में स्थानांतरित कृषि की जाती है, उसे वालरा कहते हैं।
– आदिवासी जनजातियों (भील, डामोर) द्वारा वनों को जलाकर की जाने वाली कृषि दजिया कहलाती है।
– दक्षिण–पूर्वी राजस्थान में इस कृषि को दीपा या बात्रा नाम से जाना जाता है।
– यह कृषि राज्य के दक्षिण–पूर्वी पठारी क्षेत्र में सर्वाधिक होती है।
– यह कृषि जंगलों को साफ करके की जाती है। यहाँ पर 3-4 फसलों के बाद नए स्थान की तलाश शुरू कर दी जाती है।
6. बारानी कृषि:-
– यह ऐसी कृषि पद्धति है जो पूर्णत: वर्षा जल द्वारा की गई सिंचाई पर निर्भर होती है।
– इसमें सिंचाई हेतु किसी भी कृत्रिम साधन का प्रयोग नहीं किया जाता है।
– इसमें बोई जाने वाली फसलें ज्वार, बाजरा, मक्का, तिलहन, कपास आदि पूर्णत: वर्षा जल पर ही निर्भर रहती है।
7. रोपण कृषि:-
– एक विशेष प्रकार की खेती जिसमें रबड़, चाय, कहवा आदि बड़े पैमाने पर उगाए जाते हैं।
बागवानी फसलों के प्रमुख उत्पादक जिले:-
क्र.सं. | फसल | प्रमुख उत्पादक जिले |
1. | आम | बाँसवाड़ा, दौसा, चित्तौड़गढ़ |
2. | संतरा | झालावाड़, भीलवाड़ा, कोटा |
3. | अमरूद | सवाई माधोपुर, बूँदी, बाराँ |
4. | आँवला | जयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा |
5. | केला | चित्तौड़गढ़, उदयपुर, बाँसवाड़ा |
6. | करोंदा | अजमेर, जैसलमेर, जोधपुर |
7. | किन्नू | श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, धौलपुर |
8. | नींबू | पाली, दौसा, बूँदी |
9. | पपीता | सिरोही, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा |
10. | अंगूर | सिरोही |
11. | अनार | बाड़मेर, जालोर, जोधपुर |
12. | खजूर | जैसलमेर, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर |
13. | बेर | जयपुर, बाड़मेर, हनुमानगढ़ |
14. | मौसमी | श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर |
15. | सीताफल | राजसमंद, चित्तौड़गढ़, उदयपुर |
16. | शहतूत | जयपुर, दौसा |
17. | मेहंदी | भीलवाड़ा, पाली, जोधपुर |
18. | चीकू | सिरोही, चित्तौड़गढ़, बाड़मेर |
19. | फालसा | धौलपुर, अजमेर |
मसालें
फसलें | प्रमख उत्पादक जिलों के नाम |
1. अजवाइन | चित्तौड़गढ़, राजसमंद, भीलवाड़ा |
2. मिर्च | सवाई माधोपुर, भीलवाड़ा, जालोर |
3. धनिया | नागौर, बाराँ, झालावाड़ |
4. जीरा | बाड़मेर, जोधपुर, जालोर |
5. सौंफ | सिरोही, नागौर, जोधपुर |
6. मैथी | बीकानेर, जोधपुर, सीकर |
7. लहसून | बाराँ, कोटा, झालावाड़ |
8. अदरक | डूँगरपुर, उदयपुर, प्रतापगढ़ |
9. हल्दी | बूँदी, उदयपुर, भीलवाड़ा |
कृषि जलवायु प्रदेश
1. शुष्क पश्चिमी मैदान क्षेत्र (I-A)
– इस कृषि जलवायु प्रदेश में पश्चिमी राजस्थान के जोधपुर व बाड़मेर जिले आते हैं।
– इस क्षेत्र में औसत वर्षा 200 से 370 मिमी. होती है।
– यहाँ तापमान ज्यादा से ज्यादा 40° व न्यूनतम 8° रहता है।
– इस भू-भाग में मरुस्थलीय एवं बालुका स्तूप प्रकार की मिट्टी पाई जाती है।
– प्रमुख फसलें – 1. खरीफ – बाजरा, मोठ, तिल 2. रबी-गेहूँ, सरसों एवं जीरा।
– इसका कृषि अनुसंधान केन्द्र मण्डोर (जोधपुर) में है।
2. सिंचित उत्तरी-पश्चिमी मैदान (I-B)
– इस कृषि जलवायु प्रदेश में उत्तरी-पश्चिमी राजस्थान के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले आते हैं।
– इस क्षेत्र में औसत वर्षा 100 से 350 मि.मी. होती है।
– यहाँ तापमान ज्यादा से ज्यादा 42° व न्यूनतम 4.7° रहता है।
– यहाँ पर जलोढ़ एवं लवणीयता से युक्त मिट्टी मिलती है।
– प्रमुख फसले 1. रबी – गेहूँ, सरसों, चना 2. खरीफ – कपास एवं ग्वार
– इसका कृषि अनुसंधान केन्द्र, श्रीगंगानगर में है।
– इस कृषि जलवायु प्रदेश के कुछ भागों में सेम (जल प्लावन) समस्या होती है।
3. अति शुष्क एवं आंशिक सिंचित प्रदेश (I-C)
– जैसलमेर, बीकानेर एवं चूरू जिले इस कृषि जलवायु प्रदेश के क्षेत्र में आते हैं।
– यह राजस्थान का सबसे बड़ा कृषि जलवायु प्रदेश है।
– इस क्षेत्र में वर्षा 100 से 350 मि.मी. होती है।
– इस क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा तापमान 48° व कम से कम 3° रहता है।
– इस भू-भाग में मरुस्थलीय मृदा पाई जाती है।
– प्रमुख फसलें – 1. खरीफ – बाजरा, मोठ एवं ग्वार 2. रबी-गेहूँ, सरसों, चना।
– इस कृषि जलवायु प्रदेश का कृषि अनुसंधान केन्द्र बीछवाल (बीकानेर) में है।
4. आंतरिक जल निकासी शुष्क प्रदेश (II-A)
– इस जलवायु प्रदेश में नागौर, सीकर, झुंझुनूँ व चूरू का भाग आता हैं।
– इस भू-भाग में 300 से 500 मि.मी. वर्षा होती है।
– यहाँ पर कम से कम 5.3° व ज्यादा से ज्यादा 39.7° तापमान रहता है।
– इस क्षेत्र में रेतीली चूना युक्त एवं उथली लाल मृदा पाई जाती है।
– प्रमुख फसलें – 1. रबी – सरसों एवं चना 2. खरीफ – बाजरा, ग्वार एवं दलहन।
– इसका कृषि अनुसंधान केन्द्र फतेहपुर (सीकर) में है।
5. लूणी बेसिन का सक्रांति मैदान (II-B)
– इस कृषि जलवायु प्रदेश में पाली, जालोर, सिरोही व जोधपुर का भाग आता हैं।
– इस क्षेत्र में वर्षा 300 से 500 मि.मी. होती है।
– यहाँ कम से कम 4.9° व ज्यादा से ज्यादा 38° तापमान रहता है।
– इस भू-भाग में लाल मरुस्थलीय मृदा, चिरोजम मृदा पाई जाती है।
– प्रमुख फसलें – 1. खरीफ–बाजरा, ग्वार एवं तिल 2. रबी – गेहूँ, सरसों
– इसका कृषि अनुसंधान केन्द्र, केशवाना (जालोर) में है।
6. अर्द्धशुष्क पूर्वी मैदान (III-A)
– इस क्षेत्र में जयपुर, अजमेर, टोंक व दौसा जिले आते हैं।
– यहाँ पर वर्षा 500 से 700 मि.मी. होती है।
– यहाँ पर कम से कम 8.3° व ज्यादा से ज्यादा 40.6° तापमान रहता है।
– इस क्षेत्र के पूर्वी भाग में चिरोजम तथा पश्चिमी उत्तरी भाग में चूना मृदा पाई जाती है।
– प्रमुख फसलें – 1. खरीफ – बाजरा, ग्वार एवं ज्वार 2. रबी – गेहूँ, सरसों, चना।
– इसका कृषि अनुसंधान केन्द्र, दुर्गापुरा (जयपुर) में है।
7. बाढ़ प्रभावित पूर्वी मैदान (III-B)
– अलवर, धौलपुर, भरतपुर, करौली व सवाई माधोपुर जिले इस क्षेत्र में आते हैं।
– इस क्षेत्र में 500 से 700 मि.मी. वर्षा होती है।
– यहाँ का तापमान ज्यादा से ज्यादा 40° व कम से कम 8.2° रहता है।
– इस भू-भाग में जलोढ़ मृदा पाई जाती है।
– प्रमुख फसलें – 1. खरीफ – बाजरा, ग्वार एवं मूँगफली 2. रबी – गेहूँ, जौ, सरसों, चना।
– इसका कृषि अनुसंधान केन्द्र, नवगाँव (अलवर) में है।
8. उप-आर्द्र दक्षिणी मैदान (IV-A)
– इस कृषि जलवायु प्रदेश भीलवाड़ा, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, उदयपुर एवं सिरोही का भाग जिले का भाग आता हैं।
– इस क्षेत्र में वर्षा 500 से 900 मि.मी. होती है।
– यहाँ पर तापमान ज्यादा से ज्यादा 38.6° व कम से कम 8.1° रहता है।
– इस भू-भाग में जलोढ़ एवं पर्वतीय मृदा पाई जाती है।
– प्रमुख फसलें – 1. खरीफ – मक्का, दलहन एवं ज्वार 2. रबी – गेहूँ एवं चना।
– इस क्षेत्र का कृषि अनुसंधान केन्द्र, उदयपुर में है।
9. आर्द्र दक्षिणी मैदान (IV-B)
– इस कृषि जलवायु प्रदेश में डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़ एवं उदयपुर जिले का भाग आता हैं।
– यह राजस्थान का सबसे छोटा कृषि जलवायु प्रदेश है।
– इस भू-भाग में 500 से 1100 मि.मी. वर्षा होती है।
– यहाँ पर तापमाप, ज्यादा से ज्यादा 39° व कम से कम 7.2° रहता है।
– इस क्षेत्र में लाल मृदा, पर्वतीय ढालों पर तथा उथली मृदा घाटियों में पाई जाती है।
– प्रमुख फसलें – 1. खरीफ – मक्का, चावल, ज्वार एवं उड़द 2. रबी – गेहूँ एवं चना।
10. आर्द्र दक्षिणी-पूर्वी मैदान (V)
– इस क्षेत्र में कोटा, झालावाड़, बूँदी, बाराँ एवं सवाई माधोपुर जिले का भाग आता हैं।
– इस भू-भाग में वर्षा 650 से 1000 मि.मी. होती है।
– इस क्षेत्र में तापमान ज्यादा से ज्यादा 42.6° व कम से कम 10.6° रहता है।
– इस भू-भाग में काली जलोढ़ एवं चिकनी मृदा पाई जाती है।
– प्रमुख फसलें – 1. खरीफ – ज्वार एवं सोयाबीन 2. रबी – गेहूँ, सरसों।
– इस क्षेत्र का कृषि अनुसंधान केन्द्र, उम्मेदगंज (कोटा) में है।
प्रमुख फसलों के उत्पादन में तुलनात्मक विवरण | |||||
क्र. स. | फसल | प्रथम स्थान | द्वितीय स्थान | तृतीय स्थान | राजस्थान का देश के कुल उत्पादन में योगदान (प्रतिशत में) |
1. | बाजरा | राजस्थान | उत्तर प्रदेश | हरियाणा | 45.56 |
2. | राई एवं सरसों | राजस्थान | हरियाणा | उत्तर प्रदेश | 46.28 |
3. | पोषक अनाज | राजस्थान | कर्नाटक | मध्य प्रदेश | 15.35 |
4. | कुल तिलहन | राजस्थान | गुजरात | मध्य प्रदेश | 20.30 |
5. | कुल दलहन | राजस्थान | महाराष्ट्र | मध्य प्रदेश | 19.41 |
6. | चना | राजस्थान | महाराष्ट्र | मध्य प्रदेश | 23.44 |
7. | मूँगफली | गुजरात | राजस्थान | तमिलनाडु | 16.04 |
8. | सोयाबीन | मध्य प्रदेश | महाराष्ट्र | राजस्थान | 4.68 |
9. | ग्वार* | राजस्थान |
|
| 78.62 |
स्रोत – भारत सरकार द्वारा प्रकाशित सांख्यिकी पुस्तिका एक नजर में वर्ष 2020 के आधार पर।
ग्वार फसल में वर्ष 2018-19 की स्थिति।
राजस्थान की प्रमुख फसलों की स्थिति:-
क्र.सं. | फसल | सर्वाधिक उत्पादन वाला जिला | सर्वाधिक क्षेत्र वाला जिला | अन्य प्रमुख उत्पादक जिले | जलवायु व मिट्टी |
1. | चावल | बूँदी | बूँदी | हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, कोटा | उष्ण व नम जलवायु उपयुक्त। वर्षा-50 से 200 सेमी. वार्षिक। तापमान-20º से 30º सेन्टीग्रेड। मिट्टी–काली व चिकनी दोमट। |
2. | बाजरा | अलवर | बाड़मेर | अलवर, सवाई माधोपुर, बाराँ | नम व उष्ण मौसम उपयुक्त। मिट्टी–रेतीली दोमट। |
3. | मक्का | चित्तौड़गढ़ | भीलवाड़ा | बूँदी, चित्तौड़गढ़, बाराँ | 24º से 30º सेन्टीग्रेड तापमान। यह गर्म मौसम का पौधा है। जल की प्रचुर आपूर्ति उपयोगी। दोमट मिट्टी उपयुक्त। |
4. | ज्वार | अजमेर | अजमेर | राजसमंद, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़ | गर्म जलवायु की फसल। औसत तापमान-26º-30º डिग्री। वर्षा-35 से 150 सेमी.। मिट्टी–बलुई व चिकनी दोमट। |
5. | गेहूँ | हनुमानगढ़ | हनुमानगढ़ | अलवर, भरतपुर, बूँदी | शीतोष्ण जलवायु, आर्द्रता-50 से 60% मिट्टी–दोमट। |
6. | जौ | श्रीगंगानगर | श्रीगंगानगर | श्रीगंगानगर, अलवर, जयपुर | शीतोष्ण जलवायु। मिट्टी– दोमट व बलुई दोमट। |
7. | चना | बीकानेर | बीकानेर | बाराँ, कोटा, बूँदी | ठण्डी व शुष्क जलवायु। वर्षा मध्यम, मिट्टी हल्की दोमट। |
8. | मोठ | बाड़मेर | बीकानेर | जालोर, बाड़मेर, जोधपुर |
|
9. | मूँग | नागौर, | नागौर | सीकर, जोधपुर, प्रतापगढ़ | शुष्क व गर्म जलवायु, वर्षा–25 से 40 सेमी. वार्षिक, मिट्टी–दोमट। |
10. | उड़द | टोंक | बूँदी | प्रतापगढ़, उदयपुर, सिरोही | उष्ण कटिबंधीय आर्द्र व गर्म जलवायु, वर्षा–40 से 60 सेमी. वार्षिक, मिट्टी–दोमट व चिकनी दोमट। |
11. | चवला | झुंझुनूँ | झुंझुनूँ | जयपुर, सवाई माधोपुर, श्रीगंगानगर |
|
12. | मसूर | झालावाड़ | झालावाड़ | सवाई माधोपुर, कोटा, बूँदी |
|
13. | मूँगफली | बीकानेर | बीकानेर | जालोर, सिरोही, जोधपुर | उष्ण कटिबंधीय जलवायु, तापमान– 250–300 से.ग्रे.,वर्षा-50 से 100 सेमी. एवं मिट्टी–बलुई व दोमट। |
14. | अरण्डी | जालोर | जालोर | अलवर, जालोर, भरतपुर | – |
15. | तारामीरा | जयपुर | जयपुर | टोंक, अजमेर, नागौर | – |
16. | तिल | पाली | पाली | अलवर, भरतपुर, सवाई माधोपुर | उष्ण व समोष्ण जलवायु, तापमान 250-270 से.ग्रे., वर्षा– 30-100 सेमी., मिट्टी– हल्की बलुई दोमट। |
राज्य की प्रमुख व्यापारिक फसलों की स्थिति:-
क.सं. | फसल | सर्वाधिक उत्पादन जिला वाला जिला | सर्वाधिक क्षेत्र वाला जिला | अन्य प्रमुख उत्पादक जिले |
1. | सोयाबीन | कोटा | झालावाड़ | सवाई माधोपुर, कोटा, बाँसवाड़ा |
2. | अलसी | प्रतापगढ़ | प्रतापगढ़ | बाराँ, झालावाड़, चित्तौड़गढ़ |
3. | कपास | श्रीगंगानगर | हनुमानगढ़ | बाँसवाड़ा, श्रीगंगानगर, अजमेर |
4. | गन्ना | चित्तौड़गढ़ | चित्तौड़गढ़ | बाराँ, टोंक, हनुमानगढ़ |
5. | ईसबगोल | बाड़मेर | बाड़मेर | नागौर, सीकर, पाली |
6. | मैथी | नागौर | नागौर | बूँदी, भीलवाड़ा, उदयपुर |
7. | तम्बाकू | जालोर | जालोर | झुंझुनूँ, टोंक, अलवर |
8. | ग्वार | बीकानेर | बीकानेर | करौली, धौलपुर, उदयपुर, राजसमंद |
राजस्थान के कृषि विकास हेतु प्रयासरत संस्थाएँ:- | ||||
क्र.सं. | नाम | स्थापना वर्ष उद्देश्य व अन्य विवरण | ||
1. केन्द्रीय कृषि फार्म, सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर) | अगस्त, 1956 | एशिया का सबसे बड़ा फार्म। सोवियत रूस के सहयोग से स्थापित किया गया। | ||
2. केन्द्रीय कृषि फार्म, जैतसर (श्रीगंगानगर) |
| कनाडा देश के सहयोग से स्थापित किया गया। | ||
3. काजरी (Central Arid Zone Research Institute-CAZARI), जोधपुर | 1959 | काजरी की स्थापना वर्ष 1959 में मरुस्थल वनीकरण शोध केन्द्र का पुनर्गठन कर भारत सरकार द्वारा की गई। वर्ष 1966 में इसे ICAR के अधीन किया गया। काजरी का मुख्य उद्देश्य शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में वन सम्पदा व कृषि का विकास करने हेतु पेड़-पौधों, मिट्टी, हल व भूमि के संबंध में व्यापक सर्वेक्षण, शोध एवं अध्ययन करना है। काजरी के क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र- जैसलमेर, बीकानेर, पाली व भुज (गुजरात) में है, कृषि विज्ञान केन्द्र पाली व जोधपुर में तथा क्षेत्रीय प्रबंध व मृदा संरक्षण क्षेत्र-चाँदन गाँव (जैसलमेर) व बीछवाल (बीकानेर) में स्थापित है। | ||
4. राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड (Rajasthan State Agriculture Marketing Board) | 06-06-1974 | किसानों को कृषि का उचित मूल्य दिलाने के उद्देश्य से कृषि उपज मंडियों की स्थापना, मंडी प्रांगणों व ग्रामीण सम्पर्क सड़कों का निर्माण व रखरखाव करना। | ||
5. बेर अनुसंधान केन्द्र एवं खजूर अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर | 1958 | ‘हिलावी’ खजूर की किस्म और ‘मेंजुल’ किस्म के छुआरा का उत्पादन। | ||
6. राजस्थान राज्य बीज संस्था एवं जैविक उत्पादन प्रमापीकरण | 28-03-1978 | विश्व बैंक की राष्ट्रीय बीज परियोजना के द्वितीय चरण में उत्तम गुणवत्ता वाले बीजों के उत्पादन, विधायन एवं विपणन करने के उद्देश्य से 28 मार्च, 1978 को राजस्थान राज्य बीज निगम के नाम से गठित। अब इसका नाम राजस्थान राज्य बीज एवं जैविक उत्पादन प्रमापीकरण संस्था कर दिया गया है। | ||
7. AFRI (Arid Forest Research Institute), जोधपुर | 1988 | – | ||
8. राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केन्द्र | 2000 | तबीजी (अजमेर) में स्थापित। | ||
9. राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान संस्थान, सेवर, भरतपुर | 1993 | – | ||
10. केन्द्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्र, दुर्गापुरा (जयपुर) | – | – | ||
11. राजस्थान उद्यानिकी एवं नर्सरी विकास समिति (राजहंस) | 2006-07 | राज्य में उद्यानिकी विकास को बढ़ावा देने हेतु उत्तम गुणवत्ता के पौधे के उत्पादन कार्य व आपूर्ति हेतु राज्य सरकार द्वारा गठित। | ||
कृषि से संबंधित विभिन्न क्रांतियाँ:-
1. हरित क्रांति:-
– वर्ष 1966-67 से कृषि उत्पादन में तीव्र वृद्धि लाने हेतु अधिक उपज देने वाले बीजों, रासायनिक खादों, कीटनाशकों व नई कृषि तकनीकों के प्रयोग को बढ़ावा दिया गया, इसे ही हरित क्रांति कहते हैं। हरित क्रांति के जनक नोरमन बोरलॉग है तथा भारत में इसका श्रेय ‘श्री एम.एस. स्वामीनाथन’ को जाता है।
2. पीली क्रांति:-
– इस क्रांति का संबंध तिलहन उत्पादन से है।
3. भू री क्रांति:-
– रासायनिक उर्वरक।
4. इंद्रधनुषी क्रांति:-
– कृषि व संबंध क्षेत्रों के विकास हेतु अपनाए गए उपाय।
5. श्वेत क्रांति:-
– दुग्ध उत्पादन (1970)। श्वेत क्रांति के जनक डॉ. वर्गीज कुरियन थे।
6. नीली क्रांति:-
– मछली उत्पादन।
7. लाल क्रांति:- इस क्रांति का संबंध टमाटर व मांस उत्पादन से है।
8. रजत क्रांति:- अण्डा उत्पादन।
9. गो ल क्रांति:- आलू उत्पादन।
10 सुन हरी क्रांति:– बागवानी।
11. परभनी क्रांति:– भिण्डी उत्पादन।
12. कृष्णा क्रांति:- बायोडीजल उत्पादन।
13. गुलाबी क्रांति:- झींगा मछली उत्पादन।
14. बादामी क्रांति:– मसाला उत्पादन।
15. धूसर क्रांति:- सीमेंट उत्पादन।
16. सेफ्रॉन क्रांति:- केसर उत्पादन।
17. मू क क्रांति:- मोटे अनाज उत्पादन।
18. सदाबहार क्रांति:- इस क्रांति का संबंध जैव तकनीकी द्वारा कृषि कार्य से है।
19. हरित सोना क्रांति:- बाँस उत्पादन।
20. खाकी क्रांति:- चमड़ा उत्पादन।
कृषि विज्ञान की शाखाएँ
वन स्पति विज्ञान:-
– पौधों के जीवन से संबंधित प्रत्येक विषय का अध्ययन।
एग्रोनॉमिक्स:-
– भूमि व फसलों के प्रबंधन का अध्ययन।
एग्रो स्टोलॉजी:-
– घासों के अध्ययन का विज्ञान।
एपीकल्च र:-
– व्यापारिक स्तर पर शहद उत्पादन हेतु किया जाने वाला मधुमक्खी या मौन पालन कार्य।
आर्बोरीक ल्चर:-
– विशेष प्रकार के वृक्षों तथा झाड़ियों की कृषि जिसमें उनका संरक्षण और संवर्द्धन भी शामिल है।
उद्यान विज्ञान:-
– फल–फूल, सब्जियों, सजावटी पौधों आदि के उगाने एवं प्रबंधन का अध्ययन।
हाइड्रो पोनिक्स:-
– पौधों की उत्पत्ति एवं उनके विकास के अध्ययन का विज्ञान।
पैलियोबॉ टनी:-
– पौधों के जीवाश्मों के अध्ययन का विज्ञान।
फाइटोजेनी:-
– पौधों की उत्पत्ति एवं उनके विकास के अध्ययन का विज्ञान।
पॉमोलॉजी:-
– इसके अंतर्गत फूलों के उत्पादन, वृद्धि, सुरक्षा एवं उनकी नस्ल सुधार का अध्ययन किया जाता हैं।
सेरीकल्चर:-
– व्यापारिक स्तर पर की जाने वाली रेशम पालन की क्रिया जिसमें शहतूत आदि की कृषि भी सम्मिलित होती है।
फ्लोरीकल्चर:-
– व्यापारिक स्तर पर फूलों की कृषि।
मेरीकल्च र:-
– व्यापारिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु समुद्री जीवों के उत्पादन की क्रिया।
ओलेरीकल्चर:-
– जमीन पर फैलने वाली विभिन्न प्रकार की सब्जियों की कृषि।
पीसीकल्चर:-
– व्यापारिक स्तर पर की जाने वाली मछली पालन की क्रिया।
सिल्वीकल्चर:-
– वनों के संरक्षण एवं संवर्द्धन से संबंधित विज्ञान।
विटीकल्चर:-
– व्यापारिक स्तर पर की जाने वाली अंगूर उत्पादन (अंगूर की खेती) की क्रिया।
वेजी कल्चर:-
– दक्षिण पूर्व एशिया में आदि मानव द्वारा सर्वप्रथम की गई वृक्षों की आदिम कृषि।
ओलिविकल्चर:-
– व्यापारिक स्तर पर जैतून की कृषि।
व र्मीकल्चर:-
– व्यापारिक स्तर पर की जाने वाली केंचुआ पालन की क्रिया।
कृषि विपणन
कृषि संबंधी उत्पादों को कृषकों से उपभोक्ताओं तक पहुँचाने से संबद्ध क्रियाओं को कृषि विपणन कहा जाता है।
राज्य में कृषकों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने हेतु अच्छी विपणन की सुविधा उपलब्ध करवाने तथा राज्य में मण्डी नियामक एवं प्रबंधन को प्रभावी ढंग से लागू करने हेतु कृषि विपणन निदेशालय कार्यरत है।
1. ‘राजीव गाँधी कृषक साथी योजना‘ के अन्तर्गत कृषकों/ खेतिहर मजदूरों एवं हम्मालों आदि को कार्यस्थल पर दुर्घटनावश मृत्यु होने पर 2 लाख रुपये की सहायता राशि उपलब्ध करवाई जाती है।
2. महात्मा ज्योतिबा फुले मंडी श्रमिक कल्याण योजना – मंडी श्रमिकों के लिए राज्य में वर्ष 2015 से यह योजना चलाई जा रही हैं जिसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं –
1. प्रसूति सहायता – लाभार्थी श्रमिक महिलाओं को अधिकतम दो प्रसूतियों के लिए राज्य सरकार द्वारा अकुशल श्रमिक के रूप में निर्धारित 45 दिन प्रचलित मजदूरी दर के अनुसार भुगतान किया जा रहा है। नवजात शिशु के पिता को राज्य सरकार द्वारा अकुशल श्रमिक के रूप में निर्धारित प्रचलित मजदूरी दर के अनुसार 15 दिन की मजदूरी के समतुल्य राशि का भुगतान किया जा रहा है।
2. छात्रवृत्ति/मेधावी छात्र पुरस्कार योजना – मण्डी में ऐसे लाभार्थी श्रमिकों जिनके पुत्र/पुत्री जो 60 प्रतिशत एवं उससे अधिक अंक प्राप्त करते हैं, को इस योजना के अन्तर्गत छात्रवृत्ति दी जाएगी।
3. विवाह के लिए सहायता लाभार्थी श्रमिक महिलाओं की पुत्रियों के विवाह के लिए 50,000 रुपये की सहायता राशि देय होगी। यह सहायता अधिकतम दो पुत्रियों के लिए ही देय होगी।
4.चिकित्सा सहायता – लाभार्थी श्रमिकों को गंभीर बीमारी (कैंसर, हार्ट अटैक, लीवर, किडनी आदि) होने की दशा में सरकारी अस्पताल में भर्ती रहने पर वित्तीय सहायता के रूप में अधिकतम 20,000 रुपये की राशि स्वीकृत की जाएगी।
कृषि विपणन बोर्ड-
– राज्य में एक व्यापक नीति “राजस्थान कृषि प्रसंस्करण, कृषि व्यवसाय एवं कृषि निर्यात प्रोत्साहन नीति-2019″ दिनांक 17 दिसम्बर, 2019 को प्रारम्भ की गई है।
इस नीति की मुख्य विशेषताएँ निम्न प्रकार है: –
– समूह आधारित कार्य प्रणाली द्वारा फसल कटाई के बाद की हानियों को कम करना।
– कृषकों एवं उनके संगठनों की सहभागिता बढ़ाना।
– कृषकों एवं उनके संगठनों की आपूर्ति एवं मूल्य संवर्द्धन शृंखला में प्रत्यक्ष भागीदारी बढ़ाते हुए उनकी आय मे वृद्धि के उपाय करना।
– राज्य की उत्पादन बहुलता वाली विशिष्ट फसलों जैसे-जीरा, धनिया, सौंफ, अजवाइन, ग्वार, ईसबगोल, दलहन, तिलहन, मेहंदी, किन्नू, सेब, अनार एवं ताजा सब्जियों आदि के मूल्य संवर्द्धन तथा निर्यात को प्रोत्साहन देना।
– खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों के द्वारा कौशल विकास कर रोजगार का सृजन करना।
विशिष्ट कृषि जिन्सों की मण्डियों की स्थापना:-
– ‘उत्पादन वहाँ विपणन’ के सिद्धान्त को दृष्टिगत रखते हुए राज्य में पहली बार निम्नलिखित विशिष्ट मण्डियाँ स्थापित की गई हैं-
क्र.सं. | नाम मुख्य/गौण मण्डी | जिन्स का नाम |
1. | मेड़ता सिटी (नागौर) | जीरा |
2. | भवानी मण्डी (झालावाड़) | सन्तरा |
3. | अलवर | प्याज |
4. | सवाई माधोपुर | अमरूद |
5. | अजमेर | फूल |
6. | चौमूँ (जयपुर) | आँवला |
7. | बस्सी-जयपुर | टमाटर |
8. | सोजत सिटी-सोजत रोड (पाली) | सोनामुखी |
9. | भीनमाल (जालोर) | ईसबगोल |
10. | बीकानेर (अनाज मंडी) | मूँगफली |
11. | कपासन (चित्तौड़गढ़) | अजवाइन |
12. | रसीदपुरा (फतेहपुर) | प्याज |
13. | जोधपुर | जीरा |
14. | टोंक | मिर्च |
15. | श्रीगंगानगर | किन्नू, माल्टा |
16. | रामगंज मण्डी (कोटा) | धनिया |
17. | पुष्कर-अजमेर | फूल |
18. | शाहपुरा-जयपुर | टिण्डा |
19. | छीपाबड़ौद-छबड़ा (बाराँ) | लहसुन |
20. | सोजत सिटी-सोजत रोड (पाली) | मेहन्दी |
21. | झालरापाटन (झालावाड़) | अश्वगंधा |
22. | बसेड़ी (जयपुर) | मटर |
23. | मंदगज (किशनगढ़) | दलहन |
कृषि विश्वविद्यालय
– स्वामी केशवानन्द कृषि विश्वविद्यालय बीकानेर में स्थित है। इसकी स्थापना वर्ष 1962 में की गई। वर्ष 1987 में इसे बीकानेर स्थानान्तरित किया गया। 2009 में इसका नामकरण स्वामी केशवानन्द किया गया।
– महाराणा तकनीकी एवं कृषि विश्वविद्यालय, उदयपुर में स्थित है। इसकी स्थापना 1999 में की गई।
– नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर (जयपुर) में स्थित है। इसकी स्थापना 2013 में की गई।
– जोधपुर कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर में स्थित है। इसकी स्थापना 2013 में की गई।
– कोटा कृषि विश्वविद्यालय, कोटा में स्थित है। इसकी स्थापना 2013 में की गई।
कृषि एवं उद्यानिकी हेतु शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान:-
1. सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर सिट्रस, प्रजनन फलोद्यान, नान्ता (कोटा)।
2. सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर अनार, ढिंढोल फार्म, बस्सी (जयपुर)।
3. सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर खजूर, सगरा-भोजका फार्म (जैसलमेर)।
4. सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर जैतून, बस्सी फार्म (जयपुर)।
5. अंतर्राष्ट्रीय उद्यानिकी नवाचार एवं प्रशिक्षण केन्द्र- जयपुर।
6. हाइटेक एग्रो हार्टी रिसर्च एण्ड डेमोन्ट्रेशन सेंटर- बस्सी (जयपुर)।
7. सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर संतरे (झालावाड़)।
8. सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर अमरूद, देवड़ावास (टोंक)।
9. सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर आम, खेमरी (धौलपुर)।
10. सब्जी फसलों का उत्कृष्टता केन्द्र – बूँदी।
11. सीताफल उत्कृष्टता केन्द्र – चित्तौड़गढ़।
12. फूलों का उत्कृष्टता केन्द्र – सवाई माधोपुर।
13. औषधीय फसलों का उत्कृष्टता केन्द्र, मावली (उदयपुर)।
राज्य में कृषि विभाग की प्रमुख योजनाएँ :
(1) राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) –
– केन्द्रीय सरकार द्वारा केन्द्र प्रवर्तित योजना के रूप में वर्ष 2007-08 से राज्य में गेहूँ एवं दलहन पर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन प्रारम्भ किया गया था। केन्द्रीयांश एवं राज्यांश का वित्त पोषण अनुपात 60:40 है।
– गेहूँ एवं दलहन पर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एन.एफ. एस.एम.) के अन्तर्गत प्रमाणित बीजों का वितरण, उन्नत उत्पादन तकनीक का प्रदर्शन, जैविक खाद, सूक्ष्म तत्त्वों, जिप्सम, समन्वित कीट प्रबन्धन (आई.पी.एम.), कृषि यंत्रो, फव्वारा, पम्प सेट, सिंचाई जल हेतु पाइप लाइन एवं फसल तंत्र आधारित प्रशिक्षण द्वारा किसानों को सहयोग देना आदि महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम हैं।
– राज्य में गेहूँ के लिए 14 जिलों यथा- बाँसवाड़ा, भीलवाड़ा, बीकानेर, जयपुर, झुन्झुनूँ, जोधपुर, करौली, नागौर, पाली, प्रतापगढ़, सवाई माधोपुर, सीकर, टोंक एवं उदयपुर में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन को लागू किया गया है।
– राज्य में मोटा अनाज मक्का के लिए 5 जिलों यथा बाँसवाड़ा, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, डूँगरपुर, तथा उदयपुर में एन.एफ.एस.एम. क्रियान्वित किया जा रहा है। मोटा अनाज के लिए 7 जिलों यथा- अजमेर, भीलवाड़ा, हनुमानगढ़, जयपुर, नागौर, श्रीगंगानगर तथा सीकर में एन.एफ.एस.एम. क्रियान्वित किया जा रहा है।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन न्यूट्रिसीरियल योजना-
– एक केन्द्रीय प्रवर्तित योजना के रूप में राज्य में वर्ष 2018-19 में प्रारम्भ किया गया है। इस योजना में प्रमाणित बीज का वितरण एवं उत्पादन, उत्पादन तकनीक में सुधार का प्रदर्शन, जैव उर्वरकों को बढ़ावा देना, सूक्ष्म पोषक तत्त्वों का प्रयोग, समन्वित कीट प्रबन्धन और फसल प्रदर्शन पर किसानों को प्रशिक्षण देना है।
इस योजना में चयनित जिलों में भारत सरकार द्वारा ज्वार फसलें 10 जिलों यथा अजमेर, अलवर, भरतपुर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, जयपुर, जोधपुर, नागौर, पाली व टोंक तथा बाजरा फसलें 21 जिलों यथा- अजमेर, अलवर, बाड़मेर, भरतपुर, बीकानेर, चूरू, दौसा, धौलपुर, हनुमानगढ़, जयपुर, जैसलमेर, जालोर, झुन्झुनूँ, जोधपुर, करौली, नागौर, पाली, सवाई माधोपुर, सीकर, सिरोही व टोंक में सम्मिलित की गई हैं।
– राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एन.एफ.एस.एम.) वाणिज्यिक फसलों के अन्तर्गत कपास के लिए अग्रिम प्रदर्शन और पौध संरक्षण रसायन सम्मिलित है।
– एन.एफ.एस.एम. तिलहन एवं ऑयल पॉम मिशनः
– इस मिशन की मुख्य गतिविधियाँ आधारभूत एवं प्रमाणित बीज का उत्पादन, प्रमाणित बीज का वितरण, फसल प्रदर्शन, समन्वित जीवनाशी प्रबन्धन, पौध संरक्षण रसायन, पौध संरक्षण उपकरण वितरण, जैव उर्वरक, जिप्सम, जल संवहन के लिए पाइप लाइन, कृषक प्रशिक्षण, कृषि उपकरण, तारबंदी, बीज मिनी कीट वितरण तथा बीज आधारभूत विकास आदि हैं।
– केन्द्रीयांश एवं राज्यांश का वित्त पोषण पैटर्न का अनुपात 60:40 है।
(2) राष्ट्रीय टिकाऊ खेती मिशन (एन.एम.एस.ए.)
– पूर्व में संचालित योजनाओं- राष्ट्रीय सूक्ष्म सिंचाई मिशन, राष्ट्रीय जैविक खेती परियोजना, राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य एवं उर्वरता प्रबन्ध परियोजना तथा वर्षा आधारित क्षेत्र विकास कार्यक्रम जलवायु परिवर्तन को केन्द्रित करते हुए पुनर्गठन कर एक नया कार्यक्रम राष्ट्रीय टिकाऊ खेती मिशन क्रियान्वित किया जा रहा है। केन्द्रीयांश एवं राज्यांश का वित्त पोषण पैटर्न का अनुपात 60:40 है।
– राष्ट्रीय टिकाऊ खेती मिशन के अन्तर्गत चार सब-मिशन सम्मिलित किए गए है :
– (अ) वर्षा आधारित क्षेत्र विकास (आर.ए.डी.): राज्य के विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों में विशिष्ट क्षेत्र के विभिन्न प्रकार की समन्वित कृषि पद्धति यथा- पशुपालन आधारित, उद्यानिकी आधारित और कृषि वानिकी (वृक्ष आधारित) कृषि प्रणालियों की परिकल्पना की गई है। कृषकों को समन्वित कृषि पद्धति एवं सहायक गतिविधियों हेतु सहायता प्रदान की जाती है। कृषि पद्धति के साथ वर्मी कम्पोस्ट इकाइयों की स्थापना की गतिविधियाँ की जाती है।
– ( ब) मृदा स्वास्थ्य प्रबन्धन एवं मृदा स्वास्थ्य कार्ड : यह योजना मृदा परीक्षण सेवाओं को बढ़ावा देने, मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी करने और विभिन्न फसलों के लिए विवेकपूर्ण पोषक तत्त्व प्रबन्धन तकनीकी के विकास की परिकल्पना करती है।
– (स ) परम्परागत कृषि विकास योजना (पी.के.वी.वाई.): परम्परागत कृषि विकास योजना के अन्तर्गत क्लस्टर एवं पी.जी.एस. प्रमाणन के माध्यम से जैविक खेती को प्रोत्साहित किया जाता है एवं पी.के.वी.वाई कार्यक्रम के तहत सहभागिता गारण्टी प्रणाली (पी.जी.एस.) के तहत गुणवत्ता में विश्वास प्रमुख दृष्टिकोण है। किसानों के पास पी.जी.एस.-भारत मानकों के अनुपालन में जैविक खेती के किसी भी रूप को अपनाने का विकल्प है।
– (द) कृषि वानिकी पर उप मिशन ( एस.एम.ए.एफ. ) राष्ट्रीय टिकाऊ खेती मिशन के तहत वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करने और विस्तार करने के उद्देश्य से कृषि वानिकी पर एक उप मिशन वर्ष 2017-18 में प्रारम्भ किया गया।
(3) राष्ट्रीय कृषि विस्तार एवं तकनीकी मिशन (एन.एम.ए.ई.टी.)
– इस मिशन का उद्देश्य कृषि विस्तार का पुनर्गठन एवं सशक्तीकरण करना है, जिसके द्वारा किसानों को उचित तकनीक एवं कृषि विज्ञान की अच्छी पद्धतियों का हस्तांतरण किया जा सके । केन्द्रीयांश एवं राज्यांश का वित्त पोषण पैटर्न का अनुपात 60:40 है। “राष्ट्रीय कृषि विस्तार एवं तकनीकी मिशन” के अन्तर्गत चार उप मिशन सम्मिलित किए गए है –
– कृषि विस्तार पर उप मिशन (एस.एम.ए.ई.)
– बीज एवं रोपण सामग्री पर उप मिशन (एस.एम.एस.पी.)
– कृषि यंत्रीकरण पर उप मिशन (एस.एम.ए.एम.)
– कृषि में राष्ट्रीय ई-गवर्नेन्स प्लान (एन.ई.जी.पी.-ए.)
(4) राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आर.के.वी.वाई./राष्ट्रीय कृषि विकास कार्यक्रम)
– कृषि और संबंधित क्षेत्रों में निवेश में लगातार हो रही कमी को देखते हुए, केन्द्र सरकार ने वर्ष 2007-08 के दौरान कृषि क्षेत्र के लिए योजनाओं को अधिक व्यापक रूप से तैयार करने के लिए आर.के.वी.बाई. की शुरुआत की।
– राज्य के कृषि-जलवायु परिस्थितियों, प्राकृतिक संसाधन मुद्दों और प्रौद्योगिकी पर विचार करने के लिए एवं कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, मुर्गी पालन, बागवानी, डेयरी और कृषि विश्वविद्यालयों आदि के क्षेत्र में एकीकृत जिला कृषि योजना तैयार करने हेतु परियोजना आधारित सहायता प्रदान की जा रही है।
– केन्द्र और राज्य सरकार का वित्त पोषण पैटर्न क्रमशः 60:40 अनुपात में है।
(5) परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) –
– जैविक खेती में पर्यावरण आधारित न्यूनतम लागत तकनीकों के प्रयोग से रसायनों व कीटनाशकों का प्रयोग कम करते हुए कृषि उत्पादन किया जाता है।
– राष्ट्रीय टिकाऊ कृषि मिशन (NMSA) के अन्तर्गत मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन का ही विस्तार परंपरागत कृषि विकास योजना है।
– इसके अन्तर्गत क्लस्टर व PGS प्रमाणन के माध्यम से जैविक कृषि को प्रोत्साहित किया जाता है।
– इसमें केन्द्र व राज्य का अंशदान 60-40 हैं।
(6) प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना –
– प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना भारत सरकार द्वारा वर्ष 2015-16 से वित्त पोषित पैटर्न केन्द्र एवं राज्य के बीच अनुपात 60:40 से लागू की गई है।
– इस योजना का नोडल विभाग उद्यानिकी विभाग है तथा कृषि एवं उद्यानिकी विभाग द्वारा विभिन्न गतिविधियाँ क्रियान्वित की जा रही है।
(7) प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना –
– प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना खरीफ, 2016 से प्रारम्भ की गई है। इस योजना में खाद्यान्न फसलों (अनाज, मोटा अनाज और दालें) तिलहन और वार्षिक वाणिज्यिक/वार्षिक बागवानी फसलों को शामिल किया गया है।
– प्रीमियम राशि के अंतर्गत कृषक से खरीफ फसल में 2 प्रतिशत, रबी में 1.5 प्रतिशत एवं वार्षिक वाणिज्यिक/वार्षिक बागवानी फसलों के लिए 5 प्रतिशत लेकर फसल का बीमा किया जा रहा है।
– प्रीमियम का शेष भाग केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा समान रूप से 50-50 प्रतिशत के अनुपात में बीमा कम्पनी को भुगतान किया जाता है।
– भारत सरकार द्वारा जारी निर्देशानुसार मौसम खरीफ 2020 में असिंचित क्षेत्रों के लिए 30 प्रतिशत एवं सिंचित क्षेत्रों के लिए 25 प्रतिशत की अधिकतम प्रीमियम का अनुदान ही केन्द्रीयांश द्वारा वहन किया जाएगा।
– राज्य में प्रीमियम सब्सिडी का भुगतान और फसल कटाई प्रयोगों के संचालन हेतु राज्य वित्त पोषित योजना क्रियान्वित की जा रही है।
(8) ग्लोबल राजस्था न एग्रीटेक मीट (GRAM)
– इसका प्रारम्भ सीतापुरा (जयपुर) से किया गया। इसके बाद राजस्थान सरकार द्वारा GRAM का आयोजन कोटा, उदयपुर में किया जा चुका है।
– इसका उद्देश्य कृषि क्षेत्र में विकास दर को बढ़ाकर सतत विकास एवं आर्थिक विकास के माध्यम से किसानों की आय को 2022 तक दुगुनी करना है।
– यह कृषि और सम्बद्ध क्षेत्र की नीतिगत पहल है इसके द्वारा किसानों को खेती के नए तरीकों व तकनीकी की जानकारी दी जाती है।
(9) सौर ऊर्जा आ धारित पम्प परियोजना (प्रधानमंत्री ‘कुसुम’ योजना कम्पोनेंट ‘बी’)
– वर्ष 2019-20 से भारत सरकार के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा पी.एम. कुसुम (प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महा-अभियान) कम्पोनेन्ट-बी स्टैण्ड अलोन सौर ऊर्जा पम्प संयंत्र योजना क्रियान्वित की जा रही है।
– जिसमें 3एचपी से 10 एचपी क्षमता तक के सौर ऊर्जा पम्प संयंत्रों की स्थापना के प्रावधान के साथ अधिकतम 7.5 एचपी क्षमता तक के पम्प हेतु अनुदान देय है।
– राज्य में वर्ष 2010-11 से वर्ष दिसम्बर, 2021तक 64010 सौर ऊर्जा पम्प संयंत्र स्थापित करवाए जा चुके हैं।
इस योजनान्तर्गत कुल 60 प्रतिशत (केन्द्रीयांश 30 प्रतिशत, राज्यांश 30 प्रतिशत) अनुदान देय है।
(10) प्रधानमं त्री कृषि सिंचाई योजना-सूक्ष्म सिंचाई (पी.एम.के.एस.वाई.-एम.आई.)
– राज्य में जल एक सीमित एवं बहुमूल्य संसाधन है। इस दृष्टि से फसल उत्पादकता बढ़ाने एवं पानी को बचाने के लिए लघु सिंचाई पद्धति में ड्रिप एवं फव्वारा सिंचाई पद्धति, प्रभावी जल प्रबन्धन की व्यवस्था है। इसमें सभी श्रेणी के कृषकों के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार का अनुपात 60:40 है। इन पद्धतियों के समुचित उपयोग को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार द्वारा वर्ष 2020-21 में विभिन्न श्रेणी के कृषकों को सूक्ष्म सिंचाई संयंत्रों पर अनुदान दिया जा रहा है. इसके साथ ही राज्य सरकार द्वारा अतिरिक्त अनुदान भी दिया जा रहा है।
Economy History Notes Rajasthan Art & Culture Rajasthan Geography Rajasthan GK Static GK









