प्राचीन काल की समाज
ऋग्वैदिक काल –
- वर्ण व्यवस्था – वर्ण शब्द रंग का व्यंजक है ऋग्वेद के आरंभ मे कहा गया था कि आर्य और दास दो वर्ण है परंतु शीघ्र ही इंका प्रयोग पेशे के रूप मे होने लगा । तथा ऋग्वैदिक समाज को 3 समूहो मे बाँट दिया गया यथा ब्राह्मण अथवा पुरोहित, राज्यन अथवा क्षत्रीय तथा शेष लोग । परंतु यह विभाजन अस्थाई नहीं था परंतु पेशे मे परिवर्तन के साथ वर्ण स्थिति मे भी परिवर्तन हो जाता था उदाहरण के लिए विश्वामित्र जन्म से राजन्य थे परंतु पेशे से पुरोहित हो गए वहीं ऋषि भृगु के वंशजो ने पुरोहित होते हुये राजन्य के पेशे को अपना लिया । पहली बार ऋग्वेद के 10 वें मण्डल के पुरुष सूक्त मे चतुर्वर्ण का जिक्र मिलता है यथा ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य, एवं शूद्र । चूंकि 10 वां मण्डल उत्तर वैदिक काल से संबन्धित है इसलिए चतुर्वर्ण व्यवस्था का आरंभ उत्तर वैदिक काल से माना जाना चाहिए हालांकि उत्तर वैदिक काल मे स्पष्ट रूप मे वर्ण विभाजन का आधार जन्म नहीं बना था परंतु एक वर्ण से दूसरे वर्ण मे परिवर्तन कठिन हो गया था ।
- महिलाओ कि दशा – ऋग्वैदिक काल मे परवर्ती काल की तुलना मे महिलाओं की स्थिति अच्छी थी। उदाहरण के लिए पुत्रियों के जन्म को हतोत्साहित नहीं किया जाता था लड़कियों के विवाह की उम्र प्राय : 16-17 वर्ष होती थी उनका उपनयन संस्कार भी होता था । तथा उन्हे भी शिक्षा प्राप्त होती थी । कुछ ऋग्वैदिक कालीन महिलाओं ने भी ऋग्वेद के सूक्तों का लेखन किया है । कुछ महिलाओ को ऋषि का पद भी प्राप्त हुआ । इस काल की विदुषी महिलाओ मे घोषा , अपाला, विश्वरा , लोपामुद्रा आदि का नाम आता है । उसी प्रकार महिलाएं रथ दोड़ एवं युद्ध मे भी हिस्सा लेती थी।परंतु महिलाओ की अच्छी स्थिति का अर्थ पुरुष-महिला समानता से नहीं लगाया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए ऋग्वेद मे वीर पुत्रो की कामना की जाती थी। ऋग्वेद मे मुश्किल से 12- 15 सूक्त महिलाओ के द्वारा रचे गए और किसी महिला को पुरोहित पद नहीं मिला
उत्तर वैदिक काल –
चतुर्वर्ण व्यवस्था – उत्तर वैदिक काल तक आकर 4 वर्णो का विकास हुआ ये वर्ण थे – ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य एवं शूद्र पहली बार इनकी चर्चा ऋग्वेद के 10 वें मण्डल के पुरुष सूक्त मे मिलती है । परंतु यह अंश बाद मे जोड़ा गया है इसलिए इसे उत्तर वैदिक काल से जोड़कर देखा जाता है। पहले 3 वर्ण अर्थात ब्राह्मण , क्षत्रिय एवं वैश्य को द्विज का दर्जा दिया जाता था अर्थात इंका एक बार वास्तविक जन्म होता था और दूसरी बार उपनयन संस्कार जिसे जन्म माना जाता था । इन चरो वर्णो के दायित्व भी निर्धारित थे ब्राह्मण का दायित्व बोद्धिक नेतृत्व था तथा क्षत्रिय का दायित्व सुरक्षा करना , वैश्य एकमात्र उत्पादक एवं करदाता वर्ण होता था वहीं शूद्र का दायित्व होता था ऊपर के तीन वर्णो की सेवा करना ।
महिलाओ की दशा – उत्तर वैदिक काल तक आकार वर्ण व्यवस्था मे होने वाले परिवर्तन ने महिलाओ की दशा को भी प्रभावित किया । दूसरे शब्दों मे उत्तर वैदिक काल तक एक वर्ण से दूसरे वर्ण मे प्रवेश कठिन हो गया था तथा उच्च वर्णो के द्वारा वर्ण विशेषाधिकारों पर बल दिया जाने लगा था क्योंकि वर्ण स्तर के आधार पर ही संसाधनो तक पहुँच संभव थी । परंतु वर्ण व्यवस्था की शुद्धता को बनाए रखने के लिए महिलाओ की सामाजिक दशा को गिराना आवश्यक हो गया था क्योंकि महिलाओ पर नियंत्रण के बाद ही वर्ण व्यवस्था की रक्षा हो सकती थी । महिलाओ की सामाजिक दशा गिरी यद्यपि यह गिरावट तुलनात्मक रूप मे थी एक उत्तर वैदिक ग्रंथ एतरेय ब्राह्मण मे पुत्र को परिवार का रक्षक और पुत्री को दुख का कारण बताया गया । उसी प्रकार महिलाओ का सभा मे प्रवेश वर्जित हो गया ।
वर्ण, जाति, आश्रम एवं संस्कार:
वर्ण: वर्ण पहले रंग का बोध करता था परंतु बाद मे वह पेशे का बोध करने लगा । वर्ण कुल चार थे – ब्राह्मण , क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र । जाति: परंतु आगे चलकर वर्ण से जाति का विकास होने लगा निम्नलिखित कारणो से जाति का विकास हुआ –
- प्रतिलोम विवाह की संतान वर्ण संकर समूह मे शामिल हुये और फिर वे जाति के रूप मे ढलते चले गए वस्तुत: 7 वीं सदी ईशा पूर्व तक सूत्र साहित्य की रचना के पश्चात वर्ण विभाजन को जन्म आधारित बना दिया गया तथा इंका उल्लघन करने वाले को वर्ण संकर का दर्जा दिया जाने लगा। आगे चलकर ये जाति के रूप मे ढाल गए ।
- बदलती हुई परिस्थितियों के अनुकूल नए – नए पेशों का विकास हुआ इन पेशों से जुड़े हुये लोग पृथक जाति समूह मे ढलते चले गए । उदाहरण के लिए बढ़इ, तेली, कुम्हार आदि ।
- जनजाति समूह भी वर्ण व्यवस्था मे शामिल होते चले गए और फिर उन्हे पृथक जाति का दर्जा मिला
- क्षेत्रीयतावाद का प्रभाव भी जाति व्यवस्था पर देखा गया । किसी क्षेत्र विशेष मे पृथक निवास करने वाली किसी जाति समूह के लोगो ने अपने को पृथक जाति का दर्जा देना शुरू कर दिया । इस प्रकार एक ही जाति के अंतर्गत कई – कई उपजातियाँ विकसित हो गई । इस प्रकार वर्ण तो चार ही रहे परंतु जाति की संख्या हजारों हो गई। इस प्रकार हम कह सकते है कि वर्ण भारतीय समाज का आदर्श बना रहा परंतु जाति समाज का यथार्थ बन गया
आश्रम : कुल 4 आश्रमो की परिकल्पना की गई –
- ब्रह्मचर्य
- ग्रहस्थ
- वानप्रस्थ
- सन्यास
वैदिक काल तक 3 ही आश्रम होते थे चौथा आश्रम बुद्ध काल मे जुड़ा । आश्रम व्यवस्था के 2 घोषित उद्देश्य थे –
- अर्थ , धर्म, काम, मोक्ष – चार पुरुषर्थों को प्राप्त करना
- देव ऋण, ऋषि ऋण , पितृ ऋण , मानव जाति के ऋण से मुक्त होना
परंतु इसका वास्तविक उद्देश्य था – निजी उद्धयम व सामाजिक नियंत्रण के बीच संतुलन स्थापित करना
संस्कार : वैसे तो गौतम ने 40 प्रकार के संस्कारो की बात की है परंतु सामान्यत: 16 संस्कारो की परिकल्पना की गई है ।
संस्कार मुख्यत: द्विजों के होते थे कुछ संस्कार शूद्रों और स्त्रियॉं को भी प्राप्त थे परंतु वे प्राय: मंत्र हीन होते थे ।
संस्कारो के विषय मे अवधारणा यह थी कि ये हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोडते है तथा एक जन्म से दूसरे जन्म मे जाते है ।
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बुद्ध काल –
इस काल मे सूत्र साहित्य का लेखन हुआ तथा इसके आधार पर वर्ण विभाजन का आधार जन्म को बना दिया अर्थात वर्ण स्थिति मे परिवर्तन नहीं किया जा सकता था अत: इसके उल्ल्ङ्घन का रास्ता तैयार हुआ और फिर वर्ण से जाति का विकास होने लगा इसके अतिरिक्त इस काल मे नगरीकरण आरंभ हो गया था तथा नगरीय संरचना के विकास के साथ नए – नए पेशे अस्तित्व मे आने लगे थे इन पेशो से जुड़े हुये लोग भी जाति के रूप मे ढलते चले गए । दूसरी तरफ महिलाओ कि सामाजिक दशा मे गिरावट देखि जा सकती थी । महिलाओ को पुरुषो के अधीन किया जाने लगा साथ ही इस काल मे हम दहेज प्रथा का आरंभ भी मान सकते है उदाहरण के लिए मगध के शासक बिंबिसर को काशी का क्षेत्र दहेज मे प्राप्त हुआ था । सूत्र साहित्य मे 8 प्रकार के विवाहों का विवरण मिलता है –
- धर्मेय प्रकार के विवाह – इन्हे उत्तम प्रकार का विवाह माना जाता था इसमे 4 प्रकार के विवाह शामिल थे और उन्हे मान्यता प्राप्त थी ये इस प्रकार है –
- ब्रह्म विवाह – यह दहेज लेन – देन के बाद होने वाला सामान्य प्रकार का विवाह होता था ।
- दैव विवाह – यज्ञ कराने वाले पुरोहित को दक्षिणा के रूप मे पुत्री को समर्पित करना
- आर्ष विवाह – कन्या के पिता को केवल प्रतिकात्मक रूप मे एक जोड़ी बैल अथवा गाय प्रदान करना
- प्रजापत्य – बिना दहेज लेन – देन का विवाह
- अधर्मेय प्रकार के विवाह – ये भी 4 प्रकार के विवाह थे परंतु इन्हे मान्यता प्राप्त नहीं थी –
- गंधर्व विवाह – यह एक प्रकार का प्रेम विवाह था । राम – सीता का विवाह भी इसी मे शामिल माना जाता है । स्वयंवर कि प्रथा योद्धा वर्ग मे प्रचलित थी
- असुर विवाह – कन्या कि खरीद-बिक्री
- राक्षस विवाह – अपहरण के द्वारा विवाह
- पिशाच विवाह – किसी प्रकार शारीरिक संपर्क बना लेना
मौर्य काल –
इस काल के एक प्रमुख सामाजिक चिंतक कौटिल्य का दृष्टिकोण व्यावहारिक है उसका लक्ष्य ही है अर्थ कि प्राप्ति और उसका ग्रंथ भी राजनीतिक शास्त्र पर एक ग्रंथ है इसलिए शूद्रों और महिलाओ के प्रति उसका दृष्टिकोण नरम है । वह शूद्र को आर्य कहता है और उसे दासों से पृथक मानता है उसी प्रकार उसने गणिकाओ के प्रति भी नरम दृष्टिकोण रखता है राज्य उन पर कर लगाता था तथा उससे राज्य को आमदनी प्राप्त होती थी इसके अतिरिक्त कौटिल्य ने 8 प्रकार के विवाहो को मान्यता दी है क्योंकि उसके विचार मे अगर किसी महिला के साथ दुर्घटना घटित हों जाती है तथा फिर समाज उसे मान्यता नहीं दे उसकी स्थिति और भी दयनीय हों जाएगी ।
मौर्योतर काल –
मौर्योतर काल मे निम्नलिखित कारको से वर्ण व्यवस्था को चुनौती मिली थी –
- बड़ी संख्या मे विदेशी तत्वो को आत्मसात किया जा रहा था क्योंकि यह विदेशी आक्रमण का काल था
- बड़ी संख्या मे जनजातीय तत्वो को समाज मे आत्मसात किया जा रहा था । इसका एक बड़ा कारण था भूमि अनुदान का आरंभ ।
इन कारकों ने वर्ण व्यवस्था मे तनाव उत्पन्न किया उसी काल मे मनु का आगमन हुआ और मनु ने वर्ण व्यवस्था को बचाने के लिए सामाजिक नियमो के प्रति कठोर दृष्टिकोण अपनाया और ये इस प्रकार है –
- उसने 61 वर्ण संकर जातियो का चयन किया आगे ये सभी भारतीय जाति व्यवस्था मे शामिल हों गए
- उसने विदेशियों को दूसरे प्रकार के क्षत्रिय का दर्जा देकर वर्ण व्यवस्था मे शामिल किया
- शूद्रों के प्रति उसकी दृष्टि कठोर है उसने द्विजों को यह सलाह दी कि वे शूद्रों के संपर्क से बचे ।
- वर्ण व्यवस्था कि जटिलता बढ्ने का एक परिणाम था महिलाओ कि सामाजिक दशा मे गिरावट।
- मनु संहिता ने बाल विवाह को प्रोत्साहन दिया एवं विधवा पुनर्विवाह पर पाबंदी लगाई ।
गुप्त काल :
गुप्त संभवत: गैर – क्षत्रिय थे । अत: इन्हे वैध स्थिति प्राप्त करने के लिए ब्राह्मणो के समर्थन की जरूरत हुई इसलिए गुप्त काल मे ब्राह्मण वादी पुनरुत्थान हुआ इस कारण से वर्ण एवं जाति की जटिलता बढ़ गई ।
गुप्त कालीन सामाजिक व्यवस्था मे निंलिखित विशेषताये पाते है –
- ब्राह्मणो केविशेषाधिकारों पर बल दिया गया
- क्षत्रिय वर्ण की बेहतर स्थिति बनी रही
- वैश्यों की सामाजिक दशा मे तुलनात्मक रूप मे गिरावट आई जबकि शूद्रों की सामाजिक दशा मे तुलनात्मक रूप मे सुधार हुआ । याज्ञवल्क्य स्मृति मे शूद्रों को कृषक कहा जाता था । उन्हे यज्ञ करने का भी अधिकार दिया गया ।
- महिलाओ की सामाजिक दशा मे तुलनात्मक रूप मे गिरावट आई । गुप्तकालीन एरण अभिलेख से हमे सती प्रथा का पुरातात्विक साक्ष्य मिलता है उसी प्रकार कालिदास के मेघदूतम से देवदासी प्रथा की सूचना मिलती है । पाँचवी सदी से पुरुष के गौत्र के अनुसार महिलाओ का गौत्र बदलने लगा ।
- अछूतो के लिए अस्पृश शब्द का प्रयोग करने वाला पहला स्मृतिकारकात्यायन था । इसके अतिरिक्त फाहयान एवं हवेनसांग जैसे विदेसी लेखको ने चांडाल जाति की दुर्दशा के विषय मे लिखा है
- पहली बार याज्ञवल्क्य स्मृति मे कायस्थ जाति का विवरण मिलता है वह लिपिक (scribe) वर्ग से संबद्ध था ।
- याज्ञवल्क्य स्मृति मे महिलाओ के संपती का अधिकार मिला ।
गुप्तोत्तर काल एवं पूर्वमध्य काल :
- इस काल मे जातियों से उपजातियों का निर्माण हुआ
- गुप्त काल के अंत मे व्यापार को धक्का लगा था इस कारण विभिन्न प्रकार के पेशेवर समूह जाति के रूप मे ढलते चले गए । उदा. के लिए बढ़इ , लुहार , सुनार आदि ।
- जातियों की संख्या मे वृद्धि इस काल की विशेषता है । कश्मीरी लेखक कल्हण के अनुसार कुल 64 जातियाँ थी तथा 36 प्रकार की क्षत्रिय जातियाँ थी ।
- इस काल मे महिलाओ को स्वयंवर की अनुमति राजपूत लड़कियों को प्राप्त हुई अर्थात राजघराने मे स्वयंवर का प्रचलन था साथ ही महिलाओ के संपती के अधिकार मे वृद्धि देखि गयी । याज्ञ वल्क्य स्मृति पर विज्ञानेश्वर द्वारा लिखी गई टीका मिताक्षरा मे महिलाओ की संपति के अधिकार को बढ़ाया गया है। इस काल मे संपति के अधिकार पर 2 पृथक स्कूल है । एक है मिताक्षरा जो विज्ञानेश्वर का है और दूसरा है दायभाग जो जीमूतवाहन का है । मिताक्षरा स्कूल सम्पूर्ण भारत मे लागू है जबकि दायभाग स्कूल बंगाल और असम मे लागू था । मिताक्षरा स्कूल मे जन्मना स्वत्व(पैदा होते ही संपति का अधिकार) जबकि दायभाग मे पिता की मृत्यु के बाद पुत्र को संपति प्राप्त होती है ।
- इस काल मे एक पृथक जाति के रूप मे महत्तर का विकास हुआ महत्तर गाँव के मुखिया को कहा जाता था तथा उसके अनुमोदन से ही भूमि का आदान – प्रदान होता था । अब वह एक जाति बन गया था ।
- इस काल मे अछूतो की संख्या मे विस्तार देखने को मिलता है । निम्नलिखित कारणो से अछूतो का उद्भव एवं उनकी संख्या मे विस्तार हुआ –
- कुछ गैर-आर्य , आर्य समूह से पराजित होने के बाद सीमावर्ती क्षेत्रों मे भाग खड़े हुये तथा अलग – थलग होकर निवास करने लगे वे अछूत की श्रेणी मे ढल गए
- कुछ जनजातियाँ अछूत की श्रेणी मे चली गई ।
- कुछा खास प्रकार के शिल्पियों की सामाजिक दशा मे गिरावट आई और वे अछूत की श्रेणी मे चले गए ।
अछूतो के लिए पंचम एवं अंतवासिन शब्द का प्रयोग होता था । अछूतो की श्रेणी मे निम्नलिखित समूह के लोग शामिल थे –
- चांडाल – श्मशान घाट पर कार्य करना
- निषाद – शिकार का कार्य करना
- कैवर्त – मछुआरा
- कारवर – चमड़े का काम
- वेण – गंदे फूलों को चुनना
- रथकर – वैदिक काल मे इसकी सामाजिक स्थिति अच्छी थी और यह रथ चालक था परंतु आगे चलकर यह अछूत की श्रेणी मे आ गया
- पुक्कुश- सड़कों की सफाई
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