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निवेश मॉडल (Economy Notes) – PPP, HAM, EPC Model For UPSC & SSC

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प्रारूप –
  1. PPP मॉडल
  2. EPC मॉडल
  3. VGF मॉडल
  4. HAM मॉडल
  1. PPP(public-private partnership) मॉडल :
    1. BOT (Build Operate Transfer Model) – वर्तमान मे सड़क परियोजना से संबन्धित अधिकांशत: BOT मॉडल पर आधारित है जहां निजी क्षेत्र परियोजना के निर्माण , वित्त , संचालन और उस पर शुल्क आरोपित करते है। एक निश्चित समयावधि बाद परियोजना को सरकार को हस्तांतरित कर देते है। सरकार उसे शुल्क मुक्त कर देती है।
    2. BOLT (Build Operate Lease Transfer Modal) – यहाँ परियोजना का निर्माण पूरा होने पर सरकार को हस्तांतरित किया जाता है सरकार पुन: पट्टे (Lease) के माध्यम से परियोजना के संचालन का कार्य निजी क्षेत्र को सौंप देती है।
    3. BOOT (Build Operate Own Transfer Modal) – जहां परियोजना का निर्माण से संचालन का कार्य निजी क्षेत्र द्वारा किया जाता है। तथा सरकार द्वारा परियोजना का स्वामित्व भी निजी क्षेत्र को हस्तांतरित कर दिया जाता है।
  2. EPC (engineering procurement construction) Modal – इसे ठेकेदारी कहा जाता है जहाँ ठेके पर निर्माण कार्य सरकार द्वारा निजी क्षेत्र को दिया जा रहा है निर्माण कार्य पूर्ण होने पर ठेकेदार को पूर्व तय कीमत का भुगतान कर दिया जाता है। अत्यधिक लाभ के कारण ठेकेदार यहाँ निर्माण की गुणवत्ता को निम्न कर देता है। इस प्रकार EPC की तुलना मे BOT modal मे गुणवत्ता उच्च होती है।
  3. HAM (Hybrid Annuity) Model – यह EPC और BOT model का मिश्रित मॉडल होता है जहाँ सरकार द्वारा कुल परियोजना लागत का 40% भुगतान परियोजना निर्माण के 5 साल मे किया जाता है। यह भुगतान Annuity आधार पर होता है। उदाहरण – माना परियोजना लागत = 100cr ; 40% = 40cr ; Annuity = 40cr/5 = 8cr/year
  4. VGF (viability gap funding) model – वर्तमान मे देश मे उड़ान योजना मे इस मॉडल का प्रयोग किया जा रहा है। इस मॉडल के अंतर्गत सरकार निजी क्षेत्र को कुल परियोजना लागत का 20% भुगतान अग्रिम मे कर देती है तथा मध्य मे संबन्धित विभाग और मंत्रालय द्वारा परियोजना के मूल्याकन के पश्चात सरकार अतिरिक्त 20% का भुगतान कर सकती है। कम से कम 20% और अधिकतम 40% भुगतान सरकार द्वारा

 

MCA से संबन्धित चुनौती –

  1. लाभ – सरकार का उद्देश्य कल्याणकारी होता है जबकि निजी क्षेत्र का उद्देश्य केवल लाभ कमाना अत: दोनों विरोधाभासी होते है।
  2. जोखिम से संबन्धित – MCA असपष्ट होने के कारण सरकार परियोजना मे होने वाले नुकसान का बोझ निजी क्षेत्र पर डाल देती है
  3. पुन: वार्ता – पुन: वार्ता का प्रावधान नहीं होता है जिससे निजी क्षेत्र को नुकसान होता है।

 

समाधान –

वर्ष 2015 मे PPP से संबन्धित केलकर समिति का गठन किया गया उनके मुख्य सुझाव है –

  1. PPP मे सरकार और निजी क्षेत्र के बीच होने वाले विवाद के त्वरित निपटान के लिए IPAT-Infrastructure PPP appellate Tribunal को स्थापित किया जाए।
  2. PPP से राज्य सरकार को बाहर रखा जाए, राज्य का कार्य लोक कल्याण का होता है।
  3. PPP मे MCA उपबंध को अधिक स्पष्ट बनाया जाए जिससे परियोजना मे नुकसान होने पर उसका बंटवारा सरकार और निजी क्षेत्र दोनों मे होना चाहिए
  4. PPP मे प्रत्येक क्षेत्र मे परियोजनाओं के निर्माण के निर्माण के लिए अलग-अलग कानून होने चाहिए। (One size fit for all नहीं होना चाहिए)
  5. केलकर ने स्विस चलेंज को हतोत्साहित करने को कहा। सरकार द्वारा निर्माण कार्य 2 प्रकार का होता है – solicited और unsolicited। स्विस चलेंज unsolicited से संबंधित होता है जहाँ सरकार स्वयं टेंडर जारी ना करके किसी निजी कंपनी के आवेदन को स्वीकार कर उसे अपने पोर्टल पर प्रदर्शित करती है जिससे अन्य आवेदन कर सकें और इसमे पारदर्शिता रहे इसे ही स्विस चलेंज कहा जाता है। केलकर के अनुसार स्विस चलेंज मे भ्रष्टाचार पूर्व मे ही हो जाता है (गोपनीय जानकारी लीक) अत: उन्होने इसे हतोत्साहित करने का सुझाव दिया।

 

आगे की राह –

  1. प्रधानमंत्री गति शक्ति योजना
  2. राष्ट्रीय मुद्रीकरण योजना
  3. राष्ट्रीय अवसंरचना पाइप लाइन
  4. राष्ट्रीय लोजीस्टिक नीति 2022


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