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राजस्थान की वनस्पति: 17वीं वन रिपोर्ट एवं प्रशासनिक वर्गीकरण

Physical Regions of Rajasthan: Classification & Key Facts


राजस्थान की वनस्पति

• भारत में वनों के विकास के लिए सर्वप्रथम लॉर्ड डलहौजी ने 1854 ई. में वन विभाग की स्थापना की।
• वनों के विकास के लिए ब्रिटिश काल में 1894 ई. में प्रथम वन नीति की घोषणा की गई ,जिसका उद्देश्य वन संरक्षण एवं राजस्व की प्राप्ति था।
• राजस्थान में सर्वप्रथम वर्ष 1910 में जोधपुर रियासत में वनों के विकास हेतु योजना बनाई गई।
• प्रथम वन संरक्षण कानून वर्ष 1927 में ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाया गया।
• राजस्थान में वर्ष 1935 में सर्वप्रथम अलवर रियासत में वन संरक्षण कानून बनाया गया।

स्वतंत्रता के पश्चात्-
1. सन् 1949 में राजस्थान में वन विभाग की स्थापना की गई।
2. भारत सरकार द्वारा वर्ष 1952 में प्रथम राष्ट्रीय वन नीति की घोषणा की गई। इस वन नीति के अनुसार देश के कुल क्षेत्र के 33 प्रतिशत भाग पर वन होने आवश्यक है।

17वीं भारतीय वन रिपोर्ट-

 

• भारतीय वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के तहत भारतीय वन अनुसंधान संस्थान (देहरादून) व भारतीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (लखनऊ) की स्थापना वर्ष 1981 में की गई।
• भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग (देहरादून) द्वि-वार्षिक आधार पर भारतीय वन रिपोर्ट तैयार करता है।
• भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग (देहरादून) द्वारा प्रथम भारतीय वन रिपोर्ट वर्ष 1987 में तैयार की गई तथा वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (भारत सरकार) द्वारा वर्ष 1989 में प्रथम भारतीय वन रिपोर्ट का प्रकाशन किया गया।
• 13 जनवरी, 2022 को 17वीं भारतीय वन रिपोर्ट जारी की गई।
• 17वीं भारतीय वन रिपोर्ट 2021 रिसोर्स सेट-2 लिस-III उपग्रह प्रणाली पर आधारित हैं।
• 16वीं भारतीय वन रिपोर्ट-2019 उपग्रह प्रणाली रिसोर्स सेट-2 लिस-III पर आधारित प्रथम भारतीय वन रिपोर्ट थी।
• 17वीं भारतीय वन रिपोर्ट-2021 केन्द्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने जारी की है।
• वन रिपोर्ट-2021 (17वीं) में पहली बार टाइगर कॉरिडोर, टाइगर रिज़र्व, गिर के जंगल (एशियाई शेर) में वन आवरण का आकलन किया गया है।

– राजस्थान में वनों को कैनोपी घनत्व (वृक्ष घनत्व) के आधार पर तीन भागों में विभाजित किया गया है।

1. अत्यन्त सघन वन-
– वह वन क्षेत्र, जिसमें वृक्ष घनत्व 75 प्रतिशत से अधिक है।
– ये राजस्थान के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 0.02 प्रतिशत हैं।
– राजस्थान में 78.15 वर्ग किलोमीटर भाग पर फैले हुए हैं।

2. सामान्य सघन वन-
– वह वन क्षेत्र, जिसमें वृक्ष घनत्व 40 से 75 प्रतिशत तक होता है।
– ये राजस्थान के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 1.28 प्रतिशत हैं।
– ये वन राजस्थान के 4,368.65 वर्ग किलोमीटर भाग पर फैले हुए हैं।

3. खुले वन-
– वह क्षेत्र, जिसमें वृक्ष घनत्व 10 से 40 तक प्रतिशत होता है।
– ये राजस्थान के भौगोलिक वन क्षेत्र का 3.57 प्रतिशत हैं।
– ये वन राजस्थान में 12,208.16 वर्ग किलोमीटर भाग पर फैले हुए हैं।

वृक्षावरण क्षेत्र-
– एक हैक्टेयर से कम क्षेत्र, जहाँ वृक्ष घनत्व 10 प्रतिशत से कम होता है।
– राजस्थान में वृक्षावरण क्षेत्र 8,733 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र है। यह राजस्थान के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 2.55 प्रतिशत है।
– राजस्थान में वन एवं वृक्षावरण क्षेत्र 16,654.96 + 8,733 वर्ग किलोमीटर = 25,387 वर्ग किलोमीटर (राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 7.42 प्रतिशत) है।
– राज्य का कुल वनावरण 16,654.96 है जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 4.87 प्रतिशत है।
– राजस्थान में झाड़ी क्षेत्र 4,808.51 वर्ग किलोमीटर है जो राजस्थान के कुल क्षेत्रफल का 1.41 प्रतिशत है।
– इण्डिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट-2021 में भी राजस्थान में 25.45 वर्ग किलोमीटर वृक्षाच्छादित क्षेत्र में वृद्धि दर्शायी गई है।

17वीं भारतीय वन रिपोर्ट-2021
राजस्थान में सर्वाधिक वन विस्तार वाले जिले–
1. उदयपुर (2,753.39 वर्ग किलोमीटर)
2. अलवर (1,195.91 वर्ग किलोमीटर)
3. प्रतापगढ़ (1,033.77 वर्ग किलोमीटर)

राजस्थान में न्यूनतम वन विस्तार वाले जिले–
1. चूरू (77.69 वर्ग किलोमीटर)
2. हनुमानगढ़ (92.97 वर्ग किलोमीटर)
3. जोधपुर (109.25 वर्ग किलोमीटर)

राजस्थान में सर्वाधिक वन प्रतिशत वाले जिले–
1. उदयपुर (23.49 प्रतिशत)
2. प्रतापगढ़ (23.24 प्रतिशत)
3. सिरोही (17.49 प्रतिशत)

राजस्थान में न्यूनतम वन प्रतिशत वाले जिले–
1. जोधपुर (0.48 प्रतिशत)
2. चूरू (0.56 प्रतिशत)
3. जैसलमेर (0.84 प्रतिशत)

राजस्थान में सर्वाधिक झाड़ी वन वाले जिले–
1. पाली2. करौली3. जयपुर

राजस्थान में न्यूनतम झाड़ी वन वाले जिले–
1. हनुमानगढ़ 2. श्रीगंगानगर   3. चूरू

राजस्थान में सर्वाधिक वन वृद्धि वाले जिले–
1. अजमेर (26.45 प्रतिशत)
2. पाली (26.01 प्रतिशत)
3. बीकानेर (24.10 प्रतिशत)
राज्य के 19 जिलों में वन क्षेत्र में वृद्धि दर्ज की गई।

राजस्थान में सर्वाधिक वन क्षेत्र में कमी वाले क्षेत्र–
1. जालोर (32.46 प्रतिशत कमी)
2. करौली (26.16 प्रतिशत कमी)
3. सिरोही (13.49 प्रतिशत कमी)
– राज्य के 14 जिलों में वन क्षेत्र में कमी दर्ज की गई।

प्रशासनिक प्रतिवेदन 2021-22 (वन विभाग राजस्थान)

राजस्थान राज्य में जिलेवार वन क्षेत्र का वर्गीकरण (क्षेत्रफलवर्ग किमी. में)

31 दिसम्बर, 2021 की स्थिति के अनुसार

क्र.स.

जिले का नाम

आरक्षित वन

रक्षित वन

अवर्गीकृत वन

कुल वन भूमि

1.

अजमेर

194.99

421.69

1.89

618.57

2.

भीलवाड़ा

437.80

273.71

67.55

779.06

3.

नागौर

0.80

206.28

35.32

242.40

4.

टोंक

101.42

229.19

2.97

333.58

5.

बीकानेर

0.00

778.38

472.37

1250.75

6.

चूरू

7.20

48.58

17.96

73.73

7.

श्रीगंगानगर

0.00

238.42

395.02

633.44

8.

हनुमानगढ़

0.00

113.37

126.09

239.46

9.

भरतपुर

0.00

422.46

12.49

434.94

10.

धौलपुर

7.92

597.73

44.03

649.68

11.

करौली

62.99

1693.13

54.61

1810.73

12.

सवाई माधोपुर

834.79

118.20

22.08

975.07

13.

जयपुर

672.97

263.47

5.48

941.92

14.

झुंझुनूँ

6.02

399.33

0.00

405.36

15.

सीकर

9.92

622.40

9.22

641.54

16.

अलवर

1010.78

641.18

132.69

1784.66

17.

दौसा

134.87

149.36

0.36

284.59

18.

जोधपुर

4.68

184.99

55.46

245.13

19.

बाड़मेर

20.30

569.02

36.66

625.98

20.

जैसलमेर

0.00

241.45

340.56

582.01

21.

जालोर

126.13

302.22

83.09

511.44

22.

पाली

816.56

144.76

2.26

963.58

23.

सिरोही

614.04

985.43

42.61

1642.08

24.

कोटा

837.63

452.58

77.38

1367.59

25.

बाराँ

0.00

2233.03

20.40

2253.42

26.

बूँदी

867.76

680.85

19.25

1567.86

27.

झालावाड़

314.72

946.60

25.39

1286.72

28.

उदयपुर

2654.06

1494.65

13.21

4161.92

29.

बाँसवाड़ा

0.00

1006.33

0.66

1007.00

30.

चित्तौड़गढ़

1200.75

587.11

0.75

1788.61

31.

डूँगरपुर

257.08

435.71

0.51

693.30

32.

प्रतापगढ़

702.66

963.65

0.62

1666.92

33.

राजसमंद

277.41

119.20

4.98

401.58

कुल योग

12176.24

18564.45

2123.93

32864.62

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प्रशासनिक प्रतिवेदन 2021-22

• राज्य में कुल अभिलेखित वन 32,864.62 वर्ग किलोमीटर है जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 9.60 प्रतिशत है।

• राजस्थान राज्य वन संरक्षण अधिनियम, 1953 के तहत वनों को प्रशासनिक दृष्टि से तीन भागों में विभाजित किया गया है-

1. आरक्षित वन (पूर्णत: प्रतिबंधित वन)
• ये कुल वन क्षेत्र का 37.05 प्रतिशत हैं।
• राजस्थान में आरक्षित वन 12,176.24 वर्ग किलोमीटर हैं।
• सर्वाधिक आरक्षित वन उदयपुर जिले में हैं।

2. रक्षित वन (आंशिक प्रतिबंधित वन)
• वनों की कटाई वर्जित है परन्तु सरकार की आज्ञा से पशु चराई सम्भव है।
• ये वन कुल प्रशासनिक वन क्षेत्र का 56.49 प्रतिशत है।
• राजस्थान में संरक्षित वन 18,564.45 वर्ग किलोमीटर हैं।
• सर्वाधिक संरक्षित वन बाराँ जिले में हैं।

3. अवर्गीकृत वन (अप्रतिबंधित वन)
• अवर्गीकृत वनों में पेड़ों की कटाई व मवेशियों की चराई पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
• ये वन कुल प्रशासनिक कुल वन क्षेत्र का 6.46 प्रतिशत हैं।
• अवर्गीकृत वन राजस्थान में 2,123.93 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर फैले हुए हैं।
• सर्वाधिक अवर्गीकृत वन बीकानेर में हैं।

वनों के उत्पाद –
गोंद-
चौहटन (बाड़मेर) में सर्वाधिक कदम्ब वृक्ष से गोंद प्राप्त किया जाता है।

कत्था-
खदिर/खैर से प्राप्त होता है। इसका वानस्पतिक नाम एकेसिया कैटेचू है।
कथौड़ी (उदयपुर, चित्तौड़गढ़, बूँदी, भरतपुर व झालावाड़) जाति कत्था तैयार करती है।

महुआ-
महुआ को आदिवासियों का कल्प वृक्ष कहते हैं। इसकी पत्तियों, फूल, फल व छाल से शराब बनाया जाता हैं। यह अधिकतर बाँसवाड़ा व डूँगरपुर में पाया जाता है।

आँवल (द्रोण पुष्पी)-
आँवल मुख्यतः उदयपुर, पाली, राजसमंद व जोधपुर में पाई जाती है। यह चमड़े की टैनिंग के लिए काम आती है। इसका निर्यात किया जाता है।

खस-
खस से इत्र व शरबत बनता है। खस का तेल जड़ों से प्राप्त किया जाता है। यह अधिकतर भरतपुर, सवाई माधोपुर व करौली में पाया जाता है।

अर्जुन वृक्ष-
ये वृक्ष उदयपुर, डूँगरपुर व बाँसवाड़ा में पाए जाते हैं। रेशम कीट पालन इस वृक्ष पर किया जाता हैं।

पंचकूटा-
कैर, सांगरी, काचरी, कूम्मट के बीज व गूंदा का फल पंचकूटा में शामिल होते है।

पंचवटी-
बड़, आँवला, पीपल, अशोक व बिल्व वृक्ष पंचवटी में शामिल होते है। पाँचों वृक्ष वर्तमान में राज्य सरकार के द्वारा पंचवटी योजना के अन्तर्गत लगाए जा रहे हैं।

भुरट घास-
इस घास का वानस्पतिक नाम सेन्क्रस बाइफ्लोरस है। यह घास मृदा क्षरण को रोकने में उपयोगी है।

धामण घास –
इस घास का वानस्पतिक नाम सेन्क्रस सेटीजेरस है। इस घास से उत्तम गुणों से युक्त पौष्टिक सूखा चारा प्राप्त होता है। 

कांग्रेस घास (गाजर घास)-
अमेरिका से आयातित गेहूँ के साथ इस खरपतवार के बीज भारत में आए और यह जयपुर जिले में सर्वाधिक पाई जाती है। यह चर्म रोग और अस्थमा की वाहक है।

खेजड़ी (शमी वृक्ष)-
इसे रेगिस्तान का कल्पवृक्ष व रेगिस्तान का गौरव उपनामों से जाना जाता हैं।
इसका वैज्ञानिक भाषा प्रोसोपिस सिनेरेरिया है। वर्ष 1983 में इसे राज्य वृक्ष का दर्जा दिया गया।
गोगाजी व झुँझार बाबा के मन्दिर/थान खेजड़ी वृक्ष के नीचे बने होते हैं।
विश्व का एक मात्र वृक्ष मेला खेजड़ली में भरता है। खेजड़ली में 1730 ई. में (जोधपुर के राजा अभय सिंह के समय) अमृता देवी विश्नोई ने 363 नर-नारियों सहित खेजड़ी वृक्षों को बचाने हेतु अपनी आहुति दे दी थी।
12 सितम्बर को प्रतिवर्ष “खेजड़ली दिवस” मनाया जाता है।
प्रथम खेजड़ली दिवस 12 सितम्बर, 1978 को मनाया गया।
वन्य जीव संरक्षण के लिए दिया जाने वाला सर्वश्रेष्ठ पुरस्कारअमृता देवी वन्य जीव” पुरस्कार है। इस पुरस्कार की शुरुआत वर्ष 1994 में की गई।
प्रथम अमृता देवी वन्य जीव पुरस्कार पाली के गंगाराम बिश्नोई को दिया गया।
रेगिस्तान वनरोपण एवं भू-संरक्षण केन्द्र जोधपुर में स्थित है।
‘प्रत्येक बच्चा-एक पेड़’ का लक्ष्य स्कूली कार्यक्रम में छठी पंचवर्षीय योजना में चलाया गया।
राज्य में जीवों की रक्षार्थ पहला बलिदान 1604 ई. में जोधपुर रियासत के ही रामसड़ी गाँव में करमा व गौरा नामक व्यक्तियों द्वारा दिया गया।
देश का प्रथम राष्ट्रीय मरु वानस्पतिक उद्यान माचिया सफारी पार्क (जोधपुर) में स्थापित किया गया।
नई वन नीति 17 फरवरी, 2010 को लागू की गई।
• राजस्थान में 16 वन्य जीव मण्डल हैं।

राजस्थान में भौगोलिक दृष्टि से तीन प्रकार के प्रमुख वन पाए जाते हैं–

1. उष्ण कटिबंधीय कंटीले वन – ये वन राजस्थान के शुष्क एवं  अर्द्धशुष्क भागों में पाए जाते हैं। यह बीकानेर, चूरू, नागौर, जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, सीकर, झुंझुनूँ तथा जालोर में पाए जाते हैं। इन वनों में झाड़ियाँ एवं कँटीले वृक्ष पाए जाते हैं। यहाँ मुख्य रूप से वृक्ष रोहिड़ा, खेजड़ी, धौकड़ा, बेर, बबूल, कैर व नीम मिलते हैं। इस मरुस्थलीय वनस्पति को मरुद्‌भिद भी कहा जाता है।

2. उष्ण कटिबंधीय शुष्क पतझड़ वन – इन वनों को ‘मानसूनी वन’ भी कहते हैं। ये वन मुख्यत: बाँसवाड़ा, डूँगरपुर, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, बाराँ, झालावाड़, अजमेर, कोटा, जयपुर, सवाई माधोपुर, करौली, बूँदी एवं टोंक जिलों में पाए जाते हैं। 

(I) शुष्क सागवान वन – इन वनों का विस्तार उदयपुर, डूँगरपुर, झालावाड़, चित्तौड़गढ़ व बाराँ जिलों में हैं।
– ये वन 250 से 450 मीटर ऊँचाई वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
– इनके अलावा इन वनों में धावड़ा, गुरजन, तेंदू, गोंदल, हल्दू, सीरिस, सेमल, रीठा, इमली व बहेड़ा के वृक्ष भी पाए जाते हैं।

(II) सालर वन – इन वनों का विस्तार राजसमंद, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, सिरोही, पाली, अजमेर, अलवर, जयपुर व सीकर जिले में हैं।
– ये वन 450 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
– इन वनों में प्रमुख वन सालर, धोक, धावड़ व कठीरा हैं।   

(III) बाँस के वन – इन वनों का विस्तार चित्तौड़गढ़, बाँसवाड़ा, कोटा, बाराँ, उदयपुर व सिरोही जिले में हैं।
– बाँस के वृक्ष के साथ सागवान, धाकड़ा व धोकड़ा के वृक्ष भी पाए जाते हैं।

(IV) धोकड़ा वन – इन वनों का विस्तार कोटा, बूँदी, जयपुर, अलवर, सवाई माधोपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़ व उदयपुर जिलों में हैं।
– रेगिस्तान को छोड़कर सभी क्षेत्रों का भौगोलिक पर्यावरण इनके अनुकूल है।
– राजस्थान में ये वन सर्वाधिक पाए जाते हैं।
– राजस्थान में धोकड़ा को धोक के नाम से भी जाना जाता है।
– इन वनों के साथ अरुन्ज, खिरनी, खैर, गोंद व सालर के वृक्ष भी पाए जाते हैं।

(V) पलास वन – अलवर, अजमेर, सिरोही, पाली, राजसमंद, उदयपुर व चित्तौड़गढ़ में इनका विस्तार हैं।
– इन वनों का विस्तार उन क्षेत्रों में है, जहाँ धरातल कठोर व पथरीला है।

(VI) खैर के वन – इन वनों का विस्तार झालावाड़, कोटा, चित्तौड़गढ़, –   बाराँ व सवाई माधोपुर जिलों के क्षेत्रों में हैं।
– इनका फैलाव राजस्थान के दक्षिणी पठारी भाग में है।
– खैर के साथ बेर, अरुन्ज व धोकड़ा के वन मिलते हैं।

(VII) मिश्रित पर्णपाती वन – सिरोही, उदयपुर, चित्तौड़गढ़,  राजसमंद, कोटा व बाराँ जिलों में इनका विस्तार हैं।
– ये वन राज्य के दक्षिणी पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
– इन वनों में पाए जाने वाले प्रमुख वृक्ष शीशम, सालर, तेंदू, आँवला,    रोहन, बुलर, अमलताश, करंज, अर्जुन व जामुन हैं।

3. अर्द्ध शुष्क कटिबंधीय सदाबहार वन – ये वन सदैव हरे-भरे दिखते हैं इसलिए इन्हें सदाबहार वन कहते हैं। ये आबू पर्वतीय क्षेत्र में ही पाए जाते हैं। इन वनों में मुख्यत: आम, बाँस, सागवान वृक्ष पाए जाते हैं।

पर्यावरण वानिकी

परिभ्रांषित वनों का पुनरारोपण-
• इस योजना के अंतर्गत परिभ्रांषित वन क्षेत्रों में वृक्षारोपण एवं जल तथा मृदा संरक्षण के कार्य करवाए जा रहे हैं। इस वर्ष 3,000 हैक्टेयर में वृक्षारोपण का कार्य पूर्ण कर लिया गया है।

जलवायु परिवर्तन एवं मरु प्रसार रोकना –
• वातावरण में आ रहे बदलावों को दृष्टिगत रखते हुए जलवायु परिवर्तन के कारण मरु प्रसार की अभिवृद्धि को रोकने हेतु मरुस्थलीय जिलों में मुख्यतया टिब्बा स्थिरीकरण के कार्य करवाए जा रहे हैं। वर्ष 2021-22 में 10,000 हैक्टेयर क्षेत्र में अग्रिम मृदा कार्य करवाया जा रहा है तथा 2900 हैक्टेयर वृक्षारोपण कार्य पूर्ण कर लिया गया है।

राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम-
• राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम वन विकास अभिकरण के माध्यम से संचालित किए जा रहे हैं। ये अभिकरण ग्राम्य वन सुरक्षा एवं प्रबंध समिति के माध्यम से कार्य कराते हैं। राज्य में 33 वन विकास अभिकरण कार्यरत हैं। 9 जुलाई, 2010 से राज्य में राजस्तरीय “राज्य वन विकास अभिकरण” का गठन किया गया है। यह अभिकरण सोसायटी एक्ट के अन्तर्गत पंजीकृत है।


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