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हडप्पा सभ्यता (2600 – 1900 ईशा पूर्व) | इतिहास और नगर नियोजन

हडप्पा सभ्यता (2600 - 1900 ईशा पूर्व) | इतिहास और नगर नियोजन


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हड्ड्पा सभ्यता भारतीय उप महाद्वीप मे पहली नगरीय सभ्यता थी तथा यह विश्व की तीन प्राचीनतम सभ्यताओ मे एक थी ।

दो अन्य थे – मिस्र एव मेसोपोटामिया की सभ्यता ।  आकार मे हड्ड्पा सभ्यता उन दोनों से कहीं बड़ी थी।

1924 तक यह सभ्यता पूरी तरह प्रकाश मे आई ।

आरंभ मे अधिकांश स्थल सिंधु घाटी मे निकलकर आए थे इसलिए इसे सिंधु घाटी की सभ्यता का नाम दिया गया था परंतु आगे अधिक स्थल सिंधु घाटी के बाहर मिलने लगे इसलिए इसका नाम बदलने की जरूरत हुई और क्योंकि पुरातत्व की यह परंपरा रही कि पहले स्थल के नाम पर सभ्यता व संस्कृति का नाम हो क्योंकि पहला स्थल हडप्पा था जो पंजाब मे अवस्थित था अत : उसी के नाम पर उसका नाम हडप्पा सभ्यता रखा गया ।



यह ब्रिटिश विद्वानो के लिए एक चुनौती थी कि जिन लोगो को ब्रिटिश सभ्य बनाने का दावा करते थे वे लोग ब्रिटिश से बहुत पहले ही सभ्य हो चुके थे । 

इसलिए ब्रिटीश विद्वानो ने प्राचीन भारत के लोगो कि उपलब्धियों को का करके दिखाना चाहा और उन्होने हडप्पा सभ्यता के उद्भव को पश्चिम एशिया कि सभ्यता मेसोपोटामिया कि देन बताने का प्रयास किया । परंतु उनका विचार तार्किक नहीं था क्योंकि हड्ड्पा सभ्यता और मेसोपोटामिया कि सभ्यता के बीच लिपि , मुहर कि बनावट , नगर योजना सभी मे अंतर देखा गया । इसलिए इस सभ्यता के उद्भव  व्याख्या क्रमिक उद्भव के सिधान्त के संदर्भ मे की जाने लगा है और ऐसा माना जाने लगा है किउत्तर पश्चिम कि ग्रामीण संस्कृतियों से इस सभ्यता का उद्भव हुआ । ये संस्कृतियाँ हो सकती है – ईरानी – बलूची संस्कृति , साथी – सिसवाल संस्कृति , कालीबंगा संस्कृति , कोटदीजी संस्कृति आदि ।

जैसा कि हमने देखा कि उत्तर पश्चिम मे नव पाषाण काल मे सबसे पहले और सबसे विकसित बस्तियाँ अस्तित्व मे आई थी फिर लगभग 3200 ईशा पूर्व मे तांबे , चक्की,  नाव ,हल  आदि का प्रयोग शुरू हो गया । इस कारण इस क्षेत्र कि तेजी से प्रगति हुई फिर इसे आरंभिक हड्ड्पा चरण का नाम दिया गया । आगे इसी को आधार बनाकर लगभग 2600 ईशा पूर्व मे एक विकसित नगरीय सभ्यता अस्तित्व मे आई जो हड्ड्पा सभ्यता थी  इसलिए वर्तमान मे क्रमिक उद्भव का सिधान्त ही मान्य है ।

अपनी नगर निर्माण योजना मे हड्ड्पा सभ्यता समकालीन विश्व मे विलक्षण थी । यद्यपि मेसोपोटामिया एवं मिश्र की सभ्यता भी नगरीय सभ्यता थी परंतु वहाँ नगरीकरण उतना सुव्यवस्थित नहीं था जैसा कि हम हड्ड्पा सभ्यता मे पाते  है  हड्ड्पाई नगर निर्माण कि निम्न विशेषतए थी –

  1. नगरों कि बनावट मे एकरूपता हड्ड्पा मोहन जो दड़ो एवं कलिबंगा जैसे नगरों के निर्माण मे एक प्रकार कि एकरूपता है अर्थ्र्त नगर समान्यत : दो भागो मे विभाजित है – पश्चिमी भाग मे दुर्ग क्षेत्र है जहां शासक वर्ग के लोग रहते थे वहीं पूर्वी भाग मे निचला शहर है जहां जन सामान्य निवास करते थे ।
  2. व्यवस्थित नगर निर्माण योजना – हड्डपाई लोगो ने पहले सड़के गलियाँ एवं नालियाँ बनाई उसके बाद मकानो का निर्माण किया उनके नगर ग्रिड प्रणाली कि तरह सुव्यवस्थित रूप मे बसा हुआ है ।
  3. विलक्षण जल निकास प्रणाली घर कि नाली सडक कि नाली से इलती और गली कि नाली मुख्य सड़क कि नाली से मिलती फिर मुख्य सड़क कि नाली कि सफाई के लिए नरमोखे (manhole ) भी बने हुये थे । नालियों का एक व्यवस्थित जाल बना हुआ था ।
  4. शासक वर्ग का समतामुलक दृष्टिकोण – मिश्र और मेसोपोटामिया के शासक वर्ग के विपरीत जिनहोने राजकीय शान और शोकत पर अधिक खर्च किया वहीं जन सामनी कच्ची इंटू और झोंपड़ियों मे रहते थे हड्डपाई शासक वर्ग ने सार्वजनिक भवनो के निर्माण अपेक्षाकृत कम खर्च किया जबकि जन सामान्य ईंटों के मकान मे रहते थे निश्चय ही हड्ड्पा सभ्यता के लोग समकालीन विश्व मे सबसे बेहतर जीवन स्तरका उपभोग कर रहे थे।
  5. जल संरक्षण प्रणाली का विकासजल कि कमी कि समस्या को दूर करने के लिए हड्ड पाई लोगो ने बेहतर जल संरक्षण प्रणाली विकसित करने का प्रयास किया इसका ज्वलंत उदाहरण है गुजरात का धोलावीरा ।

हड्डपाई नगरीकरण भारतीय उप महाद्वीप मे नगर निर्माण का प्रथम प्रयोग था । हालांकि कुछ शताब्दियों के पश्चात इन नगरों का पतन हो गया लेकिन नगरीकरण का अनुभव कायम रहा जिसे वर्तमान भारत के नगरीकरण को भी प्रेरणा मिली जो इस प्रकार है –

  1. नगर मे मकान सड़क गलियाँ एवं नालियों का निर्माण
  2. पक्की ईंटों का व्यापक प्रयोग तथा ईंटों के निर्माण मे समानता सरकारी भवन मकान एवं दुकानों को पृथक क्षेत्र मे स्थापित करना

परंतु निम्न बातों मे वर्तमान नगर निर्माता हड्डपाई  नगर से प्रेरणा नहीं ले सके –

  1. हड्डपाई नगर निर्माताओं ने पहले सड़कों गलियों ओर नालियों का निर्माण किया फिर नगर स्थापित किए इस लिय उनकी जल निकास प्रणाली वर्तमान कई नगरों से बहतर है ।
  2. हड्डपाई शासक वर्ग ने शासक वर्ग के शान और शौकत पर कम खर्च किया किन्तु जन सामान्य के जीवन स्तर को ऊंचा उठाया ।
  3. हड्ड्पा सभ्यता के अंतर्गत कहीं बेहतर गवर्नेंस था क्योंकि निर्माण के नियमो मे उल्लघन नहीं दिखता
  4. उस काल मे भी हड्डपाई लोगो ने जल संरक्षण प्रणाली विकसित करने कि कोशिश कि थी

इस प्रकार हड्डपाई नगर , वर्तमान नगरों को आंशिक रूप मे ही इनपुट प्रदान कर पाते है ।

हड्डपाई धर्म के दो पक्ष थे –

  1. तत्व चिंतन (दार्शनिक पक्ष)
  2. अनुष्ठानिक पक्ष (कर्मकांड)

साहित्यिक साक्ष्य के अभाव मे हम तत्व चिंतन को नहीं समझ पाये है परंतु भौतिक अवशेषो के आधार पर हम इसकी निम्न विशेषतए है –

  • बहुदेववादहड्डपाई धर्म मे एक से अधिक देवताओं की पूजा होती थी यथा मातृदेवी की पूजा, पृथ्वी पूजा, प्रजनन अंगो की पूजा, पशुपात शिव कि पूजा, पशु पूजा, नाग पूजा, अग्नि पूजा , जल पूजा आदि
  • धर्म का का संबंध उत्पादन से – अर्थात उत्पादक शक्ति की पूजा पर विशेष बल दिया जाता था उदाहरण के लिए मातृदेवी की पूजा , पृथ्वी पूजा , प्रजनन अंगो कि पूजा, तथा यज्ञ एवं नाग पूजा ।
  • मूर्ति पूजा किन्तु मंदिर का साक्ष्य नहीं बड़ी संख्या मे मृनमूर्तियाँ मिली है जो पुरुष और महिलाओ कि है तथा जिंका उपयोग संभवत : पूज्य प्रतिमा के रूप मे होता था । इनके अतिरिक्त पत्थर एवं धातु कि मूर्तियाँ भी मिली है । परंतु किसी भी ऐसी संरचना का अवशेष नहीं मिला है जिसकी स्पष्ट पहचान मंदिर के साथ कि जा सके ।
  • मूर्ति पूजा का संबंध भक्ति कि अवधारणा से भी जोड़ा जाता है
  • बच्चों के गले मे ताबीज का साक्ष्य जीववाद(animism) की और संकेत करता है ।
  • हड्ड्पा सभ्यता के पतन के पश्चात भी हड्डपाई धर्म ने भारतीय धार्मिक परंपरा को प्रभावित किया और आगे चलकर हिन्दू धर्म के विकास म्मे इसने अपनी भूमिका निभाई ।

हड्डपाई लोगो ने भौतिक क्षेत्र मे ही प्रगति नहीं की बल्कि अपने परिवेश के साथ भी साहचर्य स्थापित किया जो उनकी कला के माध्यम से व्यक्त हुआ है हड्डपाई कला मे हड्डपाई लोगो का सौंदर्य बोध व्यक्त होता है । हड्ड पाई लोगो ने बड़ी सख्या मे कलात्मक उत्पाद उत्पादित किए जो इस प्रकार है

  1. मुहरें – अधिकांश हड्डपाई मुहरें सेलखड़ी (स्टीटाइट) से बनते थे और प्राय बनावट मे आयताकार और वर्गाकार होते थे इन पर पशु की आकृति एवं लीपी उकेरी जाती थी ।
  2. मनका – मनका गले मे पहनने वाला आभूषण होता था जो मुख्यत : सेलखड़ी से निर्मित होता था परंतु इनके अतिरिक्त गोमेद, फिरोजा सोने तथा चाँदी के मनके भी बनते थे । गुजरात के लोथल एवं सिंध के चान्हुदड़ो से मनका बनाने का कारख़ाना मिला है
  3. धातु कला – हड्डपाई लोग तांबे एवं कांसे को गलाकर धातु की मूर्तियाँ भी बनाते थे उनके द्वारा मानव पशु की मूर्तियों के साथ – साथ गाडियाँ भी बनाई गयी है चान्हुदड़ो से प्राप्त नृतकी की मूर्ति बेहतरीन है । उरती निर्माण मे वे द्र्वी मोम विधि(lost wax technique ) का प्रयोग करते थे ।
  4. प्रस्तर कला – हड्ड्पा सभ्यता के लोगो ने बड़ी संख्या मे प्रस्तर की मूर्तियों का भी निर्माण किया परंतु आज अधिकांश मूर्तिया खंडित अवस्था मे मिलती है । मोहन जो दड़ो से प्राप्त दाढ़ी वाले साधू की मूर्ति तथा हड्ड्पा से प्राप्त दो मूर्तियाँ जिनसे मानव शरीर संरचना का ज्ञान मिलता है बेहतरीन है
  5. मृणमूर्तियाँ (टेरा कोटा फिगर्स ) विभिन्न हड्ड पाई स्थलो से बड़ी संख्या मे मृण मूर्तियाँ मिली है जिन पर महिलाओं , पुरुष पशु एवं पक्षी सभी का प्रतिनिधित्व मिलता है इनका उपयोग पूज्य प्रतिमा के रूप मे अथवा बच्चों के खिलौने के रूप मे मिलता था । संभव है कि इनका उपयोग घरों को सजाने मे भी हुआ हो ।
  • अंकगणित अंक माला का ज्ञान , 16 तथा उनके गुणकों का प्रयोग , गणना मे दशमलव एवं द्विभाजन प्रणाली का उपयोग
  • मापन विधि फीट एवं क्यूबिक का ज्ञान , लोथल से हाथी दांत का स्केल प्राप्त , नगर निर्माण योजना तथा ईंटों के अनुपात से उनकी ज्यामिती कि सूचना प्राप्त होती थी
  • खगोल विज्ञान उन्हे गृह एवं नक्षत्रों का ज्ञान था । एक मुहर पर मछली के साथ 7 बिन्दु बने हुये है जो सप्तर्षि के ज्ञान को दर्शाता है , जो खगोल विज्ञान से संबन्धित है ।
  • चिकित्सा विज्ञान – कालिबंगा से दो ऐसे शिशु नर कंकाल प्राप्त होते है जिनहे सर्जरी किए जाने का साक्ष्य मिलता है
  • तकनीकी हड्प्पाई लोगो को धातु की ढलाई का ज्ञान था वे तांबा गलाना जानते थे और तांबे के साथ टीन को मिलकर कांसा बनाना जानते थे। वे बेहतर रूप मे पत्थर को काट-छांटकर मनका एवं मुहर का निर्माण करते थे । वे धातु की मूर्तियों के निर्माण मे द्रवीय मोम विधि का प्रयोग करते थे । उनकी ईजिनियरिंग तकनीकी विकसित थी, जो उनके द्वारा निर्मति सार्वजनिक भवनो एवं ईंटों से निर्मित मकानो से ज्ञान होता है ।

पहले हड़प्पा सभ्यता के पतन का अर्थ सभ्यता की समाप्ती लगाया जाता था परंतु अब उसका अर्थ लगाया जाता है नगरीय चरण का पतन।

इस पतन के परिणामस्वरूप अब सभ्यता ग्रामीण स्वरूप मे पहुँच गई तथा क्षेत्रीय संस्कृतियों के रूप मे ढाल गई ।

इस काल मे निम्न परिवर्तन देखे गए-
  1. सभ्यता का नगरीय चरण से ग्रामीण चरण मे पहुँच जाना
  2. नगर निर्माण योजना की समाप्ती
  3. पक्की ईंटों मनका मुहर एवं कांसे का प्रयोग अत्यधिक सीमित हो जाना
  4. दूरवर्ती व्यापार का पतन

अब अगर हम नगरीय चरण के पतन के कारणो पर विचार करते है तो इसके एक से अधिक कारण नजर आते है ।

पहले एक ब्रिटिश विद्वान ने आर्य आक्रमण के आधार पर इसकी व्याख्या करने का प्रयास किया था परंतु नवीन शोधो मे यह धारणा खंडित हो चुकी है तथा भारत मे आर्यों के आगमन और नगरीय चरण के पतन के बीच 300-400 वर्षो का कालांतराल देखा जा सकता है ।

इसलिए सम्पूर्ण बहस पर्यावरणीय कारक की ओर  मूड गयी और फिर सभ्यता के पतन के लिए बढ़ सूखा और इसके साथ भूकंप जैसे कारण भी बताए जाने लगे । अब हम विभिन्न स्थलों का निरीक्षण करते है तो दो बातें स्पष्ट होती है –

  1. विभिन्न स्थलों के काल मे अंतर है
  2. अलग – अलग स्थल को जलवायु एवं भौगोलिक चुनौती का सामना कर्ण पड़ रहा था इसलिए इसके पतन के लिए कोई एक कारक उतरदाई नहीं रहा होगा बल्कि अलग – अलग स्थल के लिए अलग -अलग कारण रहे होंगे कहीं बाढ़ के कारण तो कहीं सूखा के कारण लोगों का धैर्य जवाब दे गया होगा और वे नगर को खाली करके कहीं और चले गए होंगे ।

पहले हड़प्पा सभ्यता के अध्ययन के पश्चात विद्वानो की मुख्य दिलचष्पी वैदिक सभ्यता के अध्ययन मे हो जाती थी और वे अन्य संस्कृतियों को नजरंअदाज कर देते थे

इसका एक बड़ा कारण था –

वैदिक साहित्य के अध्ययन के लिए विपुल मात्र मे वैदिक साहित्य का उपलब्ध होना परंतु आगे चलकर फिर एक बार विद्वानो की रुचि क्षेत्रीय संस्कृतियों मे होने लगी क्योंकि महाराष्ट्र के जोरबे नामक स्थान पर एक ताम्र पाषाण काल का स्थल मिला था

अत : विद्वान उसकी और आकर्षित हुये और फिर अनेक पुरातात्विक स्थल प्रकाश मे आने लगे ।

इस आधार पर हम हड़प्पा सभ्यता के पतन के पश्चात क्षेत्रीय संस्कृतियों का अध्ययन कर सकते है निनलिखित डायग्राम उसे स्पष्ट करता है –

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भले ही हड़प्पा सभ्यता के नगरीय चरण का पतन हो गया परंतु हड्प्पाई परंपरा समाप्त नहीं हुई वह निम्नलिखित रूप मे भारतीय संस्कृति को प्रभावित करती रही –

  1. आर्थिक क्षेत्र कृषि के क्षेत्र मे विभिन्न प्रकार की फसलें हल कप्रयोग बैलगाड़ी और इक्कगड़ी का प्रयोग
  2. नगर निमान योजना वर्तमान नगरो मे सदको गलियों नालियों और मकान के निर्माण पर हड़प्पा सभ्यता का प्रभाव
  3. सामाजिक क्षेत्र – सौंदर्य प्रसाधन , पहनावा ओढ़ावा एवं खानपान , सामाजिक विभाजन यथा योद्धा वर्ग , पुरोहित वर्ग व्यापारी किसान और श्रमिक
  4. धर्म के क्षेत्र मे मातृ देवी की पूजा , पशुपत शिव की पूजा , पृथ्वी पूजा अग्नि पूजा जल पूजा वृक्ष पूजा पशु पूजा नाग पूजा आदि वर्तमान धार्मिक व्यवस्था मे शामिल
  5. कला के क्षेत्र मे – हड्प्पाई पशु मूर्तियों के निर्माण का प्रभाव मौर्य कालीन स्तंभों पर , हड्प्पाई धातु कला एवं आभूषण निर्माण ने वर्तमान भारतीय कला पर अपना प्रभाव छोड़ा , हड़प्पा सभ्यता के काल मे निर्मित मृण मूर्तियों ने वर्तमान हरतीय कला को प्रभावित किया है ।

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